नीयत

Published
Tue, 09/01/2026 - 15:50
/neeyat

अरे मुल्ला जी आज सावन का पहला सोमवार है थोड़ा लगा लो, कहते हुए पंडित जी ने तम्बाकू भरी चिलम नजाकत अली की तरफ बढ़ाई। मशीन की आड़ का अंधेरा चिलम में उठने वाली लपट में चमक उठा और थोड़े लम्हे भर के लिए चार चेहरे चमकने लगे। धुंए का गाढ़ा बादल हवा में उठा ‘‘तगड़ा माल है।’’ सीने में बचा रह गया धुंआ बात खत्म होने के साथ हौले हौले निकला। नजाकत अली पुराने खिलाड़ी हैं और पण्डित जी मण्डली के अध्यक्ष। मजदूरों की यह छोटी सी मण्डली करीब 15 मिनट गुफ्तगू से शुरू होती और चिलम से मदहोश।
    
इधर अनीस मियां मन ही मन नजाकत अली की हरकतों से कुढ़ते रहते। कम्बख्त से कोई बात कहो तो तवज्जो तो रत्ती भर भी न देगा उलटा चार बातें यूं ही सुना देगा ऊपर से गांजा चढ़ा लेगा। एक तो खंजर ऊपर से जहर बुझा कौन आफत मोल ले। 
    
‘‘देखते हो गिरी महाराज! मियां सुबह से कश पे कश लगाए जा रहे हैं मानो मुंह न हुआ फैक्टरी की चिमनी हुई। सुबह से चार घण्टे हो गये और जनाब को कोई टेंशन नहीं। इन्हें तो गर हटा दें मेरे पास से तो बेहतर रहे। क्यूं बालत तो न कहां गिरी बाबा? इधर गिरी बाबा ने भी अनीस मियां की बात पर कोई खास गौर न किया बस हां-हूं करते रहे। 
    
अनीस मियां और नजाकत अली यूं तो पड़ोसी हैं और साथ-साथ ही कम्पनी से रूबरू भी हुए थे मगर दोनों के दिलों की खाईयां बहुत गहरी हैं। अनीस मियां की बातों से यूं जाहिर होता गया मानो उनके सबसे बड़े अदू, सबसे बड़े दुश्मने जां नजाकत अली ही हों। हालांकि मियां की खुदगर्जी, मतलबपरस्ती, जगजाहिर थी तो नजाकत अली की बदजबानी और अक्खड़पन के चर्चे प्लांट में भरे पड़े थे।
    
अनीस मियां हुए दीन के पक्के, रोजा नमाज वाले मजहबी इंसान और नजाकत अली ठहरे मस्त मौला, फक्कड़ी अंदाज के धनी। अभी बीते चार महीने से बोलचाल बंद है। बात असल में रमजान के पहले रोजे की थी ‘‘नजाकत भाई आज तो रोजा रखा होगा।’’ अनीस मियां बगल में बैठे हैं। चैकस कान जानते हैं कि अब कोई तीर छोड़ा जाएगा जिसका निशाना मैं बनूंगा। ‘‘अरे जब मन ही नापाक हो तो रोजे रखने से क्या खुदा खुश हो जाएगा। जिंदगी भर इंसानों के लिए दिलों में कुफ्र पालो, जहन को दोजख कर डालो और खुदा को दिखाने के लिए करते रहो ला इलाहा इल्ल ला। खुदा गारत करे! यह दगाबाजी हमसे तो न होगी। 
    
‘‘दिन भर चिलम से धुंआ फूंकने से तो खुदा का खौफ न होता होगा? दगाबाजी का एहसास तो न होता, क्यों भला? अनीस भाई ने भी तैश में आकर खुदा की हिफाजत की। 
    
खुदा के बंदों को देखकर अपना कलेजा जलाने से बेहतर है कि चिलम के धुंए से कलेजा जलाया जाये, इस जलन में खुशी तो है, नजाकत भाई ने कटाक्ष किया। 
    
खैर तब से चार महीने हो गये, दोनों मजदूर एक ही जगह पर एक ही प्रकृति का काम कर रहे थे मगर थे एक दूजे के विपरीत। गुफ्तगू बंद थी और नागवार एक-दूसरे को देखना। 
    
नजाकत भाई अपनी मण्डली के साथ भोग लगाने गये हैं। एक नया मजदूर अनीस के साथ ग्राइंडर मार रहा है। ‘‘इससे पहले कहां काम करते थे मियां? ‘‘नए मजदूर का नाम मनोहर है, ‘‘गुड़गांव में’’। सरलता भरा जवाब। नए मजदूर को इस प्लांट में 6 महीने हो चुके हैं। आज पहला मौका है जब अनीस के साथ ग्राइंडर मार रहे हैं। 
    
‘‘तुम्हारे बारे में कुछ सुना है मैंने।‘‘ क्या? मनोहर ने जानना चाहा। ‘‘यही दिल्ली, मजदूरों का आंदोलन। मैंने सुना तुम भी थे मजदूरों के आंदोलन में, क्या तुम्हें लगता है मजदूरों में, जनता में एकता होगी। अनीस मियां लगातार कोई बात छेड़ते और बिना बात की तह तक पहुंचे कोई निष्कर्ष सुना देते और पुनः नई बात छेड़ देते। और मनोहर चुपचाप इस धुंआधार विश्लेषक और निष्कर्षक को समझने की कोशिश करते। 
    
‘‘वैसे मियां नजाकत अली के बारे में क्या ख्याल है आपका, किस तरह के आदमी हैं। मनोहर ने जान बूझकर बात छेड़ी। 
    
‘‘बहुत वाहयात है बदजुबान! तुम भी मियां किसका नाम ले बैठे।’’ मुंह बिचकाते हुए अनीस ने बात बढ़ाई। 
    
‘‘मियां एक बात कहूं बुरा तो न मानिएगा।’’ मनोहर ने प्रश्न किया।
    
हां हा! जरूर कहें, जनाब। ग्राइंडर बंद करके एक तरफ रखा गया। 
    
मनोहर ने शरीर को कुछ आराम दिया।  उंगलियां चटकाईं। ‘‘मियां मैंने हमेशाा ही तुम्हारी जबान को नजाकत भाई के खिलाफ बोलते सुना मगर नजाकत भाई को कभी तुम्हारे लिए बदजबानी करते नहीं सुना।’’ मनोहर ने बात जारी रखी ‘‘अभी कल ही की बात है इत्तफाकन तुम्हारा जिक्र कर बैठे, बोले कि कितने जहीन और सलीकेदार इंसान हैं घर पर भी सलीके से रहते हैं कायदे की बात करते हैं। 
    
अनीस भाई खामोश थे। शायद ऐसी खामोशी पहली बार उनके भीतर से उठी। अनीस भाई निरुत्तर थे। खामोश थे खुद से ही प्रश्न पूछते और खुद ही जवाब तलाश करने लगते। और बस मौन थे। मानो गुनाह करके कोई पनाह ढूंढ रहे हों। फिलवक्त अनीस की हालत यूं थी कि मानो गुनहगार भी खुद हो, न्याय सुनाने वाले भी खुद और जल्लाद भी खुद। 
    
आ गए नजाकत भाई भोग लगाकर? मधुर मुस्कुराहट के साथ नजाकत अली ने मनोहर को देखा। जो अभी अभी रोज का काम निपटा कर आए थे। हां! जवाब आया। 
    
घटना को बीते 6 महीने हो चुके हैं। नजाकत और मनोहर आज एक साथ स्कूटी से ड्यूटी आ रहे हैं। ‘‘समझ में नहीं आ रहा अनीस इतना बदल कैसे गया।’’ नजाकत ने यूं ही जानना चाहा कि शायद कोई बाजिब जवाब मिले। 

मनोहर: हां नजाकत भाई! पहले तो आपकी बुराई करते न थकते थे पर अब सच में बदल गये हैं। अभी कल ही कह रहे थे कि आप जुबान से कुछ तीखा बोल देते हो पर दिल के काफी अच्छे हो। अच्छा ही है कि आप दोनों की तकरार खत्म हो गयी। वैसे भी हम मजदूर इन छोटी-छोटी बातों पर मन में गांठ बांध लेंगे तो हक-हकूक की लड़़ाई के लिए मालिक के खिलाफ एक कैसे होंगे। 

नजाकत भाई: सही कहते हो मनोहर भाई! मैं भी दिल में जो आता है बक देता हूं। आगे से ख्याल रखूंगा। अपनी एकता कायम करने की खातिर इतना तो कर सकता हूं।     -पथिक 

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