मूत्रालय : एक भदेस कथा

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बात 1917 की है। अमेरिका के न्यूयार्क शहर में एक प्रदर्शनी का आयोजन किया गया जिसमें मूर्तिकार अपनी कलाकृतियां प्रदर्शित कर सकते थे। एक अनोखी कलाकृति ने इस प्रदर्शनी में सबका ध्यान आकर्षित किया। वह और कुछ नहीं बल्कि सामान्य मूत्रालयों में पाया जाने वाला मूत्रदान था जिस पर आर मट्ट नाम से हस्ताक्षर किया गया था। 
    
यह प्रदर्शनी उन लोगों ने आयोजित की थी जो तब परंपरा से हटकर अजीबो-गरीब कलाकृतियां निर्मित करने के हिमायती थे। उनकी कलाकृतियां अक्सर लोगों के सौंदर्य बोध को चुनौती देती थीं। एक फ्रांसीसी मूर्तिकार मार्सेल डूकैम्प ने इस प्रदर्शनी के आयोजकों के दावों की उसकी अंतिम सीमा तक परीक्षा लेने की सोची और उसी के तहत बाजार से एक सामान्य मूत्रदान खरीदकर उस पर आर मट्ट नाम से हस्ताक्षर कर प्रदर्शनी में भेज दिया। इस ‘कलाकृति’ ने आयोजकों के दावां की असल में परीक्षा कर डाली और उन्होंने इसे कलाकृति के तौर पर अस्वीकार कर दिया। 
    
आयोजकों को यह ‘कलाकृति’ भले ही स्वीकार न हुई हो पर जब इसका फोटो कला पत्रिकाओं में छपा तो इसने एक नया ही स्वरूप ग्रहण कर लिया। प्रथम विश्व युद्ध के बाद के उथल-पुथल भरे जमाने में जब तमाम अजीबो-गरीब कला के रूप सामने आ रहे थे तब इसने अपना ही नया आयाम ग्रहण कर लिया। आम इस्तेमाल की एक भदेस चीज कला की दुनिया में नयी प्रवृत्ति का वाहक बन गयी। यह प्रवृत्ति थी आम इस्तेमाल की चीजों का कलाकृति के रूप में इस्तेमाल। इसने कला और सौंदर्यबोध की पहले से चली आ रही धारणाओं को तोड़ा। भयंकर उथल-पुथल से गुजर रहा पूंजीवादी समाज कला और सौन्दर्यबोध की सामान्य धारणाओं से संतुष्ट नहीं था और अजीबो-गरीब चीजों में अपनी संतुष्टि पा रहा था। 
    
यदि मार्सेल डूकैम्प ने 1917 में कला की दुनिया में सामान्य मूत्रालय और मूत्रदान का प्रवेश कराया तो 2025 में हमारे गृहमंत्री अमित शाह को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने राजनीतिक आदर्श के क्षेत्र में या लगन-समर्पण के क्षेत्र में मूत्रालय का प्रवेश कराया। 
    
शौचालय या मूत्रालय जाना एक सामान्य प्राकृतिक जैविक क्रिया है। इसीलिए अंग्रेजी में इसे ‘नेचर्स काल’ और हिन्दी में ‘नित्य क्रिया’ बोलते हैं। अन्य सभी जैविक क्रियाओं की तरह इंसानों में इस मामले में भी विविधता होती है। कोई कम बार और कोई ज्यादा बार इनकी शरण लेता है। 
    
लेकिन पहले किसी के जेहन में नहीं आया होगा कि इस जैविक क्रिया की बारंबारता या अंतराल किसी आदर्श का विषय बन सकती है। पर हर तरह की तुच्छता में महानता ढूंढने वाले या हर तुच्छ गतिविधि को ऐतिहासिक कृत्य साबित करने वाले संघियों के एक नेता ने यह कर दिखाया। 
    
अमित शाह ने एक साक्षात्कार में शान के साथ यह बताया कि नरेन्द्र मोदी आजाद भारत के पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जो भाजपा की बैठकों में शौचालय या मूत्रालय नहीं जाते। वे अनवरत बैठे रहते हैं। 
    
उनके इस बयान के बाद विरोधियों ने कहा कि स्वघोषित गैर जैविक (नान-बायोलाजिकल) प्रधानमंत्री के लिए यह एकदम स्वाभाविक बात है। आखिर एक गैर जैविक व्यक्ति को शौचालय या मूत्रालय जाने की जरूरत क्यों होगी? उनके आवास में तो ये होने भी नहीं चाहिए। 
    
पर यदि मोदी सामान्य जैविक इंसान भी हैं तो बैठकों के दौरान शौचालय या मूत्रालय न जाना गौरव का विषय कैसे हो सकता है? इससे किस समर्पण-लगन की पहचान होती है? 
    
यदि डाक्टरों से पूछा जाये तो वे यही बताएंगे कि इस तरह का व्यवहार तमाम शारीरिक समस्याओं को जन्म देगा। बैठकों के दौरान या बैठकी काम के मामले में घंटे-दो घंटे पर कुछ देर तक टहलना शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। इसका उलटा समस्याएं पैदा करता है। रही बात देर तक मूत्रालय न जाने की तो इसका दुष्परिणाम महिलाओं से पूछा जाना चाहिए जो इस मजबूरी की वजह से अक्सर यूटीआई की शिकार हो जाती हैं। 
    
पर संघियों या संघी प्रधानमंत्री-गृहमंत्री की बात कुछ और है। वे शौचालय-मूत्रालय न जाने में ही अपनी महानता ढूंढ रहे हैं। वैसे जब महानता सूक्ष्मदर्शी से भी नजर न आ रही हो तो उसे ऐसी जगहों या ऐसी क्रियाओं में ही ढूंढ़ना पड़ता है। 
    
बेचारा डूकैम्प! उसे नहीं पता था कि एक शताब्दी बाद उसका उत्तराधिकारी संघी गृहमंत्री होगा। 

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