आज देश भर में छात्र बेहतर और सम्मानजनक शिक्षा के अधिकार के लिए आवाज उठा रहे हैं। अलग-अलग राज्यों और शहरों से छात्र अपने स्कूलों की बदहाल तस्वीरें सामने ला रहे हैं। कहीं स्कूल की इमारत जर्जर है, कहीं पीने का पानी नहीं है, कहीं शौचालय नहीं है, तो कहीं बिजली, पंखे, प्रयोगशालाओं और दूसरी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। सबसे गंभीर स्थिति शिक्षकों की कमी की है।
इन मांगों को लेकर छात्रों का सड़कों पर उतरना किसी राजनीतिक साजिश का परिणाम नहीं, बल्कि उस शिक्षा व्यवस्था की वास्तविकता है जिसे सरकारें वर्षों से खोखला करती आई हैं।
लेकिन छात्रों की इन जायज आवाजों को सुनने और व्यवस्था की खामियों को दूर करने के बजाय मोदी सरकार और उसके समर्थक अक्सर इन आंदोलनों को राजनीतिक साजिश बताने में जुट जाते हैं। कभी आंदोलनों को विपक्ष की साजिश कहा जाता है, कभी छात्रों को बदनाम किया जाता है और कभी उन्हें तरह-तरह के राजनीतिक विशेषणों से नवाजा जाता है।
सवाल यह है कि अगर स्कूलों में सब कुछ ठीक है, तो फिर छात्र सड़कों पर क्यों हैं? और अगर सरकार को अपनी शिक्षा व्यवस्था पर इतना भरोसा है, तो नीति आयोग और UDISE+ के आंकड़े आखिर किसकी पोल खोल रहे हैं?
नीति आयोग ने मई 2026 में ‘School Education System in India : Temporal Analysis and Policy Roadmap for Quality Enhancement’ रिपोर्ट जारी की। यह रिपोर्ट UDISE+ 2014-15 से 2024-25, PARAKH 2024, NAS और ASER समेत विभिन्न स्रोतों के आंकड़ों का विश्लेषण करती है।
रिपोर्ट के मुताबिक 2014-15 में देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 11.07 लाख थी, जो 2024-25 में घटकर 10.13 लाख रह गई। यानी लगभग 94 हजार सरकारी स्कूल कम हुए। इसी अवधि में निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या 2.88 लाख से बढ़कर 3.39 लाख हो गई। नीति आयोग इस बदलाव को राज्यों द्वारा स्कूलों के एकीकरण और युक्तिकरण से जोड़ता है।
यह केवल स्कूलों की संख्या घटने का सवाल नहीं है। सवाल यह है कि जिन स्कूलों को बंद या विलय किया गया, उनके बच्चों को शिक्षा पाने के लिए कितनी दूर जाना पड़ा? खासकर गरीब, ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में स्कूल का बंद होना बच्चे की शिक्षा पर सीधा असर डालता है।
सरकारी स्कूल कमजोर होंगे, स्कूलों की संख्या घटेगी, शिक्षक पद खाली रहेंगे और फिर इसी बदहाल व्यवस्था को देखकर सरकार कहेगी कि सरकारी स्कूलों में बच्चे कम हो रहे हैं। यह पूरा चक्र सार्वजनिक शिक्षा को कमजोर करने की दिशा में जाता दिखाई देता है।
देश में 2024-25 के दौरान 1,04,125 स्कूल ऐसे थे जो केवल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे थे। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार ऐसे स्कूलों में एक शिक्षक को कई कक्षाओं को एक साथ पढ़ाने के अलावा प्रशासनिक काम, रिकार्ड, मिड-डे मील और दूसरी जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं। लगभग 89 प्रतिशत ऐसे स्कूल ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित थे।
सोचिए, एक शिक्षक अगर पहली से पांचवीं या दूसरी से आठवीं तक के बच्चों को एक साथ पढ़ाएगा, तो हर बच्चे को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा कैसे मिलेगी?
यह सिर्फ शिक्षक की कमी नहीं है। यह बच्चों के भविष्य के साथ किया जा रहा समझौता है।
और विडंबना देखिए- एक तरफ लाखों युवा शिक्षक बनने के लिए वर्षों पढ़ाई करते हैं, प्रतियोगी परीक्षाएं देते हैं और बेरोजगारी की मार झेलते हैं, दूसरी तरफ देश के हजारों स्कूल शिक्षक के लिए तरस रहे हैं और एक लाख से ज्यादा स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी भी सामने लाती है। बिहार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। रिपोर्ट के अनुसार बिहार में प्राथमिक/एलिमेंट्री स्तर पर 2,08,784 शिक्षक पद खाली थे। माध्यमिक स्तर पर 36,035 और उच्च माध्यमिक स्तर पर 33,035 पद रिक्त बताए गए हैं। हरियाणा में भी एलिमेंट्री स्तर पर 7,626, माध्यमिक में 4,070 और उच्च माध्यमिक में 3,847 पदों की रिक्तियां दर्ज हैं।
यानी एक तरफ सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी है और दूसरी तरफ देश में शिक्षित बेरोजगारों की लंबी कतार है। यह कैसी विकास नीति है जिसमें पढ़े-लिखे नौजवान नौकरी के लिए दर-दर भटकते हैं और बच्चे शिक्षक के लिए?
असल सवाल बेरोजगार युवाओं की योग्यता का नहीं, बल्कि इस व्यवस्था की प्राथमिकताओं का है। सरकार चाहे तो खाली पद भर सकती है, स्कूलों में स्थायी शिक्षक नियुक्त कर सकती है और बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा दे सकती है। लेकिन इसके लिए शिक्षा पर सार्वजनिक खर्च बढ़ाना होगा, स्थायी रोजगार पैदा करना होगा और शिक्षा को मुनाफे के बाजार से बाहर रखना होगा। खुद आज सरकार के आंकड़ों के अनुसार देश में लगभग 8 करोड़ युवा न तो कोई रोजगार कर रहे हैं न ही कोई व्यावसायिक कोर्स डिप्लोमा या प्रशिक्षण ले रहे हैं न ही शिक्षा ले रहे हैं। यानी सरल शब्दों में कहे तो पूर्णतया खाली बैठे हैं जो कि अपने आप में एक चिंता का विषय बनता है। शिक्षा केवल किताब और शिक्षक से नहीं चलती। सुरक्षित स्कूल भवन भी शिक्षा की बुनियादी शर्त है। लेकिन सरकारी स्कूलों की बदहाली केवल शिक्षक और शौचालय तक सीमित नहीं है।
लोकसभा में सरकार द्वारा दिए गए UDISE+ 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार 12 प्रतिशत सरकारी स्कूलों में जर्जर भवन-ब्लाॅक दर्ज किए गए हैं। 2024-25 में देश में 10.13 लाख सरकारी स्कूल थे। इस अनुपात को देखें तो यह संख्या लगभग 1.22 लाख सरकारी स्कूलों के बराबर बैठती है। उसी सरकारी जवाब में 0.3 प्रतिशत सरकारी स्कूल यानी 3000 स्कूल बिना भवन के चल रहे हैं।
यानी लाखों बच्चे ऐसे स्कूलों में पढ़ रहे हैं जहां भवन खुद सुरक्षा का सवाल बन चुका है।
जर्जर छत, टूटी दीवारें, खराब कमरे और असुरक्षित भवनों के बीच पढ़ने वाले बच्चों से फिर सरकार गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर सीखने के परिणाम की उम्मीद करती है।
जिस बच्चे की जान स्कूल की छत के नीचे सुरक्षित नहीं है, उसके हाथ में डिजिटल टैबलेट थमा देना विकास नहीं है। अकेले राजस्थान में 600 से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जिनके भवन नहीं हैं। पिछले साल ही राजस्थान में एक स्कूल की छत गिर जाने से 7 बच्चों की मौत हो गई थी और 25 से ज्यादा बच्चे घायल हो गए थे अभी 2 दिन पहले भी राजस्थान के एक स्कूल की छत अचानक गिर गई और 123 से ज्यादा बच्चे बामुश्किल ही बचे यानी सीधे-सीधे बच्चों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया जा रहा है जबकि दूसरी तरफ हम देखें कि आज मोदी सरकार और उसके मंत्रियों के लिए आलीशान बंगले बने हुए हैं, हर राज्य में बीजेपी के आलीशान आफिस खुले हुए हैं।
नीति आयोग की रिपोर्ट जहां एक तरफ इस बात के लिए अपनी पीठ थपथपाती है कि स्कूलों में बिजली उपलब्ध कराने में 2024-25 में बढ़ोत्तरी हुई है लेकिन वहीं दूसरी तरफ इसी रिपोर्ट में दर्ज है कि अभी भी 1.19 लाख स्कूलों में बिजली नहीं है।
इसी तरह 14,505 स्कूलों में पानी की सुविधा नहीं थी, जबकि लगभग 59,829 स्कूलों में हाथ धोने की सुविधा नहीं थी। 98,592 स्कूलों में लड़कियों के लिए उपयोगी शौचालय नहीं थे और 61,540 स्कूलों में कोई भी उपयोगी शौचालय नहीं था।
फिर सरकार बच्चों से बेहतर परिणाम की उम्मीद कैसे करती है?
जब बच्चा ऐसे स्कूल में पढ़ता है जहां शिक्षक नहीं, भवन जर्जर है, शौचालय नहीं, बिजली नहीं, पानी नहीं और पढ़ाई का पर्याप्त माहौल नहीं तो उसकी असफलता बच्चे की नहीं, व्यवस्था की असफलता है।
समस्या केवल शिक्षकों की कुल संख्या की नहीं, बल्कि उनके असमान वितरण की भी है। नीति आयोग के अनुसार 2024-25 में राष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिक शिक्षा में विद्यार्थी-शिक्षक अनुपात 20ः1 और माध्यमिक स्तर पर 15ः1 था, लेकिन राज्यों के बीच भारी अंतर है। माध्यमिक स्तर पर झारखंड में PTR 47:1, महाराष्ट्र में 37ः1 और ओडिशा में 37ः1 दर्ज किया गया।
दूरदराज के ग्रामीण और आदिवासी इलाकों में शिक्षक और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाना आज भी चुनौती बना हुआ है। दूसरी तरफ संसाधनों और शिक्षकों का वितरण समान नहीं है। इसका परिणाम यह है कि देश के एक हिस्से में बच्चे शिक्षक का इंतजार करते हैं और दूसरे हिस्से में शिक्षा के संसाधनों का पर्याप्त उपयोग नहीं हो पाता।
यह केवल प्रशासनिक गलती नहीं है। यह शिक्षा के प्रति सरकार की प्राथमिकताओं का सवाल है।
1991 के बाद लागू हुई उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियों ने सार्वजनिक सेवाओं को बाजार के लिए खोलने की प्रक्रिया तेज की। शिक्षा भी इससे अछूती नहीं रही। धीरे-धीरे शिक्षा को नागरिक अधिकार और सामाजिक जिम्मेदारी के बजाय निवेश और बाजार के अवसर के रूप में देखने की प्रवृत्ति मजबूत हुई।
आज इसी प्रक्रिया का अगला चरण दिखाई देता है।
एक तरफ सरकारी स्कूलों की संख्या घट रही है, दूसरी तरफ निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों की संख्या बढ़ रही है। नीति आयोग के आंकड़ों के अनुसार निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल 2014-15 के 2.88 लाख से बढ़कर 2024-25 में 3.39 लाख हो गए। सरकारी स्कूलों की संख्या इसी अवधि में 11.07 लाख से घटकर 10.13 लाख रह गई।
सवाल यह है कि जब सरकारी स्कूल कमजोर होंगे, शिक्षक पद खाली रहेंगे और बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी रहेगी, तब शिक्षा के बढ़ते निजी बाजार का फायदा आखिर किसे मिलेगा? जाहिर सी बात है, देश में मौजूद धन्ना सेठों को। जो आज दिख भी रहा है। शहरों, गली, मोहल्ला, गांव, नुक्कड़ों में कुकुरमुत्तों की तरह उग आए प्राइवेट स्कूल इसी की एक बानगी हैं जो सरकारी स्कूल की बदहाल व्यवस्था का सीधे-सीधे फायदा उठा रहे हैं। सरकारी स्कूल से तंग आकर अभिभावक जो प्राइवेट स्कूल का रुख कर रहे हैं उन्हें तरह-तरह की फीस, एडमिशन के नाम पर, ट्यूशन से लेकर किताबें, ड्रेस व तरह-तरह के कामों के नाम पर भुगतान करनी पड़ रही है जिसका सीधा असर आज मजदूर मेहनतकश की जेबों पर पड़ रहा है। लेकिन जब शिक्षा को बाजार में बेचने योग्य वस्तु बना दिया जाता है, तब जिसके पास पैसा होगा वह बेहतर शिक्षा खरीद सकेगा और गरीब परिवारों के बच्चे बदहाल सरकारी व्यवस्था में धकेले जाएंगे। दूसरी तरफ यही निजी स्कूल अपने यहां काम करने वालों को बेहद कम वेतन पर खटा रहे हैं।
निजी स्कूलों में बड़ी संख्या में शिक्षित युवा बेहद कम वेतन पर लंबे घंटे काम करने को मजबूर हैं। यानी एक तरफ अभिभावकों की जेब से मोटी फीस वसूली जाती है और दूसरी तरफ उसी शिक्षा व्यवस्था में काम करने वाले शिक्षकों को सस्ता श्रम समझकर निचोड़ा जाता है।
इसके अलावा आज शिक्षा की गुणवत्ता पर किस तरह हमला बोला गया है उसमें नीति आयोग की रिपोर्ट में PARAKH 2024 के आधार पर बताया गया है कि, माध्यमिक स्तर के छात्रों में गणित में केवल 37 प्रतिशत विद्यार्थी ही अपेक्षित ग्रेड-स्तर पर प्रदर्शन कर पाए। विज्ञान में यह आंकड़ा 40 प्रतिशत था। कक्षा 5 के 35 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 का पाठ नहीं पढ़ पाते।
आज देश भर में छात्र अपनी आवाज उठा रहे हैं। कहीं भर्ती और पेपर लीक के खिलाफ, कहीं फीस और निजीकरण के खिलाफ, कहीं स्कूलों की बदहाली के खिलाफ। जंतर-मंतर से लेकर राज्यों के अलग-अलग हिस्सों तक छात्रों के आंदोलनों ने एक सवाल बार-बार उठाया है। लेकिन सरकार जवाब देने के बजाय कई बार आंदोलन को बदनाम करने का रास्ता चुनती है या दमन का सहारा लेकर भी इस आवाज को दबाने की कोशिश कर रही है। चाहे वह जंतर-मंतर हो बिहार हो या झारखंड व राजस्थान हो। आज सिर्फ कानून का सहारा लेकर ही दमन नहीं किया जा रहा है बल्कि केंद्र में बैठी संघी मोदी सरकार अपने लंपट गुंडों का सहारा लेकर भी संघर्षरत छात्रों को आवाज उठाने से रोकना चाहती है। पूरी की पूरी बीजेपी आईटी सेल ऐसे लोगों को टारगेट करने में लगी हुई है, जो सरकार की शिक्षा विरोधी नीतियों के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। उनके निशाने पर बड़ी संख्या में महिलाएं-लड़कियां हैं जिन्हें बलात्कार की धमकी देना आज आम बात हो गई है।
लेकिन आंदोलन को बदनाम करने से स्कूल की जर्जर दीवार ठीक नहीं होगी। मुकदमे दर्ज करने से शिक्षक की कमी दूर नहीं होगी। पुलिस भेजने से स्कूल में शौचालय नहीं बन जाएगा। आदेशों और मुकदमों से हकीकत नहीं बदली जा सकती। जिस बच्चे को सुरक्षित स्कूल भवन नहीं मिला, उसे सरकारी विज्ञापन से विकास नहीं समझाया जा सकता। जिस स्कूल में शिक्षक नहीं है, उसे डिजिटल इंडिया का भाषण शिक्षक नहीं दे सकता। और जिस परिवार के पास निजी स्कूल की फीस भरने के पैसे नहीं हैं, उसे विश्व गुरू बनने का सपना दिखाकर उसके बच्चे का भविष्य सुरक्षित नहीं किया जा सकता।
सरकार लगातार भारत को विकसित राष्ट्र, विश्वगुरू और डिजिटल शक्ति बनाने के बड़े-बड़े दावे करती है। लेकिन किसी देश की असली तरक्की उसके चमकदार विज्ञापनों में नहीं, बल्कि उसके स्कूलों में दिखाई देती है।
अगर लाखों सरकारी स्कूल जर्जर हालत में हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह विकास किसके लिए है?
एक तरफ देश को 5 ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था और विश्व गुरू बनाने के दावे हैं और दूसरी तरफ गरीबों के बच्चे बदहाल और कई जगह असुरक्षित स्कूलों में पढ़ने को मजबूर हैं। शिक्षा को अगर अधिकार माना जाएगा तो हर बच्चे को समान और गुणवत्तापूर्ण सरकारी शिक्षा देनी होगी। लेकिन अगर शिक्षा को बाजार की वस्तु बनाया जाएगा तो जिसके पास पैसा होगा, वह बेहतर शिक्षा खरीदेगा और गरीब का बच्चा बदहाल सरकारी स्कूल में धकेल दिया जाएगा।
यही वह बिंदु है जहां शिक्षा का सवाल वर्गीय सवाल बन जाता है जो पूंजीवादी व्यवस्था में हल नहीं हो सकता।
छात्रों का संघर्ष सिर्फ एक स्कूल में पंखा लगवाने, दूसरे स्कूल में शिक्षक नियुक्त करवाने या किसी तीसरे स्कूल में शौचालय बनवाने का संघर्ष नहीं है। यह संघर्ष इस सवाल का है कि देश के बच्चों को कैसी शिक्षा मिलेगी। यह संघर्ष इस सवाल का है कि शिक्षा अधिकार रहेगी या बाजार की वस्तु बनेगी। यह संघर्ष इस सवाल का है कि सरकार जनता के बच्चों के भविष्य पर खर्च करेगी या शिक्षा के निजी कारोबार को बढ़ावा देगी।
और यह संघर्ष इस सवाल का भी है कि विकास के नाम पर आखिर किसका विकास हो रहा है?
नीति आयोग की रिपोर्ट ने सरकार के प्रचार और जमीन की हकीकत के बीच का पर्दा काफी हद तक हटा दिया है। आंकड़े बता रहे हैं कि समस्याएं मौजूद हैं, अब छात्रों का संघर्ष बता रहा है कि इन समस्याओं को छिपाया नहीं जा सकता।