हरियाणा: बिजली वितरण के निजीकरण का फैसला फिलवक्त रद्द

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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हड़ताल के दबाव में झुकी सरकार

हरियाणा के गुरुग्राम और नूंह में बिजली वितरण का काम ‘इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड’ को सौंपे जाने का विरोध कर रहे बिजली कर्मचारियों की तीन दिनी (22-24 अक्टूबर) हड़ताल 23 अक्टूबर को समाप्त हो गयी। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी और ऊर्जा मंत्री अनिल बिज के साथ हुई वार्ता के बाद सरकार ने बिजली एक्ट के तहत धारा 108 का प्रयोग करते हुए हरियाणा बिजली विनियामक आयोग से बिजली वितरण के काम को एक निजी कम्पनी को सौंपे जाने का आदेश रद्द करने का आश्वासन हड़ताली कर्मचारियों को दिया। इसकेे बाद ‘हरियाणा बिजली कर्मचारी एवं इंजीनियरिंग संयुक्त मोर्चा’ के बैनर तले चल रही बिजली कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त हो गयी।
    
ज्ञात हो कि ‘हरियाणा बिजली विनियामक आयोग’ (हरियाणा इलेक्ट्रिसिटी रेगुलेटरी कमीशन) ने 19 अक्टूबर को ‘इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड’ को वितरण का लाइसेंस दे दिया था। यह पहली निजी क्षेत्र की वितरण कम्पनी है जिसे हरियाणा में बिजली वितरण का जिम्मा सौंपा गया था।
    
बिजली कर्मचारियों के अनुसार ऐसा करके सरकार बिजली विभाग में निजीकरण की राह खोल रही है। उनकी मांग ‘इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड’ को दिये गये बिजली वितरण के लाइसेंस को रद्द करने और निजीकरण पर रोक लगाने की थी। 
    
सरकार शुरूआत में तो ‘इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड’ को लाइसेंस दिये जाने में अपनी भूमिका से इंकार कर कह रही थी कि ‘हरियाणा बिजली विनियामक आयोग’ एक स्वायत्त संस्था है और वे इसके खिलाफ 5-6 दिन में विद्युत अपीलीय न्यायाधिकरण जाएंगे। इस तरह का आश्वासन देकर वे बिजली कर्मचारियों से हड़ताल खत्म करने की चाल चल रहे थे। लेकिन बिजली कर्मचारी इस बार सरकार के वादों के झांसे में नहीं आये और उन्होंने साफ कहा कि जब तक यह फैसला रद्द नहीं होता वे हड़ताल नहीं तोड़ेंगे। और आगे वे अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जायेंगे।  
    
‘इलेवन पावर प्राइवेट लिमिटेड’, मेदांता ग्रुप के इलेवन समूह का हिस्सा है। इसे लाइसेंस मिलने के बाद गुरुग्राम और नूंह (सोहना और मानेसर सहित) के 8.3 लाख उपभोक्ता तक ‘इलेवन पावर’ की पहुंच हो जाती। अभी तक हरियाणा में बिजली वितरण का काम दक्षिण हरियाणा बिजली वितरण निगम करता है। एक तरफ सरकार कह रही थी कि वह इस फैसले के खिलाफ है और अपीलीय न्यायाधिकरण जाएगी। दूसरी तरफ यह तर्क पेश किये जा रहे थे कि दो वितरण कम्पनियां होने से प्रतियोगिता बढ़ेगी और उपभोक्ता किसी भी कम्पनी को बिजली के लिए चुन सकते हैं।
    
बिजली कर्मचारी जानते थे कि इस निजीकरण के बाद सरकारी कर्मचारियों की छंटनी स्वाभाविक है। किसान संगठन भी इसका विरोध कर रहे थे। क्योंकि अभी तक देहाती क्षेत्रों में मिल रही क्रास सब्सिडी के बंद होने का खतरा पैदा हो गया था। इससे किसानों और देहात की गरीब आबादी पर बिल का बोझ बढ़ता। 
    
जब नीति ही उदारीकरण और निजीकरण की हो तो सरकारें सरकारी संस्थानों का निजीकरण ही करेंगी। उत्तर प्रदेश में भी बिजली कर्मचारी निजीकरण के खिलाफ लड़ाई रहे हैं। अभी हाल में ‘आई डी बी आई’ का निजीकरण भी इसी नीति के अनुसार हुआ है। इससे पहले और आगे भी निजीकरण की प्रक्रिया जारी रहनी है जब तक कि निजीकरण-उदारीकरण की नीतियों को पलट न दिया जाए। और इसके लिए किसी एक संस्थान या विभाग के मजदूर-कर्मचारी नहीं देश के व्यापक मजदूर वर्ग की एकजुटता जरूरी होगी। आज भले ही बिजली कर्मचारियों ने अपनी एकता और संघर्ष के दम पर बिजली वितरण के निजीकरण के कदम को पीछे खींचने के लिए सरकार को मजबूर कर दिया हो लेकिन सरकार फिर से निजीकरण की दिशा में कदम उठायेगी।     -विशेष संवाददाता

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