ट्रम्प मांगे नोबेल पुरूस्कार!

/trump-maange-nobel-prise

‘‘ मुझे नोबेल प्राइज दो!’ ‘मुझे नोबेल प्राइज दो!’’ की गुहार आजकल ट्रम्प रोज लगा रहा है। जैसा ट्रम्प है वैसे ही उसके लिए ‘‘शांति का नोबेल पुरूस्कार की मांग करने वाले हैं। उसके खुद के हाथ खून से रंगे हुए हैं और जो उसके लिए नोबेल शांति पुरूस्कार की मांग कर रहे हैं उनके भी हाथ खून से रंगे हुए हैं। 
    
उसके लिए नोबेल शांति पुरूस्कार मांगने वालों में एक जनसंहार का दोषी इजरायल का धूर्त, क्रूर, भ्रष्ट प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू है। गाजा में अब तक वह 60,000 से ज्यादा लोगों की निर्ममतापूर्वक हत्या कर चुका है जिनमें आधे से भी अधिक निर्दोष औरतें और मासूम बच्चे हैं। इसी तरह उसने लेबनान, सीरिया, यमन व ईरान में सैकड़ों की संख्या में निर्दोष नागरिकों का कत्ल किया है। इस धूर्त-क्रूर पर अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में जनसंहार का मुकदमा चल रहा है। नेतन्याहू एक जिन्दा राक्षस है जो खून पी-पीकर ही जिन्दा है। 
    
और दूसरे महाशय पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष ‘‘फील्ड मार्शल’’ आसीम मुनीर है। इन महाशय के भी हाथ खून से सने हुए हैं। इनकी सेना ने पाकिस्तान में बलूचों का भारी पैमाने पर दमन किया हुआ है। चंद महीनों में ही भारी संख्या में बलूच मारे गये हैं। इसी तरह आसीम मुनीर की सेना कई अफगानियों का कत्ल कर चुकी है। उन्हें देश से खदेड़ रही है। पिछले दिनों भारत और पाकिस्तान के ‘‘चार दिनी युद्ध’’ में कई निर्दोष भारतीयों का कत्ल पाकिस्तान की सेना ने तो कई निर्दोष पाकिस्तानियों का कत्ल भारतीय सेना ने किया। खुद पाकिस्तान में भी इमरान खान की पार्टी के दमन के समय पाकिस्तान की सेना ने पाकिस्तानियों का ही खून सड़कों में बहा दिया था। 
    
और ट्रम्प का क्या हाल है। उसके हाथ यमन, ईरान, सीरिया के लोगों के खून से सने हुए हैं। रूस और यूक्रेन के युद्ध के लिए भी पहले जो बाइडेन और अब शांति का पुरूस्कार चाहने वाला ट्रम्प ही जिम्मेदार है। अमेरिकी साम्राज्यवाद का नुमाइंदा ट्रम्प जितने दिन अमेरिका का राष्ट्रपति रहेगा उतने दिन उसके हाथ रोज-ब-रोज के युद्धों में खून में ही रंगेंगे।
    
डाइनामाइट का आविष्कार करने वाले अल्फ्रेड नोबेल ने अपने इस खतरनाक आविष्कार से बेशुमार दौलत कमाई थी। मरते वक्त उसे कुछ पश्चाताप हुआ होगा जो उसने शांति के नोबेल पुरूस्कार की शुरूवात अपनी दौलत से करवाई। और अब जो महाशय शांति का पुरूस्कार चाहते हैं उन्हें न कोई पश्चाताप है और न कोई लाज-शरम। 
    
एक हत्यारे के लिए दूसरे हत्यारे शांति के नोबेल पुरूस्कार की मांग कर रहे हैं। यह हमारे समय का विद्रूप सच है। 

आलेख

/amerika-ka-iran-par-operation-d-day-hatasha-ka-parinam

अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

/education-and-emplyoment-dasha-aur-durdasha

भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

/cocoroach-saradar-and-samajvadi-janataantrik-morcha

उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

/titali-effect-kuch-itihaas-se-kucha-vartaman-mein

तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

/sadho-thagawa-nagariya-lootal-ho

वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?