इटली: बुनियादी सुविधाओं के लिए लड़ते लोग

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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फ्रांस से शुरू हुआ आंदोलन एक-एक कर यूरोप के अन्य देशों में फैलता जा रहा है। और न सिर्फ फैल रहा है बल्कि हिंसक होता जा रहा है। इटली में भी यही हो रहा है। भविष्य के प्रति असुरक्षा और वर्तमान में बुनियादी सुविधाओं के अभाव ने जेन जी पीढ़ी को सड़कों पर संघर्ष करने के लिए मजबूर कर दिया है। शासक वर्ग इन आंदोलनों को शांत करने के बजाय पुलिस को कानूनी अधिकार के जरिये हिंसा करने के लिए छूट दे रहा है।
    
इटली में हो रहे प्रदर्शन बढ़ती कीमतों, स्थिर वेतन, किफायती आवास, बुनियादी सार्वजनिक सेवाओं के गिरते स्तर की वजह से हो रहे हैं। जो प्रदर्शनकारी पुलिस ने गिरफ्तार किये हैं उनमें 80 प्रतिशत नाबालिग हैं। सरकार ने सोमवार (19 अक्टूबर) को आपातकालीन बैठक में इन प्रदर्शनों से निपटने के उपाय के रूप में आपातकालीन कदम उठाने की बात की जिसमें नाबालिगों को निवारक हिरासत में रखना और लोगों को समूह में इकट्ठा न होने देने जैसे कदम शामिल हैं। 
    
मेलोनी सरकार इन प्रदर्शनों को ला एन्ड आर्डर की समस्या के रूप में ही देख रही है। और फिर उपाय भी वैसे ही अपना रही है। दरअसल सरकार आंकड़ों के जरिए समाज की सच्चाई से मुंह फेरना चाहती है। आंकड़ों में इटली की अर्थव्यवस्था सुधर रही है। बेरोजगारी की दर भी घट रही है। राजकोषीय घाटा भी घट रहा है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधा भी लोगों को ठीक तरीके से नहीं मिल पा रही है। जेन जी का इन प्रदर्शनों में शामिल होने का एक कारण सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, स्कूल भवनों की खराब स्थिति है। 
    
फ्रांस, स्पेन आदि की तरह, इटली में भी लोग बढ़ते किराये से परेशान हैं। उन्हें किफायती आवास नहीं मिल पा रहे हैं। महंगाई बढ़ती जा रही है लेकिन वेतन एक जगह ही अटके हुए हैं। अर्थव्यवस्था के आंकड़े और लोगों का जीवन मेल नहीं खा रहा है। यही वजह है कि आस-पास के देशों में हो रहे प्रदर्शन इटली पर भी असर डाल रहे हैं। और लोगों को सड़क पर उतार रहे हैं।
    
इसका एक तात्कालिक हल सरकार द्वारा लोकल्याणकारी कदम उठाना है। लेकिन वो यह काम नहीं कर सकती। दरअसल पिछले 30-40 सालों में हर देश में लोक कल्याणकारी राज्यों को खत्म कर दिया गया है। इसकी वजह पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकारों को अब मजदूर राज यानी समाजवाद का भय समाप्त होना है। जब दुनिया में समाजवाद का बोलबाला था, जब मजदूर हर देश में अपना राज स्थापित करने की लड़ाई लड़ रहा था तब पूंजीपति वर्ग और उसकी सरकारों ने कल्याणकारी राज्य स्थापित कर समाजवाद के संघर्ष को रोकने की कोशिश की थी। लेकिन अब ऐसा नहीं है। मजदूर वर्ग की पार्टियां पूंजीवाद में ही सिमट गयीं। और पूंजीवाद फिर अपने खूनी पंजे लेकर सामने आ गया।
    
पूंजीपतियों ने इटली में भी एक ऐसी ही पार्टी को सत्ता की कमान सौंपी जो अपने चरित्र में ही फासीवादी थी। मेलोनी एक ऐसी ही पार्टी की नेता हैं। यह गाजा युद्ध में पूंजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने का काम करती रही हैं। शिक्षा के बजाय हथियारों पर बजट खर्च करती रही हैं। वह लोगों की समस्या के लिए अप्रवासियों को जिम्मेदार ठहराती रही हैं। और उनको रोकने के लिए नौसैनिक नाकाबंदी का समर्थन करती रही हैं। इटली के लोग पिछले दिनों मेलोनी के खिलाफ ‘‘नो मेलोनी’’ नाम से प्रदर्शन करते रहे हैं। लेकिन इटली के लोगों को ‘‘नो मेलोनी’’ के बजाय ‘‘नो कैपिटलिज्म’’ का नारा बुलंद करना होगा जो उनकी मूल समस्याओं की जड़ है।

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