प्रांतीय सरकारों को पंगु बनाने वाला फैसला

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हिंदू राष्ट्रवादी अपनी फासीवादी मंशा को लगातार आगे बढ़ाते जा रहे हैं। जो विरोध या जो फैसले उनकी राह में रोड़े बनते हैं फिलहाल वे उन्हें भी हटाकर आगे बढ़ने में कामयाब हो जा रहे हैं। सत्ता के स्तर पर देखा जाये तो हिंदू फासीवादी विपक्षी पूंजीवादी पार्टियों को भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहे हैं। करें भी क्यों? आखिर एकाधिकारी पूंजी ने, यूं ही उन्हें सत्ता नहीं सौंपी है। जिस विपक्ष के परोक्ष-प्रत्यक्ष सहयोग से संघी सत्ता पर पहुंचे हैं उन्हीं को किनारे लगाने में लगे हुए हैं।
    
एक ओर वे पार्टियों में तोड़-फोड़ मचा रहे हैं तो दूसरी ओर जहां कहीं भी विपक्षी पार्टियों की सरकारें हैं, उनका काम करना बेहद मुश्किल कर दे रही है। यदि अन्य की चर्चा न की जाए केवल तमिलनाडु मामले पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले की बात की जाये तो तस्वीर बिल्कुल साफ हो जाएगी।
    
तमिलनाडु की स्तालिन की अगुवाई वाली डी एम के पार्टी की सरकार ने विधान सभा में दो बार तकरीबन 10 बिल पारित किए जो बहुमत से पास हुए और फिर राज्यपाल के पास अनुमोदन के लिए भेजे गए। मगर राज्यपाल आर एन रवि इन बिलों पर कुण्डली मारकर बैठ गए। 2020 से इन्हें मंजूरी नहीं दी। इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और साल 2024 के अप्रैल माह में कोर्ट ने फैसला राज्य सरकार के पक्ष में सुनाया तथा राज्यपाल की तानाशाही पर रोक लगा दी।
    
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एसबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि अगर कोई राज्यपाल पहली बार बिल पर असहमति जताते हैं और राज्य विधानसभा उसे दोबारा भेजती है, तो वे उसे राष्ट्रपति के पास नहीं भेज सकते। कोर्ट ने कहा कि ऐसे सभी बिल दोबारा प्रस्तुत करने की तारीख से स्वीकृत माने जाएंगे। इन बिलों में सबसे प्रमुख था- कुलपति नियुक्ति बिल, जो राज्यपाल के अधिकार को सीमित करता है। राज्यपाल को विश्वविद्यालयों में उपकुलपति नियुक्त करने की शक्ति को सीमित करता है और इस तरह केंद्र के मनमानेपन और दखलंदाजी को सीमित करता है।
    
कोर्ट ने तब कहा कि संविधान के अनुच्छेद 200 (Article 200) के तहत राज्यपाल के पास तीन ही विकल्प होते हैं- बिल को मंजूरी देना, बिल से असहमति जताना या बिल को राष्ट्रपति को भेजना। इस तरह कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि यह सभी प्रक्रिया एक माह यानी 30 दिन की समय सीमा में पूरी होनी चाहिए। राज्यपाल की शक्तियां पूरी तरह संसदीय लोकतंत्र की भावना के अधीन हैं। राज्यपाल के पास वीटो शक्ति नहीं है। राज्यपाल का अनिश्चित काल तक बिल को रोकना असंवैधानिक और मनमाना है। कोर्ट ने इसी तरह अनुच्छेद 201 में यानी राज्यपाल द्वारा राष्ट्रपति के अनुमोदन हेतु बिल भेजे जाने पर राष्ट्रपति के लिए भी समय सीमा तय कर दी। कोर्ट ने फैसले में कहा कि राष्ट्रपति को 90 दिन के भीतर फैसला ले लेना होगा। विलंबित कार्रवाई असंवैधानिक मानी जाएगी और सरकार न्यायालय में परमादेश रिट के लिए अपील कर सकती है। साथ ही समय सीमा पार होने पर बिल को स्वतः सहमति मानने के (deemed assent) आधार पर कानून मान लिया जाएगा।
    
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले ने हिंदू फासीवादियों में खलबली मचाई, आखिर कोर्ट संघियों के होते हुए ऐसी गुस्ताखी कैसे कर सकता था। फासीवाद के तांडव के दौर में जनवाद, संघवाद की बातें कैसे मुमकिन हैं। संघी सरकार ने राष्ट्रपति के हवाले से कई सवाल सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पेश कर दिए। जिसका जवाब न्यायपालिका को देना था। ये सवाल बिल को, समय सीमा पर फैसले न लेने पर स्वतः (डीम्ड एसेट) कानून मान लेने, राष्ट्रपति और राज्यपाल की बिल के मामले में समय सीमा को तय किए जाने, न्यायपालिका के विधायिका में हस्तक्षेप की सीमा आदि से जुड़े हुए थे। सवाल अनुच्छेद 143 के तहत पूछे गए जबकि अप्रैल 2024 वाला फैसला अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल करके कोर्ट ने दिया था।
    
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति के जरिए भेजे गए सवालों पर फैसले के लिए पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ गठित की। उम्मीद थी कि लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को संविधान का कथित बुनियादी ढांचा बताने वाले सुप्रीम कोर्ट की पीठ इसी आधार पर फैसला देगी। मगर इस पीठ ने सर्वसम्मति से पिछले फैसले को उलट दिया। पांच सदस्यों में जस्टिस सूर्यकांत भी थे जो अब भारत के मुख्य न्यायाधीश बन चुके हैं। आगे का सूरते हाल इससे समझ में आ सकता है। लोकतंत्र की खूब गरमागरम बात करने वाले अब भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश गवई भी पीठ का हिस्सा थे।
    
पांच जजों की इस पीठ ने अपने फैसले में कहा कि न्यायपालिका इस मामले में राज्यपाल या राष्ट्रपति को विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए किसी निश्चित समय-सीमा में नहीं बांध सकता। अदालत ने माना कि ऐसा करना संविधान की मूल भावना के विपरीत होगा, क्योंकि संविधान ने इन पदों को विवेकाधिकार और परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान की है।
    
पीठ ने यह भी कहा कि यदि राज्यपाल या राष्ट्रपति विधेयक पर निर्णय लेने में अत्यधिक देरी
करते हैं, तो भी सर्वोच्च न्यायालय अपनी अनुच्छेद 142 के तहत की विशेष शक्तियों का प्रयोग करके
स्वयं उस विधेयक को मंजूरी नहीं दे सकता। अदालत ने माना कि विधेयक को कानून का रूप देना एक
विधायी प्रक्रिया है, जिसमें न्यायपालिका का हस्तक्षेप शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत का उल्लंघन करेगा।
    
पीठ ने अनुच्छेद 200 के मामले पर कहा कि इसके तहत राज्यपाल के पास विधेयकों के संबंध में तीन विकल्प हैं- सहमति देना, विचार के लिए राष्ट्रपति को भेजना, या विधानसभा का पुनर्विचार के लिए लौटाना। इस फैसले के अनुसार, राज्यपाल इन विकल्पों का इस्तेमाल करते समय मंत्रिपरिषद की सलाह से बंधे नहीं हैं, जो कि एक निर्वाचित सरकार की कार्यकारी शक्तियों के सिद्धांत के विपरीत प्रतीत होता है। कोर्ट ने कहा, ‘‘पहले ही यह मान लिया गया है कि गवर्नर के पास सिर्फ रोक लगाने की शक्ति नहीं है, हम पाते हैं कि गवर्नर के पास किसी बिल को राष्ट्रपति के विचार के लिए भेजने या अपनी टिप्पणियों के साथ बिल को विधायिका को वापस भेजने के संदर्भ में अपनी समझ का अधिकार है हालांकि इससे गवर्नर को कोई बिना रोक-टोक वाली शक्ति नहीं मिलती।
    
कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया कि आर्टिकल 142 के तहत दी गई शक्ति का इस्तेमाल गवर्नर के फैसलों को बदलने के लिए किया जा सकता है। इसने कहा कि आर्टिकल 200 और 201 के संदर्भ में ‘डीम्ड एसेंट’ का कॉन्सेप्ट यह मानता है कि कोर्ट गवर्नर या प्रेसिडेंट के लिए ‘बदलाव की भूमिका’ निभा सकता है।    
    
लब्बोलुआब यह हुआ कि मसला जहां से शुरू हुआ था वहीं पहुंच गया। पंजाब और तमिलनाडु दोनों जगह पर राज्य की विधानसभाओं द्वारा पारित किए गए और अनुमोदन के लिए भेजे गए बिल पर, राज्यपाल कुंडली मार के बैठ गए।
    
वैसे ऐसा पहली बार नहीं हुआ। कांग्रेस से ही यह सब कुछ सीखकर भाजपा और मोदी बड़े हुए हैं। 2011 में केरल सरकार ने विधानसभा में एक बिल पास किया था। यह था- प्लाचीमाडा कोका-कोला विक्टिम्स रिलीफ बिल, 2011। इसका उद्देश्य प्लाचीमाडा में कोका-कोला कंपनी से भूजल और पर्यावरण को पहुंचाए गए नुकसान के लिए पीड़ितों को मुआवजा दिलाना था। विधेयक को राज्यपाल ने राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए आरक्षित (त्मेमतअम) कर दिया। 2011 से 2014 के बीच केंद्र सरकार ने इसे न तो खारिज किया और न ही मंजूरी दी, बल्कि इसे विभिन्न मंत्रालयों के बीच राय लेने के नाम पर घुमाया जाता रहा। अंततः 2015-16 में राष्ट्रपति ने इसे बिना मंजूरी के लौटा दिया, यह कहते हुए कि यह राष्ट्रीय हरित अधिकरण (छळज्) के अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करता है।
    
फिलहाल कोर्ट का यह फैसला संविधान के अपने बुनियादी ढांचे के हिसाब से ही हुआ है। बुनियादी ढांचा एकाधिकारी पूंजी के हितों के हिसाब से राजसत्ता का संचालन करना सुनिश्चित करता है। संविधान में भारत को ‘राज्यों का संघ’ कहा गया, पर वास्तव में वह कहने भर का ही था। यह ब्रिटिश जमाने के अधिनियम 1935 की ही नकल था। बस यहां घुमा फिराकर बात की गई थी। तब राज्यपाल और गवर्नर जनरल ही सर्वेसर्वा थे। ये ब्रिटिश साम्राज्य के प्रति जवाबदेह थे और साम्राज्यवादी शासकों के हितों के हिसाब से बने कानूनों को लागू करते थे। आजाद भारत के संविधान में यही प्रावधान केंद्र और प्रांतों के संबंध में सामने आया। यही आजाद भारत के लिए एकाधिकारी पूंजी की जरूरत थी। कहने को भारत प्रांतों का संघ था मगर व्यवहार में प्रांत, केंद्र के मातहत था।
    
अन्य कानूनी प्रावधानों को छोड़ भी दें तो राज्यपाल केंद्र के एजेंट के बतौर ही काम करता है और इसकी सलाह या परामर्श से प्रांत सरकार भंग भी की जा सकती है। इस तरह एक तरफ केंद्र अपनी तानाशाही प्रांतों पर थोपता है तो दूसरी तरफ प्रांत की जनता के मतों से चुनी गई प्रांतीय सरकार को केंद्र सरकार कभी भी मनमाने तरीके से गिरा सकती है या अपने हिसाब से ढाल सकती है।
    
सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ का फैसला नजीर माना जाएगा। मोदी शाह की सरकार अपने राज्यपाल के द्वारा राज्य में विपक्ष की सरकार का मनमुताबिक काम ना करने पर चलना मुश्किल कर देगी। इस तरह विधानसभा और प्रांत सरकार हिंदू राष्ट्रवादियों के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचने को मजबूर हो जाएगी। यह अलग बात है कि जनता के जीवन में इससे बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा क्योंकि विपक्ष भी जन विरोधी है और पूंजीपरस्त है।

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