रोजगार नहीं जेल जाने की मोदी गारंटी

Published
Mon, 05/11/2026 - 15:50

8 मई को बिहार की राजधानी पटना में बी पी एस सी टी आर ई -4 के विज्ञापन को निकाले जाने की मांग कर रहे बेरोजगारों पर पुलिस ने लाठीचार्ज किया। और इतना ही नहीं आगे से बेरोजगारों के आंदोलन न हों इसके लिए पुलिस ने आंदोलन के लिए 4 युवाओं को साजिशकर्ता बताते हुए जेल भेज दिया है। अभी हाल ही में नोयडा और मानेसर में फूटे मज़दूर संघर्षों में भी नेतृत्वकारी मज़दूर कार्यकर्ताओं को इसी तरह फ़र्ज़ी आरोप लगाकर जेल भेज दिया गया है। अब अपने हकों के लिए जेल भेजना मोदी की पक्की गारंटी बन चुकी है। इसलिए बिहार सरकार ने 4 नामजद लोगों सहित कुल 5000 अज्ञात लोगों पर एफ आई आर दर्ज की है।

दरअसल मामला यह है कि बिहार लोक सेवा आयोग 2024 से चार विभागों में 46,882 पद निकालने की बात कर रहा है। हर बार तारीख़ तय होने से पहले ही टल जाती रही है। अभी आयोग ने यह घोषणा की थी कि 19 अप्रैल को विज्ञापन प्रकाशित होगा और 25-26 अप्रैल से फार्म भरने शुरु हो जाएंगे। लेकिन जब 8 मई तक भी विज्ञापन प्रकाशित नहीं हुआ तो बेरोजगारों का 2 साल का आक्रोश फूट गया और वे विज्ञापन को प्रकाशित करने की मांग को लेकर सड़क पर उतर आये। बदले में उन्हें पुलिस की लाठियां मिलीं।

जिन चार विभागों में नौकरी के लिए आवेदन होने हैं उनमें शिक्षा विभाग, पिछड़ा एवं अति पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग, अनुसूचित जाति एवं जनजाति कल्याण विभाग तथा अल्पसंख्यक कल्याण विभाग हैं। इनमें सर्वाधिक पद शिक्षा विभाग में ही हैं। इनमें प्राथमिक (1-5) में 10,778, मध्य विद्यालय (6-8) में 8,583, माध्यमिक विद्यालय (9-10) में 9,082 और उच्च माध्यमिक (11-12) में 16,774 पदों पर भर्ती होनी है। 

मोदी राज में सरकारी नौकरी युवाओं के लिए अब एक दुस्वप्न बन चुकी है। अब तक बेरोजगारों पर केवल लाठीचार्ज ही होता था लेकिन अब आंदोलनों का अपराधीकरण किया जा रहा है। मोदी सरकार द्वारा बनाये गये तीन अपराधिक कानून इसमें अपनी पूरी भूमिका निभा रहे हैं।

आलेख

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शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

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पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।