पं.बंगाल : एस आई आर और भाजपा का चुनाव आयोग

Published
Sun, 01/04/2026 - 15:50
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पश्चिम बंगाल में चुनाव होने वाले हैं। बिहार की तरह ही पश्चिम बंगाल में भी चुनाव से तुरंत पहले विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराया गया है। फरवरी में चुनाव आयोग द्वारा जारी सूची में लगभग 63 लाख मतदाताओं को ‘‘अनुपस्थित, कहीं और चले गए, मृत या डुप्लीकेट’’ बताकर हटा दिया गया है।

इसके अलावा लगभग 60 लाख मतदाताओं को ‘‘अंडर एडजुडिकेशन’’ यानी जांच के दायरे में रखा गया है। चुनाव आयोग के मुताबिक इन लोगों के कागजों में कुछ गलतियां थीं जैसे नाम की स्पेलिंग, जेंडर में गलती, माता-पिता से उम्र का असामान्य अंतर आदि के कारण इन मतदाताओं को जांच के दायरे में रखा गया है।

दरअसल भाजपा सरकार और उसके चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर कराने का मकसद पश्चिम बंगाल में टीएमसी के आधार को कमजोर करने के लिए मुस्लिम मतदाताओं के नाम हटाकर चुनाव में किसी तरह जीत हासिल करने का है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या का नाम मतदाता सूची से हटने वालों में केवल टीएमसी के ही मतदाता नहीं हैं बल्कि टीएमसी से खफा और भाजपा के समर्थक भी शामिल हैं।

पश्चिम बंगाल में भाजपा को किसी भी तरह चुनाव जीतना है तो उसको अपने मतदाता चुनने ही हैं। इसके लिए इस गड़बड़ी को ठीक करने के नाम पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के बाद लगभग 700 न्यायिक अधिकारियों को जांच के दायरे में रखे मतदाताओं की योग्यता को उनके जमा किए गए पहचान के दस्तावेजों के आधार पर वेरिफाई करने का काम सौंपा गया था। कागजों को वेरिफाई करने का काम 31 मार्च तक संपन्न करना था जो काम बड़ी ही मुस्तैदी से किया गया।

अब चुनाव आयोग ने अपनी फाइनल सूची जारी कर दी है। जो 60 लाख मतदाता जांच के दायरे में रखे गए थे उनमें से 27 लाख लोगों को सारे कागजात होने के बाद भी ‘‘अयोग्य’’ घोषित कर दिया गया। यानी ये वैसे तो देश के नागरिक हैं परंतु कागजों में गड़बड़ी के कारण इस चुनाव में 27 लाख मतदाता वोट नहीं डाल पाएंगे। इस तरह 7 करोड़ मतदाताओं में लगभग 87 लाख मतदाताओं के नाम काट दिये गये हैं।

अब 23 और 29 अप्रैल 2026 को पश्चिम बंगाल में दो चरणों में चुनाव होगा जिसके लिए मतदाता सूची को फ्रीज कर दिया गया है। अब इसमें कोई भी सारे कागज दिखाने के बाद भी अपना नाम नहीं जुड़वा सकता है। एसआईआर की इस प्रक्रिया का विरोध करते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने न्यायालय में याचिका डाली थी। इसमें 13 अप्रैल को सर्वोच्च न्यायालय ने फैसला दिया। फैसले में उन मतदाताओं को वोट देने से मना कर दिया गया है जिनके नाम मतदाता सूची से काटे गए थे।

चुनाव आयोग ने एसआईआर के बाद जो सूची जारी की वह जिलेवार सूची है। मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर 24 परगना जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में मतदाताओं के नाम हटाने की संख्या बहुत ज्यादा है। जांच के दायरे में रखे गए मतदाताओं में से तथाकथित अयोग्य लोगों की सूची में मुर्शिदाबाद सबसे ऊपर है। उत्तर 24 परगना और मालदा इस सूची में दूसरे और तीसरे स्थान पर हैं। ये वही जिले हैं जहां टीएमसी का आधार मजबूत है।

चुनाव आयोग के शुरुआती नियमों के मुताबिक, अगर कोई मतदाता खुद या अपने माता-पिता का नाम 2002 की मतदाता सूची से जोड़ सकता था, तो उसे योग्य माना जाता था। लेकिन पश्चिम बंगाल में उसी डेटा में भी गड़बड़ियां बताकर लोगों को जांच के दायरे में डाल दिया गया। यानी तार्किक विसंगतियों के कारण लाखों मतदाताओं को जांच के दायरे में रखे जाने का जिक्र एसआईआर के बारे में चुनाव आयोग के शुरुआती आदेश में नहीं था।

दरअसल चुनाव आयोग ने एसआईआर की प्रक्रिया यह मानकर शुरू की कि बंगाल में मतदाताओं की संख्या बहुत ज्यादा है। लेकिन इतनी बड़ी संख्या में नाम मतदाता सूची से कटने पर जिसमें भाजपा के समर्थकों के भी नाम कट गये। तब चुनाव आयोग ने एसआईआर प्रक्रिया की निगरानी के लिए राज्य के बाहर से अधिकारियों की एक फौज को काम पर रख लिया। जबकि अभी तक एसआईआर की पूरी प्रक्रिया में सारे अधिकार म्त्व् को दे रखे हैं। उसी के विवेक पर है कि वह किसको मतदाता सूची में रखे या किसे नहीं रखे।

लेकिन जब बंगाल में स्थिति उल्टी हो गई तब राज्य के बाहर से अधिकारियों की एक फौज को काम पर रख लिया गया और उन्होंने तय किया कि सूची में किसके नाम हटाने हैं और किसके जोड़ने हैं। बंगाल के बारे में खास बात यह भी है कि जांच के दायरे वाले 27 लाख मतदाताओं के मामले में एक खास कांट-छांट की गई जिसमें मुस्लिम मतदाताओं की संख्या ज्यादा है।

सरकार अलग-अलग राज्यों में एसआईआर के बहाने एनआरसी लागू करना चाहती है। वह मुस्लिमों को निशाना बनाना चाहती है लेकिन जिस तरह से एसआईआर के लिए कागज मांगे जा रहे हैं वह केवल मुस्लिमों के पास ही नहीं हैं बल्कि देश के मजदूरों, मेहनतकशों, आदिवासियों, दलितों के पास भी नहीं हैं। और महिलाओं के पास न तो संपत्ति है और वह शादी के बाद एक जगह से दूसरी जगह चली जाती हैं।

इस पूरी प्रक्रिया के दौरान भाजपा सरकार लोगों से जनवादी अधिकार छीन उनको नागरिकता से ही वंचित कर रही है। अभी तक देश में मतदाता सरकार को चुनने का काम करती थे लेकिन अब भाजपा सरकार एसआईआर के जरिए अपने मतदाता चुन रही है और किसी भी तरह चुनाव जीतना चाहती है। इसमें एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग व मीडिया तो पहले से ही भाजपा के साथ खड़ा है, चुनाव आयोग और न्यायालय जैसी तथाकथित निष्पक्ष संस्थाएं भी अब भाजपा को येन केन प्रकारेण चुनाव जिताने में लगी हुई हैं।

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