नाटो : सैन्य खर्च बढ़ाता साम्राज्यवादी गठबंधन

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बीते दिनों हेग में नाटो शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ। इस सम्मेलन में 32 देशों के इस सामरिक गठबंधन ने अपने सकल घरेलू उत्पाद का 5 प्रतिशत सैन्य खर्च करने का संकल्प लिया। नाटो का यह निर्णय जहां एक ओर दो ध्रुवों में बंटती दुनिया में साम्राज्यवादी पुनर्बंटवारे के लिए बढ़ती युद्धों की तैयारी को दिखलाता है वहीं यह निर्णय जनराहत पर खर्च घटाने, बढ़ते सैन्य खर्च का बोझ जनता से वसूलने की ओर भी ले जाता है जो स्वतः ही निर्णय के जनविरोधी चरित्र को उजागर कर देता है। 
    
यह शिखर सम्मेलन रूस-यूक्रेन के लम्बे युद्ध, इजरायल द्वारा फिलिस्तीनियों के निर्मम नरसंहार, इजरायल-अमेरिका द्वारा ईरान पर बमबारी के साये में हुआ। उम्मीद के मुताबिक चीन की बढ़ती सैन्य तैयारियों का एजेण्डा इसमें छाया रहा। चीनी-रूसी साम्राज्यवादियों के दूसरे ध्रुव को परास्त करने के लिए पश्चिमी साम्राज्यवादी सैन्य खर्च बढ़ाने को जायज ठहराने में जुटे रहे। 
    
नाटो देश का सैन्य खर्च सकल घरेलू उत्पाद के 2 प्रतिशत से बढ़ाकर 5 प्रतिशत करने का लक्ष्य लेना युद्ध तैयारियों के गुणात्मक स्तर पर बदलने का सूचक है। अगर यह लक्ष्य लागू हो जाता है तो नाटो देश हर वर्ष लगभग 3000 अरब डालर सैन्य खर्च कर रहे होंगे। यह खर्च कनाडा या इटली जैसे देशों के सकल घरेलू उत्पाद से ज्यादा है।
    
नाटो देशों का यह सैन्यीकरण ऐसे वक्त में किया जा रहा है जब इसके अधिकांश देशों की आर्थिक स्थिति बेहतर नहीं है। 2007-8 से जारी आर्थिक संकट के असर से ये मुक्त नहीं हुए हैं। अधिकांश देश 2-3 प्रतिशत की मामूली विकास दर के शिकार हैं तो कुछ की स्थिति इससे भी बुरी है। इन हालातों में सैन्य खर्च बढ़ाने का निर्णय मजदूर वर्ग के अधिकारों-सुविधाओं में कटौती और जनता पर कर वृद्धि के बगैर लागू नहीं किया जा सकता। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादियों के नेतृत्व में किये जा रहे इस सैन्यीकरण का यह भी अर्थ है कि आगामी वर्षों में दुनिया और अधिक युद्धों-सैन्य टकरावों की ओर बढ़ेगी। 
    
यह सैन्य खर्च वृद्धि दूसरे ध्रुव पर खड़े चीनी-रूसी साम्राज्यवादियों को ही नहीं तमाम विकासशील देशों को भी सैन्य खर्च वृद्धि की ओर धकेलेगी। हथियारों, मिसाइलों पर खर्च वृद्धि को मजदूर-मेहनतकश जनता की रोटी छीन कर पूरा किया जायेगा और युद्धों की स्थिति में इनके इस्तेमाल से इसी जनता को मारा जायेगा। 
    
स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के अनुसार वैसे तो बीते 10 वर्षों से सैन्य खर्च में वृद्धि वैश्विक स्तर पर जारी है पर 2024 में इसमें 9.4 प्रतिशत की भारी वृद्धि दर्ज की गयी। 2024 में कुल वैश्विक सैन्य खर्च 2718 अरब डालर था। 
    
अमेरिकी साम्राज्यवादी इस सैन्यीकरण के जरिये आर्थिक वर्चस्व की अपनी दरकती स्थिति को सैन्य वर्चस्व के जरिये बचाना चाहते हैं। हालांकि इसमें भी उन्हें तीखी प्रतिद्वन्द्विता का सामना चीन-रूस से करना पड़ रहा है। ट्रम्प इस सारे खर्च का बोझ अमेरिका पर न डाल यूरोपीय शासकों पर भी सैन्य खर्च बढ़ाने का दबाव डालते रहे हैं।  
    
स्पष्ट है कि यह सैन्यीकरण मजदूर वर्ग के हितों उसके अंतर्राष्ट्रीय भाईचारे के खिलाफ है। इसीलिए हर जगह इसका विरोध जरूरी है। 

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