गहराता सामाजिक आर्थिक संकट और ‘काकरोच जनता पार्टी’

Published
Sun, 01/04/2026 - 15:50

जैसा कि तय ही था कि जैसे ही पांच राज्यों में चुनाव निपटेंगे वैसे ही गैस, पेट्रोल-डीजल के दामों में आग लगेगी और महंगाई आसमान छूने लगेगी। मई माह के दूसरे पखवाड़े में पेट्रोल-डीजल सौ रुपये प्रति लीटर या उससे भी ज्यादा तक जा पहुंचे। बढ़ती महंगाई के बीच देश का आर्थिक संकट गहराता गया है और उसके साथ सामाजिक संकट भी गहरा रहा है। और इस गहराते सामाजिक संकट ने समाज के हर वर्ग और तबके को मजबूर कर दिया है कि वह अपनी प्रतिक्रिया दे। और समाज का हर वर्ग अपने-अपने तरीके से अपनी प्रतिक्रिया दे रहा है। अपनी जिम्मेदारियों से भागते प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार का एक ओर शातिर और मुद्दों से ध्यान भटकाने वाला रुख है तो विपक्षी पार्टियों का खासकर राहुल गांधी का सरकार को घेरने का रुख है। भारत के शासक वर्ग के उलट मजदूर वर्ग ने सड़कों पर उतरकर मोदी सरकार के होश उड़ाने जारी रखे हैं। लेकिन सबसे मजेदार प्रतिक्रिया छात्र-युवाओं की आवाज बनकर उभरी ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) की है और स्वाभाविक तौर पर बीजेपी के निशाने पर सीजेपी आ गयी है।

‘काॅकरोच जनता पार्टी’ जिसका जन्म सोशल मीडिया प्लेटफार्म में एक राजनैतिक मजाक या व्यंग्य से हुआ था उसने अब एक अभियान का सामाजिक रूप ले लिया है। छात्र-युवा शान से अपने को काॅकरोच कहने लगे हैं। काॅकरोच का रूप धर कर अपने मुद्दे या सामाजिक-राजनैतिक मुद्दे उठाने लगे हैं। काॅकरोच जो अपनी जीवटता के लिए जाना जाता है अब राजनैतिक विरोध का एक वास्तविक प्रतीक बन गया है। न भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बेरोजगार युवाओं को काॅकरोच बोला होता और न काॅकरोच जनता पार्टी का जन्म होता। यह दीगर बात है ऐसा न होने पर भी युवाओं का आक्रोश कभी न कभी, किसी न किसी और तरीके से फूटता।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की भाषा वही है जो भाषा प्रधानमंत्री मोदी, उनकी पार्टी और संघ प्रमुख मोहन भागवत की है। इन महानुभावों को हर उस आदमी, संस्था या संगठन से दिक्कत है जो अपने हक की आवाज उठाता हो, व्यवस्था की पोल खोलता हो या फिर आजादी, बराबरी व भाईचारे की बात करता हो। अपने विरोधियों को भाजपा या संघ हर उस तरीके से अपमानित-लांक्षित करते हैं जिस तरीके से वे कर सकते हैं। ‘देशद्रोही’, ‘अरबन नक्सल’, ‘खालिस्तानी’, ‘पाक-चीन तथा अरबपति सोरोस के एजेण्ट’, ‘आंदोलनजीवी’, ‘वोक’ और न जाने क्या-क्या ये उन सभी को कहते हैं जो समाज में न्याय और अधिकार के लिए खड़े होते रहे हैं। मोदी ने ऐतिहासिक किसान आंदोलन के दौरान संघर्षरत किसानों को न जाने क्या-क्या न कहा। ऐसे ही संघ प्रमुख मोहन भागवत को समाज के उन सभी लोगों से दिक्कत है जो जागृत (वोक) हैं। दलित, आदिवासी, महिलाएं, धार्मिक अल्पसंख्यक, एलजीबीटीक्यू समुदाय यानी जो कोई अपने साथ होने वाले भेदभाव, अपमान, उत्पीड़न, अन्याय आदि का विरोध करता है और समाज में उठ खड़ा होता है; उससे इन्हें आपत्ति है। इन्हें जागृत लोग नहीं बल्कि धर्म की अफीम सूंघे हुए अंधभक्त चाहिए। ‘हिन्दू धर्म-सनातन धर्म खतरे में है’ के नाम पर ये समाज में हर अन्याय, हर अत्याचार व हर शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबा देना चाहते हैं। महामहिम सूर्यकांत भी अपनी अदालत में अपने ढंग से ऐसा ही कर रहे थे, जब वे बेरोजगार युवाओं को काॅकरोच व परजीवी कह रहे थे।

किस को वरिष्ठ अधिवक्ता माना जाये की मांग पर श्रीमान जी इतने खफा हुए कि उन्होंने न केवल बेरोजगारों को काॅकरोच व परजीवी कहा बल्कि उन सब की आलोचना की जो मीडिया, सोशल मीडिया में पत्रकार, यू ट्यूबर आदि के रूप में सक्रिय हैं। मुख्य न्यायाधीश की ये टिप्पणियां भारत के उन नागरिकों पर हैं जिन्हें भारत का संविधान अपनी पसंद का व्यवसाय चुनने व अपने ढंग से जीने का संवैधानिक अधिकार देता है। श्रीमान जी की जब बहुत आलोचना हुयी तो वे ऐसी सफाई देने लगे जिसका किसी भी उस व्यक्ति के गले उतरना मुश्किल है जिन्हें वे काॅकरोच, परजीवी आदि कहकर निन्दा कर रहे थे। मुख्य न्यायाधीश की भाषा ऐसी सत्ता की भाषा है जिस पर हिन्दू फासीवादी रंग चढ़ चुका है। उनके दिमाग व मनोविज्ञान की दूसरी अभिव्यक्ति फिर हुयी जब कई पर्यावरणवादियों ने कई सरकारी निर्माण योजनाओं को पर्यावरण को क्षति पहुंचाने की दृष्टि से उन पर रोक लगाने की मांग की। श्रीमान जी ने अपील करने वालों को फर्जी या कथित पर्यावरण विशेषज्ञ कहना शुरू कर दिया।

कदाचित मुख्य न्यायाधीश के इन तेवरों को देखते हुए ही ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ ने अपनी पहली मांग यह रखी कि कोई भी मुख्य न्यायाधीश रिटायर होने के बाद राज्यसभा नहीं जायेगा। रंजन गोगोई जिन्होंने भाजपा-संघ के राम मंदिर के एजेण्डे को अंतिम मुकाम तक पहुंचाया था, उन्हें रिटायर होते ही राज्यसभा में भेज दिया गया था। इसी तरह सीजेपी की अन्य प्रमुख मांगें भी उस तरह की हैं कि जिससे देश की प्रमुख संवैधानिक संस्थाओं पर पुनः भरोसा कायम हो। साफ-सुथरा समाज बने और सरकार जनता के प्रति जवाबदेह बने व पूरी व्यवस्था पारदर्शी हो।

कुल मिलाकर वे एक ऐसा भारत बनाना चाहते हैं जिसकी घोषणा भारत के संविधान की उद्देशिका (प्रीम्बल) में की गयी है। मतलब सीजेपी भारत को एक समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक गणराज्य बनाना चाहती है। इन बातों का क्या अर्थ है? इन बातों का अर्थ है कि सीजेपी शायद एक ऐसा समाज चाहती है जिसमें पूंजीवाद की बुराईयां न हों। कुल मिलाकर एक ऐसा पूंजीवाद जो पूंजीवाद की बुराईयों से मुक्त हो। संविधान में लिखी गयी बातें अक्षरक्षः लागू हों।

‘काॅकरोच जनता पार्टी’ जिसका जन्म सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर हुआ है और जो इसी के सहारे इतनी तेजी से बढ़ी कि किसी के लिए भी उसे नजरअंदाज करना मुश्किल हो गया। भारत सरकार ने जहां इसके सोशल मीडिया प्लेटफार्म (एक्स व इंस्टाग्राम) पर प्रतिबंध लगवाया। और संघ अपने मुखपत्र आर्गनाइजर में इसके खुले विरोध में उतर आया वहां विपक्षी पार्टियों ने इसके साथ गठबंधन बनाने के रास्ते तलाशने शुरू किये हैं। इस सोशल मीडिया पार्टी ने एक ओर छात्र-युवाओं के आक्रोश, क्षोभ को अभिव्यक्ति दी तो दूसरी ओर इसने सत्तारूढ़ भाजपा-संघ को सांसत में डाल दिया है। इस रूप में इसने उस स्थान को भरने की कोशिश की है जो वास्तविक विकल्प व प्रतिरोध का आकार न ग्रहण करने के कारण बना हुआ था।

‘काॅकरोच जनता पार्टी’ वर्तमान गहराते सामाजिक-आर्थिक संकट की निम्न पूंजीवादी प्रतिक्रिया है। यह प्रतिक्रिया ऐसा पूंजीवाद चाहती है जो पूंजीवाद खासकर भारत के पूंजीवाद की बुराईयों (भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, निकम्मे सरकारी तंत्र, अम्बानी-अडाणी की सेवा में लगी सरकार व व्यवस्था, खस्ता हाल शिक्षा-स्वास्थ्य-सार्वजनिक परिवहन-सड़क आदि) से मुक्त हो।

‘काॅकरोच जनता पार्टी’ इक्कीसवीं सदी में पैदा हुयी उस विश्वव्यापी परिघटना का भारतीय संस्करण है जो बार-बार स्थापित पूंजीवादी पार्टियों की गिरती साख व भ्रष्ट आचरण के प्रतिक्रियास्वरूप पैदा होता रहा है। भारत में 2012 में ‘आप’ पार्टी का उभार इसी रूप में पहले हो चुका है। दुनिया के अन्य देशों में रातों-रात ऐसी पार्टी, नेता व आंदोलन पैदा हुए जिन्होंने स्थापित पार्टियों व तंत्र को कुछ चुनौती पेश की परंतु शीघ्र ही वे सब वहीं पहुंच गये जहां पहले की पार्टियां व नेता पहुंचे हुए थे। इटली का ‘फाइव स्टार मूवमेंट’, ‘ग्रीस की सिरिजा पार्टी’, स्पेन का ‘इंडिग्नाडोस 15 मिलियन मूवमेंट’ इसके कुछ उदाहरण हैं। हमारे देश के पड़ोस में भी हाल के समय में ऐसा ही कुछ हो चुका है। इस रूप में ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ के भविष्य का अभी से अनुमान लगाया जा सकता है।

जहां तक भारत के गहराते आर्थिक-सामाजिक संकट के समाधान का प्रश्न है वह भारत में उस इंकलाब की मांग कर रहा है जो शहीद-ए-आजम भगतसिंह ने अपने फांसी पर चढ़ने से पहले अपने अंतरिम लेख में प्रस्तुत किया था। उनका कहना था भारत की मुक्ति सिर्फ व सिर्फ समाजवादी क्रांति के जरिये ही हो सकती है। ऐसी क्रांति सिर्फ मजदूर वर्ग के नेतृत्व मंे मेहनतकश किसानों के साथ आने से ही संभव हो सकती है। भारत में पूंजीवाद के खात्मे व समाजवाद की स्थापना के जरिये ही भारत के मजदूर, किसानों और उनकी संतानों की जरूरतों व आकांक्षाओं की पूर्ति हो सकती है। ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ एक वक्ती हल्ला-गुल्ला तो पैदा कर सकती है परन्तु वह सब कुछ नहीं कर सकती है जिसकी जरूरत भारत के मजदूर, किसानों और नौजवानें को है।

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