बेचारे मेहनती वफ़ादार संघी!

Published
Mon, 05/11/2026 - 15:50

9 मई को पं.बंगाल का नया मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी, एक पूर्व तृणमूली बन चुका है। इस आदमी का नाम शुभेन्दु अधिकारी है। इससे पहले असम का मुख्यमंत्री एक पूर्व कांग्रेसी हिमंत बिस्वा सरमा ही था और आगे भी रहेगा। पूरा जीवन संघ व भाजपा में खपाने वाले ‘अविवाहित’, ‘कर्मठ’, ‘जुझारू’, ‘ईमानदार’, ‘समर्पित’ कार्यकर्ता व नेता अंदर ही अंदर सोचते होंगे कि पेड़ लगाया हमने और फल खा रहा है कोई और।

ऐसा सिर्फ अभी पं. बंगाल-असम में नहीं हो रहा है बल्कि अभी हाल में बिहार में हो गया। संघ-भाजपा के महान-महान कर्मठ-समर्पित कार्यकर्ताओं को छोड़कर एक पुराने लालू के भक्त रहे सम्राट चौधरी को मुख्यमंत्री बना दिया गया। संघ-भाजपा के हिसाब से सम्राट चौधरी का राजनैतिक जीवन का जन्म तब हुआ जब बिहार में कथित तौर पर ‘जंगल राज’ था। जंगल राज में जन्मा चौधरी भाजपा राज में बिहार का मुख्यमंत्री है।

शुभेन्दु अधिकारी, हिमंत बिस्वा सरमा, सम्राट चौधरी आदि का उत्थान संघ-भाजपा की एक बहुत बड़ी कमजोरी को दिखलाता है कि इनकी पाठशाला बेकार हो गयी है। इनकी जमीन उपजाऊ नहीं रही। बेचारों को नेता बनाने के लिए पुराने घाघ कांग्रेसी या विपक्षी पार्टी के नेता ही मिलते हैं। असम, बंगाल, बिहार में एक भी ऐसा खरा संघी-भाजपाई नहीं है जिसे मुख्यमंत्री बनाया जा सके। वैसे तो केन्द्र से लेकर अनेकों-अनेक राज्यों में जहां-जहां भाजपा की सरकार है वहां के कई-कई मंत्री पुराने घाघ कांग्रेसी ही हैं।

अब तक तो भाजपा का मोदी-शाह काल में काफी कांग्रेसीकरण हो गया है। कहीं ऐसा न हो, किसी दिन ऐसा हो कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ को अपना सर संघ संचालक भी किसी पुराने-धुराने कांग्रेसी को ही बनाना पड़े। वैसे तो ऐसे कई कांग्रेसी रहे हैं जिन्हें संघ अपनी प्रातः वंदना में याद करता रहता है। मदन मोहन मालवीय, सरदार बल्लभ भाई पटेल जैसे अनगिनत कांग्रेसी संघ की आत्मा के हिस्से हैं। ऐसे में कोई पुराना कांग्रेसी संघ प्रमुख बन जाये तो क्या आश्चर्य की बात होगी। बस तब ‘कर्मठ’, ‘समर्पित’, ‘ब्रह्मचारी’ संघी अपना सिर धुनते हुए नजर आयेंगे। 

#विधानसभा_चुनाव

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।