गिरता रुपया बढ़ता मौन

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कभी मोदी ने रुपये के मूल्य को तब के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के इकबाल से जोड़ दिया था। और कहा था कि दोनों में होड़ मची है कि कौन कितने नीचे गिरता है। आजकल जब रुपया लगातार नीचे गिर रहा है तब सवाल उठ रहा है कि अब क्या है। परन्तु मोदी वैसे ही चुप हैं जैसे वे मणिपुर संकट के समय चुप थे। या उस समय चुप थे जब विपक्ष लगातार आरोप लगा रहा था कि चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा कर लिया है। या फिर उस समय चुप थे जब मोदी के मित्र ट्रम्प अप्रवासी भारतीयों को हथकड़ी पहनाकर जबरदस्ती जहाज में ठूंसकर, अपमानजनक ढंग से भारत भेज रहे थे। रुपया प्रतिदिन गिरता जा रहा है परन्तु मोदी जी के मुंह से एक लफ्ज नहीं फूट रहा है। रिजर्व बैंक आफ इण्डिया रुपये के गिरने के कारण तो बता रहा है परन्तु उसकी गिरावट रोकने में अक्षम है। 26 नवम्बर तक रुपया गिरते-गिरते प्रति डालर 89.21 रुपये के बराबर हो गया था। 
    
रुपये की बढ़ती गिरावट का कारण रिजर्व बैंक आफ इण्डिया ने डालर की बढ़ती मांग को बताया। यह सिर्फ एक बहाना है। असल में भारत का रुपया एशिया ही नहीं दुनिया की सबसे कमजोर प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में शामिल है। मोदी सरकार अपनी अर्थव्यवस्था के चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था (अभी भारत पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था है) बनने के कितने ही दावे करती हो परन्तु यह भारत की मजबूती के नहीं बल्कि अन्य व्यवस्थाओं के साथ पूरी दुनिया में बढ़ते आर्थिक संकट का परिणाम है। भारत की अर्थव्यवस्था के वृद्धि सहित सभी आंकड़े संदेह के दायरे में रहे हैं। मोदी सरकार ने जिस तरह से राजनीति में बाजीगिरी दिखायी हुयी है वही काम वह अर्थव्यवस्था के साथ कर रही है। ट्रम्प के आगे समर्पण की मुद्रा के कारण वह भारत के इकबाल को गहरा नुकसान पहुंचा रही है। अमेरिका अपनी शर्तों पर भारत से व्यापार समझौता चाहता है। और मोदी सरकार पीछे का वह रास्ता ढूंढ रही है जहां से वह निकलकर अपनी जान व इज्जत बचा सके। वह राष्ट्रवाद का धूम्रावरण तैयार कर रही है ताकि उसकी आड़ में अपने समर्पण को छुपा सके। पर गिरता रुपया उसकी पोल खोल दे रहा है। 
    
तेजी से रुपये का गिरना भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बढ़ते खतरे के रूप में उभर रहा है। 

आलेख

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अमरीकी साम्राज्यवादी वर्चस्व को बढ़ाने में पश्चिम एशिया में दृढ़ स्तम्भ इजरायल रहा है। 1979 से पहले ईरान का शासक शाह रजा पहलवी  भी इस क्षेत्र में अमरीका का लठैत रहा है। 1979 में रजा पहलवी का तख्ता उलटने के बाद जो इस्लामी सत्ता आयी, वह लगातार अमरीकी साम्राज्यवाद की वर्चस्ववादी नीतियों का विरोध करती रही थी। यह सत्ता इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों को उजाड़े जाने और उनकी जमीनों पर यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करती रही है।

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शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी शासक भी दुनिया को यह जताने में लगे हुए हैं कि उनका अमेरिका से टकराने का कोई इरादा नहीं है। वे सबके साथ साझेदारी की बात कर सकते हैं। यानी अमेरिका व चीन साथ-साथ सारी दुनिया में छा सकते हैं।

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जेनरेशन जेड की युवा पीढ़ी को संघी ताकतें समझा रही हैं कि वे काॅकरोच जनता पार्टी के बहकावे में न आयें। वे मोदी के साथ खड़े रहें। वहीं काॅकरोच जनता पार्टी युवाओं के आक्रोश-दर्द को मुद्दा बना उन्हें बुराई मुक्त पूंजीवाद का ख्वाब परोस रही हैं। ऐसे में युवाओं को सही रास्ता तलाशना होगा। सही रास्ता इन दोनों रास्तों से अलग शहीदे आजम भगत सिंह का रास्ता है

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हिंदू फासीवादियों के लिए बिहार एस आई आर की पहली प्रयोगशाला थी। पश्चिम बंगाल  निशाने पर लंबे समय से ही था। ये तमाम प्रयास के बावजूद यहां की सत्ता से काफी दूर थे। चुनाव आयोग के जरिए एस आई आर और गृह मंत्रालय के अधीन अर्ध सैनिक बलों के दम पर इस किले को फतह करना हिंदू राष्ट्रवादियों का खास मकसद था। अंततः इस चुनाव में यहां की सत्ता को गिरफ्त में लेने में ये सफल हो चुके हैं। 

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दूसरे विश्व युद्ध के बाद साम्राज्यवादी देशों में पूंजीपति वर्ग ने ‘कल्याणकारी राज्य’ कायम किये जिसके पीछे समाजवादी खेमे का दबाव तो था ही साथ ही उन देशों में संगठित मजदूर आंदोलन का भी भय था जो पहले विश्व युद्ध के बाद फिर उठ खड़ा हुआ था। दो विश्व युद्धों की तबाही और महामंदी की विभीषिका से उसका क्रांतिकारी तेवर भी था जिसे पूंजीपति वर्ग नजरअंदाज नहीं कर सकता था।