उदारीकरण-निजीकरण के रथ पर सवार मोदी सरकार

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
/liberisation-privatisation-ke-rath-par-sawar-modi-sarakar

मोदी सरकार द्वारा 2014 में सत्ता में आने के बाद से जिस तेजी के साथ उदारीकरण-निजीकरण की जन विरोधी नीतियों को आगे बढ़ाया गया है, उसके परिणामस्वरूप केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों में रिक्त पदों की संख्या 2015 के 4.21 लाख की तुलना में 2024 में 8.24 लाख अर्थात दो गुनी हो गई है।
    
केंद्र सरकार की सिविल एम्प्लोयीज के वेतन व भत्तों से जुड़ी व्यय विभाग की एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 में जहां केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों के कुल स्वीकृत पद 36,49,468 थे और इसमें से 4,20,547 पद खाली पड़े थे, वहीं एक दशक बाद 2024 में 39,23,212 स्वीकृत पदों में से 8,23,556 पद खाली पड़े हैं।
    
इस रिपोर्ट के अनुसार रेलवे और स्वास्थ्य विभाग में जहां 2015 में एक भी पद खाली नहीं था, वहीं 2024 में यहां क्रमशः 2,40,125 और 1582 पद खाली पड़े हैं। इसी तरह डाक विभाग में 2015 के 7,561 खाली पड़े पदों की तुलना में 2024 में 61,546 पद खाली पड़े हैं। जबकि रक्षा विभाग (सिविल) में 2,41,643 एवं गृह मंत्रालय में 1,10,885 पद खाली पड़े हैं। इसी तरह अन्य विभागों राजस्व, लेखा, परमाणु ऊर्जा इत्यादि में भी हजारों की संख्या में पद खाली पड़े हैं।
    
इसके अलावा केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में कुल कर्मचारियों में से करीब आधे कर्मचारी इस समय संविदा अथवा ठेके पर हैं। पब्लिक इंटरप्राइजेज सर्वे के अनुसार 2015 में जहां केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रमों में 15,87,149 कर्मचारियों में से 2,95,995 अर्थात 18.6 प्रतिशत कर्मचारी संविदा अथवा ठेके पर थे, वहीं 2025 में 15,42,339 कर्मचारियों में से 7,58,611 अर्थात 49.1 प्रतिशत कर्मचारी संविदा अथवा ठेके पर हैं। गौरतलब है कि 1991 में देश में उदारीकरण-निजीकरण की नीतियां लागू होने के बाद से ठेका प्रथा ने एक परिघटना का रूप ले लिया है, जिसके तहत निजी ही नहीं बल्कि सरकारी-सार्वजनिक क्षेत्र में भी मजदूरों-कर्मचारियों का भयंकर शोषण किया जा रहा है। 
    
इस तरह उदारीकरण-निजीकरण की जिन नीतियों को कांग्रेसी सरकारें अपेक्षाकृत धीमी गति से आगे बढ़ा रही थीं, उन्हें 2014 में केंद्र की सत्ता में काबिज होने के बाद संघी नरेंद्र मोदी की सरकार दु्त गति से आगे बढ़ा रही है। आखिर अडाणी-अम्बानी, टाटा-बिड़ला, जिंदल-सिंघानिया जैसे एकाधिकारी पूंजीपतियों द्वारा अपनी पूंजी की ताकत के बल पर संघ-भाजपा और मोदी को केंद्र की सत्ता पर काबिज भी इसीलिए कराया गया है। 
 

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।