मणिपुर के मुख्यमंत्री वीरेन सिंह ने इस्तीफ़ा दिया

क्या मणिपुर की जनता के घावों पर मरहम लगाएगा इस्तीफ़ा

मणिपुर को 21 माह तक गृह युद्ध की आग में झोंकने वाले मुख्यमंत्री वीरेन सिंह ने अंततः इस्तीफ़ा दे दिया। उनका इस्तीफ़ा ऐसे समय में आया है जब कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा में अविश्वास प्रस्ताव लाने का तय किया और भाजपा के सहयोगी दलों के साथ-साथ खुद भाजपा में वीरेन सिंह के खिलाफ असंतोष बहुत ज्यादा था और अविश्वास प्रस्ताव में भाजपा के हार जाने और मणिपुर राज्य हाथ से निकल जाने का खतरा पैदा हो गया।

मुख्यमंत्री वीरेन सिंह के इस्तीफ़ा देने के कारणों में एक कारण उनका एक ऑडियो टेप में आवाज़ का सामने आना है जिसमें उनकी भूमिका मणिपुर में हिंसा भड़काने में सामने आ रही है। इस टेप में उनकी आवाज़ मूल आवाज़ से 90 प्रतिशत तक मिल रही है। अभी इस टेप की और जाँच होनी है और इससे उनके इस प्रकरण में फंसने का अंदेशा होने लगा है। यदि ऐसा होता है तो भाजपा के लिए यह नई मुसीबत खड़ी कर सकता है।

वैसे तो यह बात शुरू से ही सामने आती रही है कि मणिपुर में शुरू से ही मैतेई और कुकी लोगों के बीच में संघर्ष होने के पीछे मुख्यमंत्री वीरेन सिंह का भी हाथ है। और शुरू से ही वीरेन सिंह को हटाने की मांग होती रही है। लेकिन न तो वीरेन सिंह और न ही मोदी ने यह बात मानी। एक बार वीरेन सिंह ने इस्तीफ़ा देने का नाटक भी किया। वे इस्तीफ़ा देने के लिए अपने समर्थकों के साथ निकले। तभी उनके साथ में से किसी ने उनसे इस्तीफ़ा लेकर फाड़ दिया और कहा कि जनता आपका इस्तीफ़ा नहीं चाहती। इसी तरह मोदी मणिपुर से आये विधायकों से मिले तक नहीं।

अब जब मुख्यमंत्री वीरेन सिंह ने इस्तीफ़ा दे दिया है तब यह बात स्पष्ट हो गयी है कि मणिपुर में पिछले 21 महीनों से सब कुछ अच्छा नहीं चल रहा था। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 200 से ज्यादा लोग इस हिंसा में मारे गये हैं। कई दर्ज़न लोग लापता हैं। और 50,000 से ज्यादा लोग शरणार्थी शिविरों में रह रहे हैं। और इस हिंसा के दौरान महिलाओं के साथ यौन हिंसा की बर्बरतापूर्ण घटनायें सामने आयी हैं।

अब जब वीरेन सिंह ने इस्तीफ़ा दे दिया है तब क्या यह इस्तीफ़ा मैतेई और कुकी समुदायों के बीच बन चुकी गहरी खाई को पाट पाएगा। क्या ये दोनों समुदाय फिर एक साथ रह पाएंगे। क्या यह इस्तीफ़ा उन लोगों के जख्मों को भर पायेगा जिनके घर इस हिंसा में जला दिये गये, जिन घरों की महिलाओं के साथ यौन हिंसा की घटनायें हुई, जो आज भी शरणार्थी शिविरों में रहने को मज़बूर हैं।

और सबसे बड़ी बात यह है कि क्या इस हिंसा के लिए वीरेन सिंह ही दोषी हैं। नहीं, उनके साथ प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह भी उतने ही जिम्मेदार हैं। जिस देश के एक हिस्से में इस कदर जातीय हिंसा हो रही हो उस देश का प्रधानमंत्री वहां का एक बार भी दौरा न करे और देश की आतंरिक सुरक्षा के लिए जिम्मेदार गृह मंत्री अमित शाह इस स्थिति को न संभाल पाएं। इन्होंने अपने राजनीतिक हितों के लिए मणिपुर को आग में झोंक दिया।

आलेख

/capital-dwara-shram-par-kiya-gaya-sabase-bhishan-hamala

मजदूर-कर्मचारी की परिभाषा में विभ्रम पैदा करने एवं प्रशिक्षुओं व कम आय वाले सुपरवाइजरों को मजदूर न माने जाने; साथ ही, फिक्स्ड टर्म एम्प्लायमेंट (FTE) के तहत नये अधिकार विहीन मजदूरों की भर्ती का सीधा असर ट्रेड यूनियनों के आधार पर पड़ेगा, जो कि अब बेहद सीमित हो जायेगा। इस तरह यह संहिता सचेतन ट्रेड यूनियनों के आधार पर हमला करती है। 

/barbad-gulistan-karane-ko-bas-ek-hi-ullu-kaafi-hai

सजायाफ्ता लंपट ने ईरान पर हमला कर सारी दुनिया की जनता के लिए स्पष्ट कर दिया कि देशों की संप्रभुता शासकों के लिए सुविधा की चीज है और यह कि आज शासक और मजदूर-मेहनतकश जनता अलग-अलग दुनिया में जी रहे हैं। 

/amerika-izrayal-ka-iran-ke-viruddha-yuddh

अमरीकी और इजरायली शासकों ने यह सोचकर नेतृत्व को खत्म करने की कार्रवाई की थी कि शीर्ष नेतृत्व के न रहने पर ईरानी सत्ता ढह जायेगी। इसके बाद, व्यापक जनता ईरानी सत्ता के विरुद्ध विद्रोह करने के लिए सड़क पर उतर आयेगी और अमरीकी व इजरायली सेनायें ईरान की सत्ता पर कब्जा करके अपने किसी कठपुतले को सत्ता में बैठा देंगी।

/capitalism-naitikataa-aur-paakhand

जब शीर्ष ऐसा है तो नीचे कल्पना की जा सकती है। और आज पूंजीवादी प्रचारतंत्र के सारे स्व-प्रतिबंध के बावजूद अनुयाईयों के कुकर्मों की दास्तां बाहर आ जाती है। कभी-कभी कोई सेंगर जेल भी चला जाता है। पर ज्यादातर वैसे ही छुट्टे सांड की तरह घूमते रहते हैं। 

/baukhalaye-president-trump-ke-state-of-union-speech-kaa-saar

ट्रम्प के इस स्टेट आफ यूनियन भाषण का कुछ डेमोक्रेटिक पार्टी के सांसदों ने बहिष्कार किया। कुछ सर्वोच्च न्यायालय के सदस्यों ने इसमें भाग नहीं लिया। लेकिन ट्रम्प करीब दो घण्टे के अपने भाषण में अपने बारे में शेखी बघारते रहे और तमाम गलतियों और कमियों के लिए विरोधी पार्टी के राष्ट्रपतियों को जिम्मेदार ठहराते रहे। इस भाषण को झूठ का पुलिंदा कहना ज्यादा सही होगा।