मोदी-शाह और हरिशंकर परसाई

Published
Sun, 01/04/2026 - 15:50
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हरिशंकर परसाई की एक व्यंग्य रचना है अकाल उत्सव। इस रचना में वे एक जगह एक ऐसे पहलवान का जिक्र करते हैं जो पूरी साल खूब बादाम खाता है, लड़ने की तैयारी करता है लेकिन जैसे ही लड़ने का वक्त आता है तो वह कहता है कि उसे टायफायड हो गया है और उसका सारा खाया-पीया बेकार हो जाता है। वह पस्त हो जाता है।

इसी तरह इसी रचना में वे जिक्र करते हैं कि एक मंत्री पूरी साल बयानबाज़ी करता है, ऐसा कर दिया है, वैसा कर दिया है। हम इतने मज़बूत हैं। लेकिन जैसे ही कोई समस्या आती है वैसे ही उसके सारे इंतजामात हवा हो जाते हैं। उसका बड़बोलापन गायब हो जाता है।

ठीक इसी तरह आज भारतीय राजनीति का हाल है। अभी जब संसद का मानसून सत्र ख़त्म होने वाला ही था तो अमित शाह ने कहा कि वो संसद में आएंगे और विपक्ष के हर सवाल का जवाब देंगे। दरअसल विपक्ष अमित शाह को जंतर मंतर पर छात्रों पर हुए लाठीचार्ज और गोली चलने के सवाल पर घेरना चाहता था। दरअसल मोदी और अमित शाह संसद में आ ही नहीं रहे थे। विपक्ष उनको चंदा चोरी मामले पर भी घेरना चाहता था।

लेकिन जैसे ही मोदी और शाह संसद पहुंचे। उसके बाद स्पीकर ने वन्दे मातरम् गीत बजवाया और उसके बाद संसद अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दी गयी। ऐसे में हरिशंकर परसाई की व्यंग्य रचना अकाल उत्सव के ये उदाहरण याद आ गये।

ऐसा पहली बार नहीं है कि मोदी और शाह ने ऐसा व्यवहार किया हो। मोदी ने देश में बहुत सी योजनाएं शुरु की। हर घर-गांव में बिजली, पानी पहुँचाने का वायदा हो, नोटबंदी योजना हो, गंगा सफाई की योजना हो, जहाँ झोंपड़ी वहां मकान की बात हो, बुलेट ट्रेन और स्मार्ट सिटी का सपना दिखाने की बात हो आदि आदि। लेकिन जैसे ही इन योजनाओं को व्यवहार में उतारने की बात हो तो वहां मोदी कभी नहीं दिखते। न वे कभी इनका भूले से भी जिक्र करते हैं। इसी तरह विदेश नीति के मामले में विश्व गुरु बनने का डंका पीटने वाले मोदी उस समय कुछ नहीं बोलते जब अमेरिकी राष्ट्रपति भारत के नागरिकों को हथकड़ी लगाकर भूखे-प्यासे मालवाहक जहाज से भारत भेजते हैं। उनका सारा बड़बोलापन गायब हो जाता है।

इसी तरह अमित शाह जिन्हें पूँजीवादी मीडिया भारत की राजनीति का चाणक्य कहता है, मार्च 2026 तक माओवादियों का सफाया करने की हुंकार तो भरते हैं लेकिन मणिपुर की आग बुझाने में उनको पसीना आ जाता है। वे भूलकर भी मणिपुर का जिक्र नहीं करते।

आज भारत की राजनीति में ऐसे ही मंत्रियों का बोलबाला है जिसका जिक्र हरिशंकर परसाई करते हैं।

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