मैं आजाद हूं?

मैं आजाद हूं?

आम आदमी

मैं एक आम नागरिक हूं
मैं आजाद हूं?
वोट करने के लिए
टैक्स भरने के लिए
मगर मैं अपने नागरिक अधिकारों
की मांग नहीं कर सकता
वरना धर लिया जाऊंगा
साल दो साल के लिए अंदर कर दिया जाऊंगा।

मैं एक आम किसान हूं
मैं आजाद हूं?
धन्नासेठों के गोदाम भरने के लिए
दिन-रात खेतों में मरने के लिए
मगर मैं अपनी फसल का
उचित दाम नहीं मांग सकता
वरना लाठी डंडे और गोली खाऊंगा
आंदोलनजीवी आतंकवादी कहलाऊंगा।

मैं एक मजदूर हूं
मैं आजाद हूं? 
कारखानों में दिन-रात खटने के लिए
मालिकों के गुंडों से पिटने के लिए
मगर मैं न्यूनतम मजदूरी नहीं मांग सकता
वरना गेट से बाहर कर दिया जाऊंगा
गुंडा एक्ट में धर लिया जाऊंगा।

मैं एक नौजवान छात्र हूं
मैं आजाद हूं?
कोचिंग संस्थानों में लुटने के लिए
पढ़ लिखकर पकौड़ा तलने के लिए
मगर मैं नौकरी नहीं मांग सकता
वरना देशद्रोह के जुर्म में अंदर जाऊंगा
वामपंथी नक्सली कहलाऊंगा।

मैं एक महिला हूं
मैं आजाद हूं?
मालों का प्रचार करने के लिए
महफिलों में सजने के लिए
बाजार में बिकने के लिए
मगर मैं आजादी की मांग नहीं कर सकती
वरना बदचलन चरित्रहीन हो जाऊंगी
समाज में कुल्टा कहलाऊंगी।।
        -भारत सिंह, आंवला
 

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।