आतंकवाद के नाम पर मजदूरों को आतंकित करने की कोशिश

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दिल्ली लाल किले के पास विस्फोट और कश्मीर में हुई हालिया विस्फोट की घटना के बाद पूरे देश में आतंकवाद के नाम पर सरकार द्वारा आतंक कायम किया जा रहा है। अल्पसंख्यकों के खिलाफ जहरीला प्रचार किया जा रहा है। ‘आतंक के नये माड्यूल’ की बातें कर सभी पढ़े-लिखे मुसलमानों को सम्भावित आतंकवादी के रूप में पेश किया जा रहा है। इस काम में भाजपा-आरएसएस का सोशल मीडिया, कारपोरेट मीडिया और भाजपा शासित प्रदेशों की सरकारें खुलेआम लगी हुई हैं।
    
आतंक पैदा करने वाले इस दुष्प्रचार का शिकार वे गरीब मजदूर भी बन रहे हैं जो काम की तलाश में एक राज्य से दूसरे राज्य जा रहे हैं। ऐसी ही एक घटना असम में घटी। दरअसल 44 मजदूर काम की तलाश में जम्मू-कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश जा रहे थे। असम तिनसुकिया रेलवे स्टेशन पर कुछ स्थानीय लोगों के कहने पर पुलिस ने इन मजदूरों को आतंकवादी होने के शक पर हिरासत में ले लिया। गौरतलब है कि इसी तरह की हिरासत 15 नवम्बर को तेजपुर असम में भी की गयी थी। जिसमें 24 मजदूरों को स्थानीय लोगों द्वारा पहले हिरासत में लिया गया और फिर प्रशासन ने थाने ले जाकर उनसे गहन पूछताछ की थी। जाहिर सी बात है इन स्थानीय लोगों के दिमाग में आतंकवादी होने की एक तस्वीर बनाई गयी है जिसमें किसी का कश्मीरी होना, मुसलमान होना, गरीब होना इनके आतंकवादी होने की तस्वीर पूरी कर देता है।
    
मजदूरों को कई घंटे हिरासत में रहना पड़ा। अपने निर्दोष होने के सबूत देने पडे़। इस दौरान उन्हें न जाने कितनी मानसिक प्रताडना का शिकार होना पड़ा होगा। इस हिरासत और पूछताछ के कारण उनकी ट्रेन छूट जाने के कारण उन्हें और भी कष्ट भोगना पड़ा होगा।
    
नागरिकों को इस तरह से कष्ट देना, उन्हें परेशानी में डालने का न तो शासन-प्रशासन को कोई अफसोस है न ही उन स्थानीय लोगों को जिन्होंने आतंकवाद की एक झूठी तस्वीर खुद के दिमाग में बना रखी है। आम गरीब मजदूरों के इस कष्ट को सुरक्षा के नाम पर जायज ठहरा दिया जाता है। ढेरों बार तो जान बूझकर संघ-भाजपा के लंपट अपना राजनैतिक कैरियर बनाने के लिए निर्दोष मेहनतकश मुसलमानों पर मनगढ़न्त आरोप लगा साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाने की कोशिश करते रहते हैं। पुलिस-प्रशासन उनकी इन हरकतों पर मौन साध उन्हें बढ़ावा देता रहता है। हिन्दू फासीवाद के आतंक का शिकार भले ही आज मुसलमान हो रहे हों पर कल सारे समाज को ही इस आतंक के दुष्परिणाम भुगतने पड़ेंगे। 

आलेख

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मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

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अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

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एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।

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इस मजदूर आंदोलन की विचारधारा मार्क्सवाद का यह स्पष्ट कहना था कि महान फ्रांसीसी क्रांति के जमाने से ही पूंजीपति वर्ग ने अपने समाज के लिए जो आदर्श घोषित कर रखा है- स्वतंत्रता, समता, बंधुत्व का आदर्श- वह पूंजीवाद की निजी सम्पत्ति के कारण कभी भी हासिल नहीं किया जा सकता। पूंजी के रूप में निजी सम्पत्ति के रहते स्वतंत्रता का मतलब होगा बाजार में खरीद-बेच की स्वतंत्रता, समता का मतलब होगा बाजार में खरीददार व विक्रेता की समता तथा बंधुत्व का मतलब होगा खरीद-बेच की व्यवस्था पर सहमति।

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गाजापट्टी में इजरायल की कत्लेआम करने की मुहिम जारी है। इजरायली यहूदी नस्लवादी न तो किसी समझौते को मान रहे हैं और न ही वे अपनी विनाश लीला को रोक रहे हैं। वे नस्लीय सफाये की मुहिम चला रहे हैं। इसके जवाब में हमास और अन्य प्रतिरोध संगठन इजरायली कब्जाकारी सेना पर प्रहार कर रहे हैं।