दिल्ली : फ़ूड प्रोसेसिंग फैक्टरी में आग, 3 मज़दूरों की मौत, 6 मज़दूर घायल

8 जून शनिवार को सुबह 3:30 बजे दिल्ली के नरेला इलाके में फ़ूड प्रोसेसिंग कम्पनी श्याम कृपा फ़ूड्स प्राइवेट लिमिटेड में आग लगने से तीन मज़दूरों की मौत हो गयी और 6 मज़दूर घायल हो गये। इस फैक्टरी को दाल मिल के नाम से भी लोग जानते हैं। यहाँ सूखी मूंग बनायीं जाती थी।

आग उस समय लगी जब कच्ची मूंग की प्रोसेसिंग के दौरान गैस लीक हुई और पाइप से होते हुए कम्प्रेसर तक आग पहुंच गयी। कम्प्रेसर के गर्म हो जाने से उसमें विस्फोट हो गया और आग ग्राउंड फ्लोर से तीसरी मंजिल तक पहुंच गयी। और मज़दूरों को अपनी चपेट में ले लिया।

दिल्ली में फैक्ट्रीयों में आये दिन कहीं न कहीं आग लगने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। नरेला में ही कई बार आग लगने और फैक्ट्रीयों में विस्फोट की घटनाएं सामने आयी हैं। लेकिन उसके बाद भी न श्रम विभाग और न ही सरकार इस ओर ध्यान दे रही है। और यह अकारण नहीं है। दरअसल मज़दूरों की जिंदगी का कोई मोल इनकी नज़रों में है ही नहीं।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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भारत की शिक्षा व्यवस्था में एक अजीबोगरीब विरोधाभास नजर आता है। एक ओर उच्च शिक्षा में आई आई टी, एम्स और आई आई एम जैसे सरकारी संस्थान हैं जो क्रमशः इंजीनियरिंग, चिकित्सा और

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।