कू क्लक्स क्लान और इसका भारतीय संस्करण संघ

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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इसी अप्रैल माह में आर.एस.एस. के सर कार्यवाहक दत्तात्रेय हासबोले को अमेरिका में एक मामले में सफाई देनी पड़ी। मामला था अमरीका में सिविल सोसायटी के एक कार्यक्रम में आर एस एस को कू क्लक्स क्लान का भारतीय संस्करण बताने का। वाशिंगटन के हडसन इंस्टीट्यूट में हासबोले ने वहां इस सवाल पर सफाई देते हुए कहा कि आर एस एस कू क्लक्स क्लान का भारतीय संस्करण नहीं है। यह भी कहा कि संघ हिंदुत्व की विचारधारा पर चलता है। हिंदू धर्म समाज की एकता और वसुधैव कुटुंबकम की बात करता है। 
    
दरअसल अमेरिका का कू क्लक्स क्लान नस्लीय श्रेष्ठता और खुले आतंक पर आधारित एक गुप्त संगठन था। इसके श्वेत वर्चस्ववाद (नस्लवाद) के तीन हिंसक चरण हैं- पहला क्लान (1865-1872) जिसने गृह युद्ध के बाद अश्वेतों को आतंकित करने के लिए लिंचिंग और आगजनी का सहारा लिया था। दूसरा क्लान (1915-1944) जो 30 से 60 लाख सदस्यों के साथ राष्ट्रव्यापी बना और यहूदियों, कैथोलिकों और अप्रवासियों के खिलाफ नफरत फैलाता रहा, और हिंसा करता रहा। तथा तीसरा क्लान (1950 से वर्तमान तक) जिसने नागरिक अधिकार आंदोलन के खिलाफ बमबारी की और इसके नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याएं कीं। आज भले ही इसके कुछ हजार सदस्य बचे हों, लेकिन यह अमेरिकी इतिहास का संगठित फासीवादी आंदोलन माना जाता है। सफेद कपड़ों में ढंके और सिर पर नुकीली टोपी के साथ हिंसक प्रदर्शन इसकी विशेषता थी।
    
जाहिर है संघ के कार्यवाहक हासबोले को सफाई तो देनी ही थी। संघ कितना वसुधैव कुटुम्बकम की दिशा में बढ़ रहा है, यह संघ और उसके 50 से अधिक संगठनों की कार्रवाइयों के जरिए दिखता है। अपनी शुरुवात से लेकर अभी तक मुसलमानों, ईसाइयों और कम्युनिस्टों के खिलाफ लगातार दुष्प्रचार किया है। बाद के दौर में इसने हिंसक अभियान चलाए हैं, दंगे भी निरंतर करवाए हैं। गांधी की हत्या से सभी परिचित हैं। दंगे आयोजित करवा कर अनगिनत लोगों की व्यक्तिगत और सामूहिक रूप में हत्याएं संघ ने करवाई हैं या की हैं। ये हत्याएं और दंगे इनके हिंदू सवर्ण वर्चस्व पर आधारित हिंदू राष्ट्र की फासीवादी परियोजना का हिस्सा हैं। मालेगांव बम विस्फोट इसका जीता जागता सबूत है।
    
दरअसल आर एस एस की कू क्लक्स क्लान से समान तुलना किए जाने से खुद संघी अपना मुंह छिपा रहे हैं। ये नहीं चाहते कि अमेरिकी समाज के उस हिस्से में जो जनवादी मूल्यों पर विश्वास करता है, के सामने इनका वीभत्स और बर्बर फासीवादी चेहरा उजागर हो।
    
आर एस एस की कू क्लक्स क्लान के साथ कई मामलों में समानता है। गुप्त संगठन के साथ ही माॅब लिंचिंग और फासीवादी कारगुजारियां इन्हें एक समान बनाती हैं। मगर आर एस एस स्वयं जर्मनी के नाजीवादी संस्करण के बेहद करीब है। यह इसका बेहद प्रशंसक भी है। इस मामले में हासबोले का जवाब सही है कि संघ परिवार कू क्लक्स क्लान का भारतीय संस्करण नहीं है। बस इतना जोड़ना भूल गए कि यह नाजी पार्टी का भारतीय संस्करण है। 
    
संघ परिवार की भी कू क्लक्स क्लान (के.के.के.) की तरह एक बहुसंख्यकवादी वर्चस्व की परियोजना है, जो सत्ता, हिंसा और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए अल्पसंख्यकों को दोयम दर्जे में धकेल देने को प्रेरित गतिविधियां चला रहा है। आज केंद्र से लेकर तमाम राज्यों में और सरकारी मशीनरी की हर संस्था में संघ परिवार की घुसपैठ हो चुकी है। 2014 के बाद यह घुसपैठ बहुत तेजी से बढ़ी है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री तक इसी संस्था से हैं। आज ये अपने घोषित लक्ष्य हिन्दू राष्ट्र के रूप में फासीवादी तानाशाही कायम करने के बेहद करीब खड़े हैं। 
    
मगर आर.एस.एस. और इसकी राजनीतिक पार्टी भाजपा के लिए इस ऊंचाई तक पहुंचना कारोबारियों, बड़े उद्योगपतियों (एकाधिकारी पूंजीपतियों) के सहयोग के बगैर वैसे ही नामुमकिन था जैसे हिटलर और उसकी नाजी पार्टी के लिए या फिर कू क्लक्स क्लान के लिए।
    
के.के.के. को वित्तीय और संगठनात्मक समर्थन मुख्य रूप से तीन स्रोतों से मिलाः स्थानीय व्यवसायी और उद्योगपति, एक विशाल पिरामिड स्कीम जैसी आंतरिक वित्तीय संरचना और कुछ बड़े धनी पूंजीपति। उत्तरी कैरोलीना के प्रसिद्ध उद्योगपति जूलियन शेक्सपियर कार एक खुले श्वेत वर्चस्ववादी और के.के.के. समर्थक थे। कार ने 1898 के विलमिंगटन नरसंहार, जिसमें सैकड़ों अश्वेत (काले) मारे गए थे, को ‘‘एक भव्य और गौरवशाली घटना’’ बताया और लिंचिंग का उत्सव मनाया। के.के.के. की ताकत का राज उसके पिरामिड स्कीम, स्थानीय कारोबारियों और अमीर उद्योगपतियों के खुले समर्थन और बड़े कारपोरेट घरानों के गुप्त चंदे के जहरीले मिश्रण में था। इसी गठजोड़ ने नफरत फैलाने वाले इस संगठन को एक खतरनाक राजनीतिक और सामाजिक ताकत बना दिया था। अन्यथा इस वित्तीय समर्थन के अपार सहयोग के बिना यह नामुमकिन था। 
    
यही बात आर.एस.एस. पर भी लागू होती है। इसे अडाणी, अंबानी, टाटा आदि शीर्ष पूंजीपतियों से लेकर निचले स्तर के कारोबारियों का हर तरह का समर्थन हासिल है। हालांकि शुरुवात में इसे निचले स्तर के कारोबारियों और जमींदारों का समर्थन प्राप्त था।
    
हासबोले का यह दावा कि ‘‘हिंदू दर्शन और संस्कृति सबमें एकता देखी जाती है और वर्चस्ववाद का प्रश्न ही नहीं उठता’’। होसबोले को बस इतना जोड़ना चाहिए कि यह एकता आर्थिक, सामाजिक असमानता के अंतर्विरोध को बलपूर्वक दबाकर हासिल एकता है। इस तरह की एकता बनाए रखना ही उनकी संस्कृति है। संघ के बारे में हासबोले का यह ‘दावा’ खुद इनके साहित्य में दिखता है। 
    
गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी आर अवर नेशनहुड डिफाइंड’ में लिखा कि मुसलमानों और ईसाइयों को या तो हिंदू संस्कृति और भाषा अपनाकर ‘‘हिंदू प्रजाति में विलीन हो जाना होगा’’ या फिर पूरी तरह हिंदू राष्ट्र के अधीन बिना किसी नागरिक अधिकार के रहना होगा। यह भाषा के.के.के. के ‘‘श्वेत-प्रधान अमेरिका’’ के नारों से भिन्न नहीं है, बस यहां श्वेत की जगह हिंदू को रख दिया गया है। यही नहीं, गोलवलकर ने भारत की ‘‘अल्पसंख्यक समस्या’’ के समाधान के लिए नाजियों द्वारा यहूदियों के साथ किए गए बर्ताव को भारत में लागू करने की आवश्यकता बताई। हिंदू राष्ट्रवादी अब यही काम खुलेआम अपने विविध लंपट संगठनों के जरिए कर रहे हैं। 
    
हासबोले ने आरएसएस को ‘‘सांस्कृतिक और सभ्यतागत मूल्यों से प्रेरित एक जन स्वयंसेवी आंदोलन’’ बताया, जो 83,000 शाखाओं के जरिए चरित्र निर्माण और सेवा का काम करता है। यह छवि जानबूझकर गढ़ी गई है ताकि संघ की अर्धसैनिक प्रकृति और फासीवादी प्रेरणाओं और कारगुजारियों पर पर्दा डाला जा सके।
    
फासीवादियों की आम पहचान इन बातों से की जाती है जैसे अतीत का मिथकीय स्वर्ण-युग, षड्यंत्रकारी शत्रु की धारणा, सांस्कृतिक अशुद्धता का डर, जनवाद विरोधी अर्धसैनिक संरचना का संगठन आदि। संघ इसमें पूरी तरह फिट बैठता है।
    
हासबोले ने दावा किया कि आरएसएस हिंदू पहचान को ‘‘सभ्यतागत पहचान’’ मानता है, धार्मिक नहीं। यह दावा अपनी कारगुजारियों को आवरण देना है। यह सावरकर का ‘राजनीति का हिंदूकरण करो और हिंदुओं का सैन्यीकरण करो’ का फासीवादी तौर-तरीका ही है। इस तरह ये हिंदू धर्म और इसके अनुयायियों को अपनी फासीवादी परियोजना में एक राजनीतिक औजार के रूप में इस्तेमाल करते हैं। 
    
हासबोले ने यह भी कहा कि ‘‘सांस्कृतिक मूल्य और आधुनिकीकरण परस्पर विरोधी नहीं हैं और दोनों साथ-साथ चल सकते हैं।’’ यानी पुरानी सड़ी-गली मूल्य-मान्यताओं वाली संस्कृति को समाज में परोसो। इस तरह संघ परिवार एक ओर आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करता है, इसके जरिए हर तरह की निगरानी यह अपनी सत्ता दखल के जरिए करता है वहीं दूसरी ओर इसका इस्तेमाल अपने फासिस्ट लंपट तैयार करने में करता है, अफवाह-झूठ आदि का प्रचार-प्रसार करने में करता है। इतिहास का सांप्रदायिककरण, विज्ञान में पौराणिक कथाएं घुसाना और अंधविश्वास, अतार्किकता को बढ़ावा देना और इन सबका आधुनिक तकनीक की मदद से प्रचार करना सांस्कृतिकरण और आधुनिकीकरण के घालमेल का सबूत है। गौ-रक्षा के नाम पर माॅब लिंचिंग, पत्रकारों और तर्कवादियों की हत्याएं और फिल्मों व पुस्तकों पर प्रतिबंध की मांग इनके सांस्कृतिकरण के अभियान को दिखा रही हैं।  
    
वास्तविकता यही है कि आरएसएस घोर आर्थिक और सामाजिक असमानता, अमीरी-गरीबी, मजदूर-मालिक के द्वंद पर इस तरह पर्दा डालकर ‘‘आधुनिकता’’ के रूप में एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग के ठेठ हितों को आगे बढ़ा रहा है। जबकि सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर वह मध्यकालीन सामंती मानसिकता को ही मजबूत कर रहा है। यह जहरीला मिश्रण समाज के लिए बेहद घातक है।

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