फ्रांस: उग्र होता छात्र आंदोलन और सरकारी दमन

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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फ्रांस में सितम्बर महीने से छात्र आंदोलन चल रहा है। यह अब तेज से तेजतर होता जा रहा है। इसकी शुरूवात हाईस्कूल के छात्रों से हुई। फ्रांस की सरकार ने शिक्षा व्यवस्था को नजरअंदाज किया हुआ है। छात्रों को आगे पढ़ने, विश्वविद्यालयी शिक्षा तक जाने की प्रणाली ऐसी है जिसमें उनको आगे जाने का मौका नहीं है। शिक्षा बजट में लगातार कटौती हो रही है। इन सब मांगों को लेकर गरीब इलाके के स्कूलों से शुरू हुआ छात्र आंदोलन अब समूचे फ्रांस में फैल गया है। अब इस आंदोलन में सिर्फ गरीब इलाके के छात्र नहीं हैं बल्कि धनी इलाकों के तथा विश्वविद्यालय के छात्र भी शामिल हो रहे हैं। इसके अतिरिक्त, इस आंदोलन के समर्थन में छात्रों के माता-पिता और ‘यलो वेस्ट’ के मजदूर भी इसके साथ जुड़ गये हैं।
    
छात्रों ने जैसे ही स्कूलों की नाकाबंदी शुरू की, वैसे ही मैक्रों की सरकार ने इसका जवाब क्रूर दमन के साथ दिया। मैक्रों की सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए पानी की बौछारें कीं, स्टनगन से गोले दागे। इसमें कई छात्र घायल हो गये। एक छात्र की एक आंख चली गयी। एक छात्र का एक हाथ चला गया। कई घायल हुए। एक व्यक्ति की मौत हो गयी। हजारों छात्रों को गिरफ्तार किया गया। ये सभी 15-16-17 वर्ष के छात्र थे। मैक्रों सरकार के दमनकारी क्रूर रुख के चलते यह आंदोलन देशव्यापी हो गया। अब यह सभी बड़े-छोटे शहरों तक फैल गया है। मैक्रों की सरकार ने इस आंदोलन को कुचलने के लिए 70 हजार पुलिस और सेना को तैनात किया है। इस तैनाती के बावजूद, यह आंदोलन और व्यापक रूप लेता जा रहा है। 
    
24 अक्टूबर को फ्रांस के लाखों मजदूरों और युवाओं ने पुलिस की सख्ती को धता बताते हुए प्रदर्शनों मंे हिस्सा लिया। सरकार ने बताया कि इन आंदोलनों में 4 लाख 10 हजार लोग शामिल हुए। जबकि एक ट्रेड यूनियन फेडरेशन ने इस संख्या को 8 लाख बताया।
    
मैक्रों सरकार यह घोषणा कर चुकी है कि ये प्रदर्शन ‘फ्रांसीसी गणतंत्र’ के विरोध मंे है। इनका कोई औचित्य नहीं है। ये अराजकतावादियों की कार्रवाईयां हैं। ट्रम्प जैसे कुछ लोग फ्रांस के छात्र आंदोलन को इस्लामपंथियों और अप्रवासियों की कार्रवाई कहा है। कुछ दक्षिणपंथी ताकतें इसे धर्म और नस्ल के साथ जोड़ कर इसकी भत्र्सना कर रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि यह आंदोलन समूचे फ्रांस के सभी तबकों को अपने में समेटे हुए है। मैक्रों सरकार इसे हिंसक और तोड़-फोड़ व आगजनी करने वाले असामाजिक तत्वों की कार्रवाई बता रही है। जबकि वास्तविकता यह है कि सरकारी पुलिस बलों ने हिंसा की है। ये पुलिस बल ही रहे हैं जिन्होंने प्रदर्शनकारियों पर स्टन ग्रेनेडों से हमले किये हैं। 
    
मैक्रों सरकार तथा उसके साथ यूरोपीय संघ एक तरफ तो सैनिक बजट में लगातार बढ़ोत्तरी कर रहे हैं और साथ ही बड़े पूंजीपतियों-एकाधिकारी पूंजीपतियों और वित्तीय पूंजी के मालिकों को करों में छूट सहित उनको लूटने की सुविधायें मुहैय्या करा रही हैं। सामाजिक सेवाओं में कटौती से शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य सेवाओं में कटौती होगी। इससे पहले से ही खराब हुई जन साधारण की जिंदगी और बदहाल होगी। इसके अतिरिक्त, पहले कोरोना महामारी, फिर यूक्रेन युद्ध और बाद में ईरान पर अमरीकी-इजरायली हमले के चलते तेल संकट ने लोगों का घरेलू बजट और बढ़ा दिया। व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी की जिंदगी और दुश्वार हो गयी। महंगाई करीब 15 प्रतिशत बढ़ गयी। ऐसी हालत में लोगों का गुस्सा मैक्रों सरकार के विरुद्ध बढ़ता गया। यह संचित गुस्सा था, जो हाईस्कूल के छात्रों के प्रदर्शनों में फूटा। यह व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी का समूची पूंजीवादी व्यवस्था के प्रति गुस्सा है, जो इस समय व्यापक रूप से फूट पड़ा है। 
    
मौजूदा छात्र-युवा-मजदूरों का यह आंदोलन यदि व्यापक होकर पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध आंदोलन में आगे बढ़ता है और इसमें सचेत मजदूर वर्ग बढ़-चढ़कर दूरगामी दृष्टि से अगुवाई लेेने की ओर आगे बढ़ता है तो यह पूंजीवादी व्यवस्था को धराशाई करने की ओर जा सकता है। 
    
इस समय फ्रांस के अतिरिक्त अनेक यूरोपीय देशों में- इटली, पुर्तगाल, स्पेन, अल्बानिया, जर्मनी और बेल्जियम में व्यापक आंदोलन-प्रदर्शन चल रहे हैं। 
    
फ्रांस इन्हें प्रेरणा दे रहा है।     

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