इजरायल द्वारा गाजापट्टी में जारी क्रूर नरसंहार

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इजरायली यहूदी नस्लवादी बेंजामिन नेतन्याहू की हुकूमत ने नये सिरे से गाजा शहर और समूची गाजापट्टी में अपने व्यापक विनाश और नरसंहार को और ज्यादा तेज कर दिया है। इजरायली शासक भूख और पानी को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करके आबादी को, विशेष तौर पर बच्चों को मार रहे हैं। खाद्यान्न, दवायें, बेबी फूड और अन्य जरूरी जीवन रक्षक सामान पहुंचने में बाधायें खड़ी की जा रही हैं। खाना लेने के लिए कतार में खड़े फिलिस्तीनियों को गोली से मारा जा रहा है। अस्पतालों पर हमले किये जा रहे हैं। पत्रकारों को गोलियों से छलनी किया जा रहा है। 
    
यह सब करने के बावजूद, इजरायल हमास व अन्य संगठनों के प्रतिरोध को समाप्त नहीं कर पा रहा है। मलबे में तब्दील हो चुकी इमारतों के बीच से प्रतिरोध के लड़ाके इजरायली टैंकों और बख्तरबंद गाड़ियों को उड़ा दे रहे हैं। इजरायली कब्जाकारी सैनिक खौफ के साये में वहां अत्याचार और विनाश कर रहे हैं। 
    
खुद इजरायली सेना के अंदर यह अनुभूति और समझ गहरी होती जा रही है कि हमास को खतम नहीं किया जा सकता। इजरायली सैनिक लड़ने से इंकार करने लगे हैं। इजरायली सैनिकों में मानसिक रोगियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सैनिकों द्वारा आत्महत्याओं की घटनायें बढ़ती तादाद में सामने आ रही हैं। 
    
खुद इजरायली शासक वर्ग और इजरायली समाज में नेतन्याहू की हमास को समाप्त करने की नीति के नाम पर गाजा में जारी नरसंहार के प्रति लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। इजरायली अवाम के बीच यह धारणा बलवती होती जा रही है कि नेतन्याहू अपनी गद्दी बचाये रखने के लिए और जेल जाने से बचने के लिए यह नरसंहार जारी रखे हुए है। 
    
नेतन्याहू को न तो हमास द्वारा बंधक बनाये गये लोगों को वापस लाने की फिक्र है और न ही इजरायल के नागरिकों के भय के साये में रहने की चिंता है। बंधकों के परिवारों के समर्थन में करीब एक लाख लोग इजरायली राजधानी तेल अवीव की सड़कों पर नेतन्याहू विरोधी नारे लगाते हुए उतर पड़े। यह सिलसिला हर सप्ताह जारी है। 
    
इसके बावजूद गाजापट्टी में 60,000 इजरायली सैनिकों को उतारकर, हवाई हमले करके गाजा शहर को नेस्तनाबूद किया जा रहा है। लोग वहां से भाग रहे हैं। तम्बुओं के ऊपर भी बमबारी की जा रही है। बच्चे वैसे ही कंकाल तंत्र में तब्दील होते जा रहे हैं। 
    
देश के भीतर और अंतर्राष्ट्रीय पैमाने पर इजरायली हुकूमत व्यापक अलगाव में पड़ने के बावजूद अमरीकी साम्राज्यवादियों की शह पर यह अत्याचार व विनाश कर रही है। 
    
संयुक्त राष्ट्र संघ कुछ नहीं कर रहा है। अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय अपने द्वारा दी गयी सजा को लागू करने में असमर्थ है। वह दंतहीन है। अगल-बगल के अरब राज्यों की सरकारें जुबानी जमाखर्च के अलावा कुछ नहीं कर रही हैं। बल्कि अपने यहां की मजदूर-मेहनतकश आबादी का वे इसलिए दमन कर रही हैं क्योंकि वे फिलिस्तीनी जनता की आजादी के लिए और इजरायली हुकूमत के विरोध में सड़कों पर प्रदर्शन कर रही हैं। दुनिया भर की मजदूर-मेहनतकश और न्यायप्रिय आबादी फिलिस्तीनी अवाम के साथ एकजुटता में खड़ी है और दुनिया भर के शोषक-शासक आम तौर पर उनके विरोध में खड़े हैं। जो समर्थन की बात भी करते हैं तो वह महज रस्म अदायगी के सिवाय और कुछ नहीं होती। 
    
अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर दो राष्ट्र- एक फिलिस्तीन और एक इजरायल- की वकालत करने वाले देश इस नरसंहार और व्यापक विनाश पर चुप हैं। अरब देशों के शासक इजरायल के साथ सम्बन्ध सामान्य बनाने की फिराक में हैं। 
    
यह प्रतिरोध आंदोलन ही है जो तमाम प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद यहूदी नस्लवादी आतताइयों का जवाब दे रहा है। यमन के हूथी लोगों ने यह साबित कर दिया है कि मजबूत से मजबूत सेना और आधुनिक सुरक्षा कवचों से लैस देश के आक्रामक मंसूबों को चुनौती दी जा सकती है। इजरायली सेना की अजेयता और उसके सुरक्षा कवच की अभेद्यता की कहानी को यमन के हूथी लोगों ने ध्वस्त कर दिया है। उसने अपनी मिसाइलों से इजरायल की राजधानी तक प्रहार किया है। इससे प्रतिरोध आंदोलन के अन्य घटकों को प्रेरणा और ताकत मिलेगी। आज भले ही हमास और लेबनान के हिजबुल्ला, इराक के प्रतिरोध आंदोलन व सीरिया के लड़ाके भयंकर प्रतिकूल परिस्थितियों में लड़ रहे हों, लेकिन भविष्य में वे ताकत हासिल करेंगे और इजरायली यहूदी नस्लवादी हुकूमत को समूल उखाड़ फेंकने में अपनी भूमिका अदा करेंगे।  

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