मोदी-शाह-ज्ञानेश और एस आई आर

Published
Thu, 10/01/2026 - 15:50
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अभी हाल ही में एस आई आर पर इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट आने के बाद मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार सवालों के घेरे में आ गये। रिपोर्ट के अनुसार चुनाव आयोग के दो सदस्यों विवेक जोशी और सुखबीर सिंह संधू ने एस आई आर पर पिछले 10 महीनों के अंदर 14 बार आपत्तियां उठायीं लेकिन हर बार उनकी आपत्तियों को नजरअंदाज कर दिया गया। ये आपत्तियां उनकी जानकारी के बिना फैसले लेने, फार्म 6 में नये मतदाता के लिए परिवर्तन करने, एस आई आर के तहत नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया के बारे में और वोटरों के डाटाबेस तक केन्द्रीकृत पहुंच को लेकर थीं। रिपोर्ट के आते ही विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उन पर एफ आई आर दर्ज कर मुकदमा चलाने की मांग शुरू कर दी। 
    
जब इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट छापी तो उसके बाद परत दर परत उघड़ती गयीं और ज्ञानेश कुमार के साथ-साथ मोदी-शाह की तरफ भी उंगली उठने लगीं। इसके जवाब में भाजपा ने अपने प्रवक्ता को मैदान में उतार दिया। फिल्म फ्लैशबैक में भी चलने लगी और वहां जो कुछ देखने को मिला उससे पता चला कि खिचड़ी बहुत पहले से पक रही थी। और अब जब वह जलने लगी तो बदबू उठने लगी। 
    
एस आई आर के मामले में सवाल तो पहले से उठ रहे थे। लेकिन गोवा वाले मामले ने तो मानो इस पर अपनी मुहर ही लगा दी। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के सम्बन्ध में एक आदेश दिया था कि जिन भी मतदाता के दस्तावेज के बारे में कोई भी विसंगति होगी तो उनके नाम ग्राम पंचायत भवनों, सार्वजनिक स्थानों, तालुका, उप मंडल कार्यालयों और शहरी वार्ड कार्यालयों पर विसंगतियों सहित चिपकाने होंगे और सम्बन्धित मतदाता को अपने उचित दस्तावेज जमा करने के लिए 10 दिन का समय देना होगा।   
    
इसी प्रक्रिया के तहत गोवा में भी 649 लोगों के दस्तावेजों में विसंगति पायी गयी। उसके बाद उनके दस्तावेजों की जांच हुई। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने उन दस्तावेजों की जांच के पश्चात 97 लोगों के दस्तावेजों को सही पाया और उनके नाम जोड़ने के लिए कार्यवाही शुरू की ताकि अन्तिम लिस्ट जारी होने पर उनके नाम लिस्ट में जुड़े सके। 
    
जब उन्होंने नाम जोड़ने के लिए चुनाव आयोग की साइट खोली तो पाया कि वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं। तब उन्होंने दिल्ली स्थित चुनाव आयोग को सम्पर्क किया और 7 दिनों के अंदर 8 मेल भेजने के बाद भी वे उन 97 नामों को शामिल करने में सफल नहीं हुए और अन्तिम सूची जारी होने पर उनके नाम एस आई आर की लिस्ट में नहीं थे। तब उन्होंने पाया कि दरअसल नाम जोड़ने और काटने के काम पर नियंत्रण दिल्ली स्थित टीम का है। स्वयं डी ई ओ, ई आर ओ और ए ई आर ओ जो किसी भी मतदाता का नाम जोड़ने और काटने का काम करते हैं, को यह अधिकार ही नहीं है कि वे साइट तक पहुंच सकें। यानी अगर वे किसी मतदाता के दस्तावेजों को सही ठहरा दें तो भी ये जरूरी नहीं है कि उसका नाम एस आई आर में आ जाये और वह वोट दे सके। 
    
गोवा में इन 97 वोटरों के लिए एस आई आर की सूची में नाम आना बहुत जरूरी था। इसकी वजह है कि गोवा में किसी मतदाता को ही गोवा मेडिक्लेम योजना का लाभ मिल सकता है। इससे जो सुविधायें सरकारी अस्पताल में नहीं हैं उनका इलाज वे किसी निजी अस्पताल में करवा सकते हैं यहां तक कि डायलिसिस और प्रत्यर्पण जैसे केसों में भी। यही वजह थी कि ये 97 वोटर सूची में नाम न आने पर शांत नहीं बैठे और उन्होंने लगातार प्रयास किया कि उनके नाम सूची में जुड़ सकें।
    
इसके अलावा नये वोटरों के लिए फार्म 6 भरने का नियम है जिससे वे मतदाता बन सकें। जब एस आई आर शुरू हुयी तो फार्म 6 में एक नया कालम जोड़ दिया गया जो कि गैर जरूरी और असंवैधानिक था। इस कालम में तीन प्रश्नों में से एक पर टिक करना था। पहला, क्या उनका नाम पिछले एस आई आर में था। दूसरा, क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम उस एस आई आर में था और तीसरा, क्या उनके माता-पिता या दादा-दादी का नाम एस आई आर की सूची में नहीं था। 
    
ये प्रश्न किसी नये मतदाता के लिए गैर जरूरी थे क्योंकि पहले दो प्रश्न उसकी पहचान को माता-पिता या दादा-दादी पर निर्भर बना देता था। और तीसरे प्रश्न का जवाब देने के बाद यह स्पष्ट नहीं था कि उसके बाद क्या होगा। अगर कोई नया मतदाता बनना चाहता तो इस प्रश्न के बिना फार्म की कार्यवाही आगे ही नहीं बढ़ रही थी।
    
फार्म 6 में यह प्रश्न असंवैधानिक इसलिए था क्योंकि चुनाव आयोग को यह करने का अधिकार ही नहीं था जब तक कि संसद लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में कोई संशोधन न करे। लेकिन दोनों चुनाव आयुक्तों की आपत्तियों के बाद भी यह परिवर्तन कर दिया गया। 
    
30 राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में एस आई आर होने के बाद 13 करोड़ वोटरों के नाम हटाये गये हैं। इनमें हो सकता है कि ये वोटर डुप्लीकेट हों, जिन्दा ही न हों लेकिन जिस तरह से जिन्दा लोगों को भी मृत बता कर उनके नाम सूची से गायब करने का मामला हो, सरकारी सेवा में काम करने वाले लोगों के भी नाम गायब होना, नाम जोड़ने-हटाने के काम पर केन्द्रीकृत नियंत्रण, फार्म 6 में असंवैधानिक बदलाव यह सब किसी बड़े घपले की तरफ इशारा कर रहे हैं। पीछे देखने पर हमें गृहमंत्री अमित शाह जिन्हें भाजपा चाणक्य कहती है, का वह दंभी बयान याद आता है कि 20-30 साल तक उन्हें सत्ता से कोई नहीं हटा सकता। 
    
जब से मोदी सरकार सत्ता में आयी है तब से वह संवैधानिक संस्थाओं की नाममात्र की स्वायत्तता को भी खत्म कर उसे अपना पालतू बनाने में लगी है। चुनाव आयोग नाम की संस्था के साथ भी उसने ऐसा ही किया है। चुनाव आयोग में नियुक्ति के मामले को लेकर मोदी सरकार ने पहले के सारे नियमों को बदलकर उसे अपने हाथ में ले लिया है। पहले चुनाव आयोग में नियुक्ति सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति करता था। मार्च 2023 में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया कि चुनाव आयोग में नियुक्ति के पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा नेता प्रतिपक्ष व मुख्य न्यायाधीश होंगे। इसमें तभी कोई बदलाव हो सकता है जब सरकार इसमें कानून बनाकर संशोधन कर दे। बाद में मोदी सरकार ने मुख्य चुनाव आयुक्त एवं अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और पदावधि) अधिनियम 2023 के द्वारा नियुक्ति पैनल में मुख्य न्यायाधीश को हटाकर उसकी जगह केन्द्रीय मंत्री कर दिया। इस तरह चुनाव आयोग में नियुक्ति के सम्बन्ध में सरकार की मनमर्जी तय हो गयी। इसी कानून की धारा 16 में यह प्रावधान किया गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त व अन्य चुनाव आयुक्तों के अपने पद पर रहते हुए किये गये आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए कोई भी अदालत किसी भी प्रकार का कोई दीवानी या फौजदारी मुकदमा नहीं चला सकती। यहां तक कि पद से रिटायर होने के बाद भी नहीं। ऐसे में साफ है कि चुनाव आयोग में सरकार की पसंद के लोग होंगे। और अगर वे कुछ गलत भी करते हैं तो इस कानून के तहत उन पर कोई मुकदमा भी नहीं चल सकता।
    
ज्ञानेश कुमार के खिलाफ जब विपक्ष की आवाज जोर पकड़ने लगी तो मामले पर लीपापोती के लिए तीनों चुनाव आयुक्तों ने एक प्रेस नोट जारी कर कुछ नये निर्णय सुनाये। यह प्रेस नोट चुनाव आयोग की साख बचाने के बजाय वहां चल रही गड़बड़ की स्वीकारोक्ति के रूप में अधिक देखी गयी। 
    
इसके अलावा ज्ञानेश कुमार और अमित शाह का लम्बा साथ है। ज्ञानेश कुमार मई 2016 से सितम्बर 2018 तक गृहमंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे हैं। इसके बाद वो अप्रैल 2021 तक गृहमंत्रालय में ही अतिरिक्त सचिव रहे हैं। जब 2019 में जम्मू-कश्मीर में धारा 370 खत्म की गयी तब ज्ञानेश कुमार ही उस मामले को देख रहे थे और वे अमित शाह के साथ संसद आते-जाते थे। मई 2022 से 31 जनवरी 2024 तक वे सेक्रेटरी रहे। उसके बाद वे यूनियन कापरेटिव सेक्रेटरी रहे जो अमित शाह के अधीन था। 14 मार्च 2024 में उन्हें चुनाव आयुक्त बनाया गया और 15 मार्च 2024 को ही लोकसभा के चुनावों की घोषणा हो गयी। फरवरी 25 में उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त बनाया गया। इतना ही नहीं वे राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में भी शामिल थे। यह पूरी कहानी अपने आप ही बहुत कुछ कह देती है। 
    
विपक्ष द्वारा जब मोदी-शाह और ज्ञानेश कुमार को निशाना बनाया जा रहा है तो इस सम्बन्ध में उनका कहना है कि ज्ञानेश कुमार ने लोकतंत्र की हत्या की है और इसके पीछे मोदी-शाह हैं। कि स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान वोट देने का अधिकार है। 
    
यह सही बात है कि भाजपा येन-केन प्रकारेण चुनाव जीतना चाहती है चाहे उसके लिए कुछ भी करना पड़े। लेकिन साथ ही आज अगर विपक्ष के नेताओं को लोकतंत्र की हत्या की बात उठानी पड़ रही है तो सिर्फ इसलिए कि उन्हें अब सत्ता की मलाई चाटने को नहीं मिल रही है। फासीवादी मोदी सरकार विपक्ष मुक्त भारत बनाने पर तुली हुयी है। और सिर्फ चुनाव आयोग ही नहीं इस लोकतंत्र की अन्य संवैधानिक संस्थाएं भी सरकार की ही भाषा बोल रही हैं। एस आई आर के सम्बन्ध में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर नाम हटाये गये मतदाता इस बार चुनाव में वोट नहीं दे सकते तो कोई बात नहीं अगली बार वोट दे देंगे। 
    
दरअसल यह पूंजीपतियों का लोकतंत्र है जिसमें पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए नीतियां बनती हैं। चुनाव केवल उनके लोकतंत्र को वैधानिकता प्रदान करने के लिए हैं। इस लोकतंत्र में भले ही एक व्यक्ति एक वोट का अधिकार मजदूर व पूंजीपति के एक समान नागरिक होने का बोध पैदा करता हो लेकिन हकीकत यह है कि मजदूर पूंजीपति का गुलाम है। और गुलाम व मालिक के हित एक नहीं हो सकते। और पिछले 75 साल इस बात के गवाह हैं। विपक्षी नेता इस सच्चाई पर पर्दा डालने का काम करते हैं। अपनी बारी में सत्ता में आने पर वे भी वही काम करेंगे जो आज मोदी सरकार कर रही है। लोकतंत्र की अन्य संस्थाएं उसी तरह मजदूर विरोधी काम करेंगी जैसे आज कर रही हैं। 
    
सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच चल रही इस सत्ता की लड़ाई में हो रहे खुलासों का मजदूर-मेहनतकश जनता के लिए केवल इतना अर्थ है कि पूंजीवादी लोकतंत्र की सडांध को वह पहचान सके। वह इस बात को पहचान सके कि उसका असली दुश्मन कौन है।   

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