दिल्ली छोड़ दीजिए!

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जी हां! आजकल दिल्ली के डाक्टर अस्पतालों में आने वाले सांस के मरीजों से यही कह रहे हैं। जो कोई भी फेफड़े, सांस लेने में परेशानी की शिकायत लेकर आ रहे हैं उनसे डाक्टर यही कह रहे हैं। डाक्टर यह राय दिल्ली में प्रदूषण के खतरनाक स्तर पर पहुंचने के कारण दे रहे हैं। डाक्टरों के पास पहुंचने वाले केवल मरीज ही नहीं हैं बल्कि वे लोग भी हैं जो कि स्वस्थ हैं। बस आजकल दिल्ली की हवा इतनी जहरीली हो गई है कि स्वस्थ लोग भी इस जहर के कारण बीमार पड़ रहे हैं।
    
दिल्ली सहित पूरे उत्तर भारत की हवा का आलम यही है। यही नहीं प्रधानमंत्री मोदी जी के नाम की तरह भारत के अधिकतर शहर पिछले 10 सालों में दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में अपना नाम दर्ज करा रहे हैं। दिल्ली तो दुनिया में सबसे प्रदूषित शहर का कीर्तिमान रच चुकी है।
    
ए क्यू आई (वायु गुणवत्ता सूचकांक) हवा में मौजूद प्रदूषकों की सांद्रता को एक सरल संख्या (0 से 500) में बदलकर स्वास्थ्य जोखिम बताता है, जिसकी केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) द्वारा भारत में निगरानी की जाती है। इसे मापने के लिए वायु गुणवत्ता निगरानी स्टेशनों पर उपकरणों से बहुत ही सूक्ष्म कण जैसे चPM 2.5 व PM 10, नाइट्रोजन डाई आक्साइड (NO2),  सल्फर डाई आक्साइड (SO2), कार्बन मोनो आक्साइड (CO), जैसे आठ प्रमुख प्रदूषकों की माप ली जाती है।
    
ए क्यू आई अगर 1 से 50 के बीच है तो कोई खतरा नहीं, अगर 200 से ऊपर है तो सभी के लिए खतनाक होता है। लेकिन दिल्ली का ए क्यू आई 500 के पार जा रहा है। हालांकि WHO के मानक इससे कठोर हैं। WHO के मानक के अनुसार 20 से ज्यादा AQI सही नहीं है। 
    
PM 2.5 जैसे महीन कण साधारण मास्क से नहीं रोके जा सकते हैं। वे सांसों के जरिए फेफड़े और फिर खून में मिलकर पूरे शरीर में पहुंच जाते हैं। जिसका न सिर्फ श्वसन तंत्र पर असर पड़ता है अपितु सूक्ष्म कण फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश करके सूजन और आक्सीडेटिव तनाव उत्पन्न करते हैं, जिससे खांसी, घरघराहट, सांस लेने में कठिनाई, अस्थमा, निमोनिया और फेफड़ों के कैंसर का खतरा बढ़ता है। एक अनुमान के अनुसार दिल्ली में 22 लाख बच्चों के फेफड़ों को अपरिवर्तनीय क्षति हो चुकी है। प्रदूषित हवा रक्त वाहिकाओं को नुकसान पहुंचाती है, रक्तचाप बढ़ाती है और दिल के दौरे, स्ट्रोक का जोखिम बढ़ाती है।
    
लंबे समय तक प्रदूषण के संपर्क में रहने से प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होती है, मधुमेह और अन्य चयापचय विकारों का खतरा बढ़ता है, मस्तिष्क स्वास्थ्य और संज्ञानात्मक कार्यों में कमी आती है, तथा डिमेंशिया का जोखिम बढ़ता है। इसके अलावा, आंखों में जलन, त्वचा की समस्याएं, हार्मोनल असंतुलन और प्रजनन क्षमता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
    
दिल्ली में प्रदूषण का मसला अब सिर्फ पर्यावरणवादियों या फिर सिविल सोसाइटी का ही मुद्दा नहीं रह गया है बल्कि यह आम जनता का भी मुद्दा बन गया है। हर कोई इस जहर के असर को महसूस कर सकता है। एक तरफ साधन संपन्न लोग प्रदूषण से बचने के लिए घरों में कैद हो सकते हैं, अपने घरों को वायु प्रदूषण से मुक्त रखने के उपाय कर सकते हैं, एयर प्यूरीफायर खरीद सकते हैं। वहीं दूसरी तरफ मजदूर मेहनतकश आबादी के लिए घर से बाहर निकलने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। अगर वह घर से बाहर न निकले तो भूख से मरेंगे, अगर घर से बाहर निकले तो धीरे-धीरे प्रदूषण से मरेंगे। दिल्ली में 2023 में प्रदूषण से 17,188 मौतें (हर 7वीं मौत) हुईं जो 2018 के 15,786 से अधिक है। कुल मौतों का 15 प्रतिशत प्रदूषण से जुड़ा है। 
    
दिल्ली सहित उत्तर भारत की हालत ठीक नहीं है। दिल्ली में प्रदूषण के कई कारण हैं जिसमें से प्रमुख कारण गाड़ियों का है। 50 प्रतिशत प्रदूषण का कारण दिल्ली की मोटरगाड़ियों का है। फैक्टरियों का धुंआ व खेतों में जलती पराली भी वजह बनती है। दिल्ली में निजी वाहन कम कर सार्वजनिक वाहन बढ़ा मोटर गाड़ियों का प्रदूषण कम किया जा सकता है। निर्माण कामों व सड़क पर उड़ती धूल भी एक स्रोत बनता है। शहर में कचरा प्रबंधन की विफलता व इसे जलाना भी प्रदूषण की वजह बनता है। ये कारण ऐसे नहीं हैं जिन्हें दूर नहीं किया जा सकता। पर सरकारें इस दिशा में खर्च व ध्यान देने को तैयार नहीं हैं। दीवाली में पटाखों के प्रदूषण ने भी इसमें योगदान किया है। 
    
लेकिन दिल्ली में प्रदूषण की समस्या के बारे में बात करते हुए दिल्ली की मौजूदा भाजपा सरकार आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार को दोष देते हुए कहती है कि पिछले 10 सालों में तो इन्हीं का शासन था। हम इन्हीं का कूड़ा साफ कर रहे हैं लेकिन यह याद करने वाली बात है कि दिल्ली में जब विधानसभा के चुनाव हुए तो उसमें से प्रदूषण एक प्रमुख मसला था। भाजपा सरकार की तीन इंजन की सरकार जिसमें केन्द्र, राज्य की सरकार और दिल्ली नगर निगम तीनों में ही भाजपा की सरकार है। इस 3 इंजन की सरकार ने केजरीवाल से बेहतर हवा और बेहतर पानी की बात की थी। लेकिन भाजपा की यह तीन इंजन की सरकार दिल्ली के निवासियों को साफ हवा बिल्कुल भी न दे सकी। 
    
यूं तो आमतौर पर दिल्ली की हवा जाड़ों के मौसम में काफी जहरीली हो जाती है। हवा के बहाव में कमी, हवा में नमी के कारण दिल्ली और उत्तर भारत सहित कई शहरों में इस वक्त प्रदूषण ज्यादा हो जाता है।
    
लेकिन असल सवाल इस समस्या को हल करने का है। न तो आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार की नौटंकी इस समस्या का कोई हल कर पाई और न ही भाजपा सरकार ही काम की रही है। फासीवादी भाजपा सरकार की समस्या यह है कि यह पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या को ढंकने की कोशिश कर रही है। यह इस सिद्धांत पर काम करती है कि चीजों को जैसे पेश करो वह चीज वैसे ही बन जाती है। इसका मतलब है कि हवा और पानी को साफ दिखाओ जिससे जनता को लगे कि सब कुछ ठीक है। इसके लिए फासीवादी भाजपा सरकार ने दो तरीके अपनाए। एक तरफ उसने एक ।फप् मानिटर्स के आस-पास पानी का छिड़काव किया जिससे कि मानिटर्स प्रदूषण को कम दिखाए और वहीं दूसरी तरफ यमुना नदी में उठने वाले झाग जो कि तमाम सारी फैक्टरियों और गंदे नाले के पानी की वजह से बनता है उसको ढकने के लिए उस पर केमिकल का छिड़काव किया। स्वच्छ हवा की मांग करने वाले प्रदर्शनकारियों का दमन कर उन्हें जेल भेजा। फासीवादियों की यही प्रतिक्रिया असल में इस समस्या को और बढ़ा देती है। वह अपनी छवि को जैसा दिखाना चाहते हैं वैसा ही पर्यावरण और वायु प्रदूषण के मानिटर के मामले में भी करते हैं। वह सब कुछ को मैनेज करना चाहते हैं। अगर ऐसे नहीं तो वैसे।
 

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