एक मज़दूर का भाषण

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साथियो,
मैं कोई नेता नहीं-
बस तुम्हारा एक साथी हूं,
एक मजदूर,
जिसके हाथों की दरारों में
इस देश की नींव बसी है।

हम वो हैं-
जो ईंट दर ईंट जोड़कर
महल बनाते हैं,
मगर खुद झोपड़ी में भीगते हैं।
जो दिन-रात सड़कें बिछाते हैं,
मगर हमारे बच्चे
उसी राह के गड्ढों में
भविष्य खो बैठते हैं।

हम हैं वो
जो खेतों की मिट्टी से
सोना उगाते हैं,
पर अपनी थाली में
दाल लाने को
सूदखोर के दरवाजे पर
हाथ पसारते हैं।

ये कैसा तंत्र है-
जहां कुछ गिने-चुने पूंजीपति
मुनाफ़े के समुंदर में डूबते-उतराते हैं,
और हम मजदूर
अपनी ही मेहनत की मजदूरी के लिए
ठेकेदार की चिरौरी करते हैं?

वो हमारी एकता से घबराते हैं,
इसलिए हर कदम पर
संगठित होने से रोकते हैं।
क्योंकि उन्हें पता है-
अगर हम एक हो गए,
तो उनके महलों की नींव
दरक जाएगी।

हमारा हक क्या है?
सम्मानजनक मजदूरी,
स्थायी रोजगार और सुरक्षा,
पेंशन और इलाज की गारंटी,
श्रम कानूनों का पालन,
और सबसे अहम-
इज्जत से जीने का हक।

ये कोई भीख नहीं -
ये हमारे पसीने की कीमत है।
लेकिन जब तक हम टुकड़ों में बंटे रहेंगे,
हमारी हर आवाज
धूल में मिलाई जाती रहेगी।

अब वक्त है -
हम कहेंः
हम सिर्फ श्रमिक नहीं -
हम संगठन हैं!
हम सिर्फ मांग नहीं करेंगे-
संघर्ष करेंगे!
हम सिर्फ कानून नहीं पढ़ेंगे-
इतिहास नया लिखेंगे!

साथियों, मैं आज तीन बातें मांगता हूँः

संगठित हो - हर मजदूर को जोड़ो।
शिक्षित हो - अधिकार जानो और सिखाओ।
संघर्षशील बनो - अब चुप रहना ग़ुलामी है,
और बोलना इंकलाब!

याद रखो,
आजादी कोई नहीं देगा,
हमें उसे छीनना होगा!

यहां की मिट्टी गवाही देगी-
जब मजदूर उठता है,
तो तख्त-ओ-ताज कांपते हैं।

-एम के आजाद, बिहार असंगठित मजदूर यूनियन

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