चलो! न्याय का नाटक पूरा हुआ

Published
Sun, 03/01/2026 - 07:01
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बनभूलपुरा प्रकरण

आखिर में वही हुआ जिसकी सबसे अधिक संभावना थी। 24 फरवरी को भारत के उच्चतम न्यायालय ने बनभूलपुरा के करीब 5,000 परिवारों को अतिक्रमणकारी मानते हुए कथित रेलवे की जमीन को खाली करने को कहा। न्याय का प्रहसन दो वर्ष से अधिक समय तक चला। एक समय मानवीय संवेदनाओं की बाढ़ वर्तमान मुख्य न्यायाधीश से पहले के मुख्य न्यायाधीश ने अदालत में ला दी थी। जिससे यह उम्मीद जगी थी कि शायद कोई साहसिक न्यायिक फैसला हो। उच्चतम न्यायालय के फैसलों में कोई आपवादिक फैसला बनभूलपुरा के मामले में आ जाये। असल में ऐसा नहीं होना था और न ही हुआ। उच्चतम न्यायालय ने वही किया जो ऐसे सारे मामलों में वह पिछले वर्षों करता रहा है। बनभूलपुरा वाले मामले में बस इतना ही हुआ है कि लोगों के घर-द्वार उजाड़ने के बाद रोने-बिलखने वालों को उच्चतम न्यायालय ने एक सफेद रूमाल दे दिया है जिससे वे अपने आंसू पोंछ सकें। अपना गमजदा चेहरा ढांप सकें। मतलब यह कि बनभूलपुरा के ‘‘पात्र’’ व्यक्तियों को प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर और आवश्यक हो तो 6 माह तक प्रतिमाह 2000 रु. दिये जायें। न जाने यह दिखावा करने की सर्वोच्च अदालत को क्यों जरूरत पड़ी। जिस प्रदेश का मुख्यमंत्री और प्रशासन रोज ही मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलता और कार्यवाही करता हो, वह भला क्या वह सब कुछ करेगा जिसकी अपील सर्वोच्च न्यायालय इन महानुभावों से कर रहा है। शायद उच्चतम न्यायालय के मानवता के दिखावे का अंत अंतहीन दिखावे में ही है। 
    
बनभूलपुरा की जमीन को रेलवे की जमीन साबित करने के लिए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों ने शब्दां की जुगाली की। पहले मान लिया गया कि बनभूलपुरा की जमीन सार्वजनिक जमीन है और इस तरह वह रेलवे की जमीन हो गयी। रेलवे के पास जमीन के मालिकाने के कागजात का एक कतरा नहीं है। इसके उलट वहां रहने वालों के पास वह सब कागजात हैं जिससे साबित होता है कि वे दशकों से नहीं बल्कि भारत के आजाद होने से भी पहले से वहां रह रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय की मंशा होती और मजदूर-मेहनतकशों के प्रति उसकी किंचित भी संवेदना होती तो वह सीधे तौर पर यही फैसला देता कि रेलवे का दावा गलत है। जहां तक ढोलक व गफूर बस्ती का मसला है उनका मानवीय गरिमा के अनुरूप पुनर्वास होना चाहिए था। और शेष लोगों के मालिकाने को स्थायी मानना चाहिए था। जहां तक रेलवे के विस्तार का सवाल है उन्हें गौला नदी की पूर्व दिशा में सरकारी भूमि में किया जाना चाहिए था। 
    
जो न्याय सीधा-सरल था वह उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की वर्गीय पक्षधरता व व्यवस्था परस्त चरित्र के कारण जटिल व शब्दों का खेल बन गया। अब क्या बचा है? न्यायालय के हिसाब से बोरिया-बिस्तर समेटो और नया ठौर ढूंढ़ो। 

 

यह मामला शुद्धम शुद्ध राजनैतिक है

बनभूलपुरा मामले को जो कोई भी संजीदा निगाह से देखेगा तो पायेगा कि यह मामला पहले दिन (जब यह मामला सबसे पहले अदालत में उठाया गया) से लेकर आखिर दिन (जब इस मामले में उच्चतम न्यायालय ने अपना अंतिम फैसला सुनाया) तक सौ फीसदी राजनैतिक है। 
    
अदालत में कथित अतिक्रमण का मामला उठाने वाला व्यक्ति अपने विचारों, पृष्ठभूमि, सामाजिक  संबंधों इत्यादि में घोर दक्षिणपंथी व धार्मिक अल्पसंख्यकों खासकर मुसलमानों के प्रति द्वेष, पूर्वाग्रह व नफरत से भरा हुआ है। और फिर यही चीज इस मामले को लेकर मीडिया में छपने वाली खबरों व टिप्पणियों के बारे में भी सच है। सत्तारूढ़ राजनैतिक दल और उसके इशारों पर काम करने वाले प्रशासन के बारे में भी ऐसा ही कुछ थोड़े-बहुत शब्दों के हेर-फेर के साथ सच है। 
    
क्या अदालतें इस समय प्रभुत्वशाली विचारधारा व राजनीति के प्रभाव से मुक्त हैं। बनभूलपुरा के मामले में न तो उच्च या न ही उच्चतम न्यायालय के बारे में कोई कह सकता है कि नहीं ऐसा नहीं है। 
    
भारत की अदालतों में सदा ही सताए हुए शोषित-उत्पीड़ित जनों की आवाज को बहुत कम ही तवोज्जह दी गयी। कभी-कभार ही ऐसा हुआ कि जब सर्वोच्च न्यायालय ने कुछेक फैसले उनके हक में सुनाये। और यह सब अब बहुत-बहुत पुरानी बात हो चुकी है। जब से भारत के शासक वर्ग ने अपने लोक कल्याणकारी तथाकथित समाजवादी फटे-पुराने चोले को उतार कर नई आर्थिक नीतियों का दिखावटी-सजावटी चोला पहना तो अदालतों का रुख पूरी तरह से बदल गया। विकास के नाम पर अदालतों ने भारत के नागरिकों खासकर शोषित-उत्पीड़ितों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, आदिवासियों के मूल अधिकारों को एकदम बेमानी बना दिया। ऐसे मामलों की कई-कई मिसालें दी जा सकती हैं। मानवता, दया, न्याय जैसे शब्द भारत की अदालतों के लिए मंदिर-मस्जिद के आगे बैठे लोगों की ऐसी पुकार बन गये हैं जिस पर कोई ध्यान न तो देता है और न देना चाहता है। भले ही आवाज कितनी ही दर्दभरी हो। 
    
कुल मिलाकर मामला अब यह है कि राजनैतिक मामलों का जवाब तो राजनैतिक ढंग से ही देना पड़ता है। राजनैतिक सत्ता जब अंधी-बहरी हो तो शहीद भगतसिंह की बातें और सिद्धांत ही माकूल जवाब और कार्यवाही हो सकते हैं। ये बातें जितनी जल्दी समझी व लागू की जायेंगी उतना ही हमारे देश का भला होगा। 

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