दिल्ली में 15 सितम्बर से डी टी सी के ठेके के हजारों बस ड्राइवरों ने हड़ताल शुरू की। ये ड्राइवर अपने वेतन में वृद्धि, ई एस आई जैसी मांगों के लिए हड़ताल पर उतरे। ये ड्राइवर दिल्ली में इलेक्ट्रिक बस चलाते हैं। हड़ताली ड्राइवरों ने कहा कि जब भाजपा सरकार सत्ता में आयी तब उसने वादा किया था कि वे उनकी वेतन वृद्धि करेंगे और उनको पक्का भी। लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हुआ। 3-4 दिन हड़ताल के बाद डीटीसी ने लगभग ढाई हजार ड्राइवरों को जो अन्य कामों में लगे थे, उतार कर हड़ताल का असर काफी कम कर दिया। एस्मा की धमकी से हड़ताली ड्राइवरों के एक हिस्से को काम पर वापस आना पड़ा। ड्राइवरों की यूनियन को एस्मा के चलते 28 सितम्बर को डीटीसी जाम करने का आह्वान वापस लेना पड़ा।
हड़ताली ड्राइवरों ने अपनी मांगों के सम्बन्ध में बताया है कि उनको प्रतिदिन 862 रु. की दिहाड़ी मिलती है। पिछले दो साल से उनकी तनख्वाह में मात्र 15 रु. की वृद्धि हुयी है। जिस समय आप की सरकार थी उस समय उनको 847 रु. मिलते थे। लेकिन इन दो सालों में महंगाई जिस तेजी से बढ़ी है उसमें उनका गुजारा संभव नहीं है। उन्होंने कम से कम 1500 से लेकर 2000 रु. प्रतिदिन वेतन की मांग हड़ताल के दौरान उठाई है। इसके अलावा उन्होंने डी ए का भी मुद्दा उठाया कि हर 6 महीने में उनकी तनख्वाह में वृद्धि होनी चाहिए।
इसके अलावा उन्होंने बताया कि पहले उन्हें ई एस आई की सुविधा मिलती थी लेकिन भाजपा सरकार के आने के बाद वह भी बंद हो गयी है। अब या तो सरकारी अस्पताल में इलाज कराओ या फिर निजी अस्पताल में अपने पैसे से।
हड़ताली ड्राइवरों ने अपनी अन्य समस्याओं के बारे में बताया कि यदि उनकी बस में कोई टूटफूट हो जाती है तो उसकी भरपाई अपनी तनख्वाह से करनी पड़ती है। यदि उनकी बस का चालान कटता है तो भी वह उनकी तनख्वाह से ही कटता है। एक ड्राइवर ने बताया कि कापसहेडा में पार्किंग की व्यवस्था न होने पर मजबूरी में कहीं सड़क किनारे गाड़ी खड़ी करने पर उसका एक चालान 2025 में कटा, यह पैसा एक साल बाद उसके वेतन से काट लिया गया। ड्राइवरों पर ड्यूटी ओके करने का भी दबाव बनाया जाता है। ड्यूटी ओके होने का मतलब है कि तय किलोमीटर या दूरी प्रतिदिन ड्राइवरों को पूरी करनी होगी नहीं तो उसकी ड्यूटी कट जायेगी। ड्यूटी ओके करने के लिए ड्राइवर तेज गाड़ी चलाते हैं जिससे दुर्घटना की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। अगर ड्यूटी ओके करने के लिए वे कहीं सवारी के लिए बस नहीं रोकते हैं तो यात्री के शिकायत करने पर उन पर कार्यवाही होती है।
डी टी सी में स्थायी बस ड्राइवरों की तनख्वाह 80 हजार से 1 लाख तक है। लेकिन उसी काम के लिए ठेके पर रखे गये ड्राइवरों को महीने में मात्र 20-22 हजार रुपये मिलते हैं। ड्राइवर समान काम का समान वेतन के आधार पर अपनी वेतन वृद्धि चाहते हैं।
दरअसल दिल्ली में सी ई एस एल (CESL- Convergence Energy Service Limited) ने इलेक्ट्रिक बसों के लिए टेण्डर 2022 में निकाले थे। दिसम्बर 2022 में यह टेण्डर टाटा की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कम्पनी TML CV MoBility Solution को मिला। यह टेण्डर 1500 इलेक्ट्रिक बसों के लिए 12 साल का है। टेण्डर के अनुसार इलेक्ट्रिक बसों के रखरखाव, संचालन, आपूर्ति 12 साल तक के लिए TML CV MoBility Solution को करनी है। बाद में TML CV MoBility Solution ने यह उप ठेका नीचे स्टार क्रेस्ट, स्टार बस्र्ट, प्रोग्रेसिव आदि कम्पनियों को दिया हुआ है। इस तरह ड्राइवर और डीटीसी के बीच एक ठेकेदार व एक उप ठेकेदार है। ड्राइवरों के अनुसार डीटीसी TML CV MoBility Solution को 45,000रु. देती है। इसका मतलब साफ है कि बीच का पैसा दोनों ठेकेदार कम्पनियों को मिलता है।
दरअसल निजीकरण का मतलब यही है। जिसमें नियोक्ता व कर्मचारी के बीच ठेकेदारों की एक पूरी श्रृंखला होती है। ठेके पर रखने से नियोक्ता को कर्मचारी की जिम्मेदारी से मुक्ति मिलती है तो ठेकेदारों को कर्मचारी की आय का एक हिस्सा। कर्मचारी के हिस्से आती है बची-खुची आय जिसमें वह मुश्किल से गुजारा कर पाता है। साथ ही उसकी सामाजिक सुरक्षा जैसे पी.एफ., पेंशन, ई एस आई आदि भी छिन जाती है। मृत्यु होने पर उसका परिवार कैसे गुजारा करेगा इसकी जिम्मेदारी न ठेकेदार की होती है और न नियोक्ता की।
दिल्ली के परिवहन मंत्री डा. पंकज कुमार सिंह ने जब अपने बयान में कहा कि उन्होंने ड्राइवरों से हड़ताल खत्म करने के लिए उनकी मांगों पर आश्वासन दिया है तो उन्होंने यह भी कहा कि हालांकि वे उनके ड्राइवर नहीं हैं फिर भी वे उनसे बात करने गये। यह दिखाता है कि ठेके के ड्राइवर उनके कर्मचारी ही नहीं हैं। हड़ताल के दौरान इन ड्राइवरों के साथ डिपो प्रबंधन का किया गया व्यवहार भी दिखाता है कि दरअसल ठेके पर काम कर रहे इन ड्राइवरों को किस हीन भावना से देखते हैं। वे उन्हें डिपो में पानी पीने के लिए भी नहीं घुसने दे रहे हैं ठीक उसी तरह जैसे एक फैक्टरी में हड़ताल होने पर मजदूरों को फैक्टरी मालिक/प्रबंधन पानी या शौचालय के लिए भी नहीं जाने देते।
ड्राइवरों की हड़ताल पर दिल्ली हाईकोर्ट का रुख बेहद खराब है। एक याचिका की सुनवाई करते हुए जनता को असुविधा होने के नाम पर वह सरकार से यह सवाल करता है कि आवश्यक सेवा होने पर भी उसने अभी तक हड़ताली ड्राइवरों पर एस्मा क्यों नहीं लगाया। यह कोर्ट के कर्मचारी विरोधी दृष्टिकोण को ही दिखाता है।
कुल मिलाकर डीटीसी के इन ठेके पर रखे गये ड्राइवरों को बेहद कठिन हालात में मजबूर होकर हड़ताल पर जाना पड़ा है। अभी इन ठेके के ड्राइवरों की कोई औपचारिक यूनियन नहीं है लेकिन अभी ये ड्राइवर कर्मचारी एकता यूनियन के बैनर तले हड़ताल कर रहे हैं। हड़ताल की सफलता के लिए इन्हें अभी संघर्ष को और जुझारू बनाने की जरूरत होगी।