‘जी-राम-जी’ : मुंह में राम बगल में छुरी

मोदी सरकार ने आखिर में मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी अधिनियम) का ‘राम नाम सत्य’ कर दिया। मनरेगा की जगह ‘वी बी-जी-राम-जी’ (विकसित V भारत B गारण्टी G फार रोजगार R एंड आजीविका A मिशन M ग्रामीण G) अधिनियम को लाया गया है। कोई भी खुले तौर पर देख सकता है कि एक लफ्फाज सरकार ने कैसे जबरदस्ती की तुकबंदी करके ‘वी बी-जी-राम-जी’ नाम रखा है। हिन्दी अक्षरों को यदि ठीक से संक्षिप्त किया जाता तो इसका नाम ‘वी बी जी एफ आर ए ए एम (जी) ए’ होता। इस नाम में शब्दों का मनमाना चयन कर राम शब्द को गढ़ा गया है। क्षुद्रता और धूर्तता के लिए भगवान राम की शरण ली गयी है। विपक्षी दल महात्मा गांधी के नाम को हटाये जाने पर हंगामा करेंगे ठीक इसलिए इसमें भगवान राम का नाम जोड़ा गया है।

जितनी चालाकी और बदमाशी योजना के नाम रखने में की गयी है उतनी ही चालाकी व बदमाशी योजना के बजट के साथ की गयी है। मनरेगा के तहत राज्यों को योजना की लागत का करीब 10 प्रतिशत जबकि केन्द्र को लगभग 90 प्रतिशत वहन करना पड़ता था। अब ‘जी-राम-जी’ के अनुसार केन्द्र का हिस्सा घटाकर 60 प्रतिशत तो राज्यों का हिस्सा बढ़ाकर 40 प्रतिशत कर दिया गया है। पहले से ही वित्त के मामले में परेशान राज्यों को मोदी सरकार ने और परेशान कर दिया है। इस चालाकी-बदमाशी का नतीजा यह है कि केन्द्र सरकार का इस योजना का वित्तीय बोझ लगभग एक तिहाई से भी ज्यादा कम हो गया है।

आंकड़ों में यह खेल इस तरह है। पिछले सालों में मनरेगा के तहत कुल मिलाकर करीब 1 लाख करोड़ रुपया केन्द्र व राज्य सरकारें खर्च करती थीं। जिसमें से करीब 85,000 से 90,000 करोड़ रुपया केन्द्र सरकार खर्च करती थी। अब ‘जी-राम-जी’ के तहत केन्द्र सरकार का हिस्सा करीब 60,000 करोड़ रुपया हो जायेगा। केन्द्र सरकार ने कानून बदला और इस तरह करीब 30,000 करोड़ रुपया बचा लिया। अब ये 30,000 करोड़ रुपया राज्यों को अपने बजट से खर्च करना पड़ेगा। राज्यों की स्थिति क्या है? उनके पास पहले से ही बजट की कमी है। कर्मचारियों को वेतन-पेंशन देने के लाले पड़े रहते हैं और ऊपर से उत्तराखण्ड की धामी सरकार की तरह हजारों करोड़ रुपये सरकार की उपलब्धियों के झूठे प्रचार में खर्च कर दिये जाते हैं। पिछले पांच साल में धामी सरकार ने 1000 करोड़ रुपये प्रचार में फूंक डाले हैं। जहां तक रोजगार के दिनों का सवाल है, यह बात भी मक्कारी से भरी है। मनरेगा के तहत 100 दिनों के काम की गारण्टी थी तब काम का औसत प्रति परिवार 48 से 52 दिनों (प्रति परिवार औसत रोजगार दिवस) का था। अब गारण्टी 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गयी है। इस गारण्टी को लागू करने की जिम्मेदारी बजट के अभाव में कैसे पूरी होगी राम ही जानें।

कुल मिलाकर मतलब यह निकलता है कि ग्रामीण रोजगार को यह नयी योजना अपनी मौत मरने के लिए छोड़ देती है। भगवान राम का नाम लेकर ग्रामीण रोजगार के सीमित अवसरों को भी खत्म कर देती है।

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