गन्ना-चीनी और महिला मजदूर

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चीनी हर घर की रसोई में इस्तेमाल होती है। ज्यादातर खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों में इसका इस्तेमाल होता है। पर शायद ही चीनी खाते हुए कोई इसकी उत्पादन प्रक्रिया में महिला मजदूरों के क्रूर शोषण का अहसास कर पाता हो। वास्तविकता यही है कि चीनी के हर दाने के पीछे शोषण की एक गाथा छिपी है। 
    
महाराष्ट्र में चीनी मिलों का स्वामित्व बजाज, डालमिया सरीखे बड़े समूहों के पास है। ये मिलें गन्ने के बड़े ठेकेदारों के जरिये गन्ना खरीदती हैं। ये गन्ना ठेकेदार खेतिहर परिवारों को अग्रिम भुगतान कर गन्ने की खेती करवाते हैं। फसल उत्पादन पर फसल के दाम व अग्रिम भुगतान का लेखा जोखा होता है। इस तरह की ठेका खेती में लेखा जोखा भी ज्यादातर ठेकेदारों के पक्ष में व किसानों के खिलाफ होता है। किसान इन ठेकेदारों के कर्ज तले हमेशा पिसते रहते हैं। 
    
कर्ज चुकाने व अधिक फसल पैदा करने की खातिर ये किसान खेतों में कड़ी मेहनत करते हैं। यहां तक कि फसल की रक्षा में वे खेतों में ही घर बसा लेते हैं। गन्ना उत्पादन में वर्ष भर इन्हें खेतों में काम करना पड़ता है। जिस दिन ये खेतों में काम नहीं करते उस दिन कहीं और मजदूरी कर रहे होते हैं। छोटे किसानों का जीवन इस कदर तंगहाल है कि एक दिन भी काम छोड़ना इनके लिए संभव नहीं है। ऐेसे में महिलायें अधिक तनाव का शिकार होती हैं। वे गर्भावस्था, मासिक धर्म के दौरान भी काम करने को मजबूर होती हैं। खेतों में तंबू में रहते हुए वे कई बीमारियों का शिकार भी हो जाती हैं। 
    
ऐसे में महाराष्ट्र में एक प्रवृत्ति बढ़ रही हे वह यह कि महिलायें मजबूर हो कर आपरेशन कराकर अपना गर्भाशय हटा दे रही हैं। वे देखती हैं कि मासिक धर्म न आने वाली महिलायें ज्यादा समय तक काम कर सकती हैं। इसलिए वे अपने गर्भाशय को हटवा कर अपनी भूख से लड़ रही हैं। ज्यादाततर गर्भाशय हटवाने वाली महिलायें 35-40 वर्ष की हैं पर कुछ महिलायें 20-30 वर्ष की भी हैं। महाराष्ट्र के बीड जिले में गर्भाशय उच्छेदन सर्जरी कराने वाली महिलाओं की दर शेष भारत की दर से कई गुना अधिक है। कई बार महिलायें मां बनने से इंकार करने को भी मजबूर हो रही हैं। 
    
1991 के बाद गन्ने का नकदी फसल के रूप में प्रसार व कृषि को बाजार के अनुरूप ढालने से छोटे उत्पादकों पर दबाव काफी बढ़़ गया। मोदी काल में कृषि क्षेत्र में बड़ी पूंजी के प्रवेश ने व ठेका खेती ने किसानों-मजदूरों की दुर्दशा को और बढ़ा दिया। ठेकेदार छोटे किसानों को सीधे भी ठेका दे रहे हैं। और कई दफा किसानों से बड़े पैमाने पर भूमि बंटाई पर लेकर गन्ना मजदूरों को भी फसल उगाने हेतु दे-दे रहे हैं। यहां मजदूर-किसान दिन-रात मेहनत कर अपने शोषण की गाथा खुद लिख रहे हैं। इसी प्रक्रिया में महिलायें अपना गर्भाशय निकलवा काम करने को मजबूर हो रही हैं। 
    
इसीलिए अगली बार जब हम आप चीनी खायें तो उसके स्वाद के जायके में इन महिला मजदूरों के दर्द, उनके क्रूर शोषण का भी अहसास करें।             -एक पाठक

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