56 इंची सीने से विरोध के 5 शब्द भी न निकले

Published
Tue, 06/16/2026 - 07:50
/56-inch-seene-se-virodha-ke-5-sabda-bhi-n-nikale

अमेरिका द्वारा 3 भारतीय नाविकों की हत्या

होरमुज के निकट मालवाहक जहाजों पर हमला कर अमेरिकी साम्राज्यवादियों ने 3 भारतीय नाविकों की हत्या कर दी। आरोप है कि ये जहाज अमेरिकी नाकेबंदी का उल्लंघन कर आगे बढ़ रहे थे। जहाज में सवार 24 लोगों में 3 भारतीय नाविक इस हमले में मारे गये। 
    
भारतीय नागरिकों की अमेरिकी साम्राज्यवादियों द्वारा की गयी हत्या पर हर कोई उम्मीद कर रहा था कि 56 इंची सीने वाले प्रधानमंत्री अमेरिका को माकूल जवाब देंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। 56 इंची सीने वाले प्रधानमंत्री के मुंह से अमेरिका के विरोध में 5 शब्द भी नहीं निकले। वे पूरी तरह मौन साध गये। इस घटना पर प्रतिक्रिया देने का जिम्मा विदेश मंत्रालय ने संभाला। पहले अमेरिकी राजनयिक व फिर अमेरिकी विदेश मंत्री को फोन कर भारत के विदेश मंत्री ने आपत्ति जतायी। इन्होंने भी अमेरिकी हमले की निन्दा तक नहीं की। खबर यह भी है कि अमेरिकी विदेश मंत्री रुबियो ने उल्टा भारतीय विदेश मंत्री को खरी-खोटी सुना दी कि जहाज अमेरिकी नाकाबंदी को क्यों तोड़ रहा था। इस पर भारतीय विदेश मंत्री कोई आपत्ति भी नहीं जता पाये। 
    
भारत के 3 नाविक किसी युद्धपोत पर सवार नहीं थे वे एक मालवाहक पोत पर सवार थे। एमटी सेटेबेलो नामक पोत जब ओमान सागर से गुजर रहा था तो अमेरिकी विमान ने इसके इंजन को निशाना बनाया। तुरंत आसमान में धुएं का बड़ा गुबार उठा। पलाउ के झंडे वाले इस जहाज पर हुए हमले में 3 भारतीयों के मारे जाने की अमेरिका ने पुष्टि की। 
    
अब न केवल भारत के भीतर बल्कि अंतर्राष्ट्रीय मीडिया में इस घटना पर भारत की कमजोर प्रतिक्रिया पर बहस छिड़ गयी है। भारत में कुछेक मजदूर संगठनों ने घटना की निन्दा करते हुए भारत सरकार से अमेेरिका को कड़ी भाषा में उत्तर देने की मांग की। 
    
पर भारतीय शासक अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को जारी रखने की खातिर किसी कड़े रुख तो दूर कायदे से सवाल पूछने को भी तैयार नहीं हैं। भारत के संघी अमेरिकापरस्त शासक अमेरिका-ईरान युद्ध के मसले पर पाकिस्तान के वार्ताकार बनने व अमेरिका-पाक के गहराते रिश्तों से चिंतित हैं। ऐसे में वे प्रश्न उठा अमेरिका को नाराज करने का जोखिम नहीं लेना चाहते। आलोचक दावा कर रहे हैं कि अगर यही हरकत पाकिस्तान ने की होती तो भारतीय शासक अब तक आसमान सिर पर उठा चुके होते। पाकिस्तान को ‘घर में घुस कर मारने’ की धमकी दे दी जाती और समूचे देश में पाक के खिलाफ हर जगह प्रदर्शन शुरू हो चुके होते। पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के आगे भारत के संघी शासक भीगी बिल्ली बन जाते हैं। बीते 1 वर्ष में अमेरिकी सरगना ने न जाने कितनी बार भारत के लिए दिक्कततलब दावे किये पर भारतीय शासक उनके आगे सिर झुकाये रहे। 
    
यह सब दिखाता है कि 56 इंची सीने का -संघी ताकतों का राष्ट्रवाद का सारा ढिंढोरा फर्जी है। ये पाकिस्तान के खिलाफ ही सारा राष्ट्रवाद दिखाते हैं और कहीं बड़े अत्याचारी अमेरिका के आगे भीगी बिल्ली बन जाते हैं। 56 इंच का सीना पाक पर ही बरस सकता है। ट्रम्प के आगे तो वह सिकुड़ कर 5 इंच का रह जाता है। 
    
देश के भीतर हर किसी को देशभक्ति का सर्टिफिकेट बांटने वाले संघी अपने नागरिकों की अमेरिका द्वारा हत्या पर मौन साध कर देश से गद्दारी व अमेरिकी भक्ति का ही प्रदर्शन कर रहे हैं। अमेरिका के निर्देश पर ये रूस से कभी तेल खरीदते हैं तो कभी बंद कर देते हैं। अमेरिका के कहने पर ईरान से तेल खरीद रोक देते हैं।
    
मोदी और ट्रम्प की दोस्ती को भारत का पूंजीवादी मीडिया खूब प्रचार करता रहा है। बस वह यह बताना भूल जाता रहा है कि यह ‘दोस्ती’ नहीं स्वामी से स्वामिभक्ति निभाने सरीखी बात अधिक है। भारत सरकार ने अमेरिका को अपना ‘स्वामी’ मान लिया है। और वह भला चंद भारतीयों के ‘स्वामी’ द्वारा मार दिये जाने पर स्वामी को कैसे नाराज कर सकती है।
    
मोदी सरकार वक्त के साथ स्पष्ट करती जा रही है कि उसकी आका उसे गद्दी तक पहुंचाने वाली भारतीय जनता नहीं अमेरिकी हुक्मरान हैं। इसीलिए बात चाहे भारतीय नागरिकों को हथकड़ी लगा भारत भेजने की हो या फिर उनकी हालिया हत्या की हो मोदी सरकार अपने ‘आका’ को नाराज नहीं कर सकती। ऊपर से जब यह सरकार खुद को सबसे बड़ा ‘देशभक्त’ घोषित करती है तो शक होने लगता है कि कहीं इन्होंने अमेरिकापरस्ती में लीन होकर अमेरिका को ही अपना देश तो नहीं मान लिया है। 

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।