वनाधिकार कानून के बावजूद जारी है जनता के वनाधिकार हनन

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पिछले दिनों उत्तराखंड सरकार ने प्रदेश भर से अतिक्रमण हटाने के नाम पर जंगलों, गांव, खत्तों, बस्तियों के लोगों को आतंकित किया। जिसके खिलाफ लोगों के आंदोलनों-प्रदर्शनों के बाद सरकार की कार्यवाही कुछ हल्की पड़ी है। ऐसे में गांव-खत्तों, जंगलों में रहने वाले लोगों के बीच वनाधिकार कानून, 2006 को लेकर काफी चर्चा है। ‘‘अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वनवासी वन अधिकारों की मान्यता अधिनियम 2006’’ के नाम से यह कानून 26 दिसम्बर 2006 को पारित हुआ था।
    
इस अधिनियम की प्रस्तावना में उद्देश्य को स्पष्ट करते हुए लिखा है कि ‘‘वन में निवास करने वाली अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासियों की जीविका तथा खाद्य सुरक्षा को सुनिश्चित करते समय वनों की संरक्षण व्यवस्था को सुदृढ़ करना भी शामिल है।’’ साथ ही इसमें पूर्व में औपनिवेशिक अतीत से लेकर इस अधिनियम के बनने तक लोगों के अधिकारों को पर्याप्त महत्व न देने की बात की गई है। इसे पारिस्थितिकी प्रणाली को बचाने और बनाए रखने के लिए जरूरी माना गया है। राज्य के विकास हेतु हस्तक्षेप के कारण प्रभावित लोगों की भूमि संबंधी सुरक्षा तथा वनों में पहुंच के अधिकारों पर ध्यान देने पर जोर दिया गया है।
    
प्रस्तावना की इन बातों से साफ है कि यह अधिनियम जनजातियों और अन्य परंपरागत वनवासियों के अधिकारों की अवहेलना होने को स्वीकार करता है। राज्य द्वारा वनवासियों और अन्य परंपरागत निवासियों के अधिकारों को दरकिनार कर उनका उत्पीड़न करने की बात को मानता है। अधिनियम पारिस्थितिकी प्रणाली और पर्यावरण सुरक्षा के लिए वनों में लोगों के अधिकारों की रक्षा को जरूरी मानता है।
    
अधिनियम में गांव की परंपरागत सीमा के भीतर वनों के मौसमी उपयोग को मान्यता दी गई है। सामुदायिक वन संसाधन के उपयोग में आरक्षित वन, संरक्षित वन, अभ्यारण और राष्ट्रीय उद्यान तक समुदायों की परंपरागत पहुंच को स्वीकार किया गया है।
    
अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत निवासियों को अपने आवास और आजीविका के लिए वन भूमि का इस्तेमाल करने, रहने और स्वयं खेती करने का अधिकार है। अन्य परंपरागत वनवासी से आशय ऐसे सदस्य या समुदाय से है जो 13 दिसंबर 2005 से पूर्व कम से कम तीन पीढ़ियों तक प्राथमिक रूप से वन या वन भूमि में निवास करता रहा है और जो जीवन की वास्तविक आवश्यकताओं के लिए उन पर निर्भर है। जहां एक पीढ़ी के लिए 25 वर्ष की अवधि मानी गई है। उन्हें वनों की गौण उपज को संग्रह करने, स्वामित्व, उपयोग करने का अधिकार है। गौण वन उत्पादन में सभी गैर इमारती वन उत्पाद हैं, जिनमें बांस, झाड़-झंकाड़, ठूंठ, बैंत, तुसार, कोया, शहद, मोम, लाख, तेंदू पत्ते, औषधीय पौधे, जड़ी-बूटी, मूल, कंद आदि प्रकार के उत्पाद शामिल हैं। चारागाही समुदायों को मछली और जलाशयों के अन्य उत्पाद, चरागाहों के उपयोग, हकदारी और पारंपरिक मौसम में संसाधनों तक पहुंच कर सामुदायिक अधिकार है। 
    
वन भूमि के लिए किसी स्थानीय प्राधिकरण या किसी राज्य सरकार को पट्टों को जारी करने का अधिकार होगा। वनवासियों को सभी वन ग्रामों, पुराने आवासों, असर्वेक्षित ग्रामों और अन्य ग्रामों में बसने और रूपांतरण के अधिकार हैं भले ही वह राजस्व गांव में लेखबद्ध हों या नहीं। उन्हें परंपरागत सामुदायिक विधि (कानून) के पालन का अधिकार है जिसे राज्य के कानून, स्वशासी जिला परिषद, स्वशासी क्षेत्रीय परिषद के कानून के अधीन मान्यता दी गयी हो। किसी प्रजाति के वन्य जीव का शिकार, फंसाने या उसके कोई अंग निकालने का परंपरागत अधिकार इसके तहत नहीं है। अनुसूचित जनजाति और अन्य वन निवासियों को 13 दिसंबर 2005 से पूर्व किसी भी प्रकार की वन भूमि से हटाने पर बेदखल या विस्थापित किए गए लोगों के यथावत पुनर्वास का अधिकार है। केंद्र या राज्य सरकार की सुविधाओं के लिए वन भूमि में परिवर्तन की व्यवस्था है। स्कूल, अस्पताल, लघु सिंचाई नहर, सामुदायिक केंद्र, पेयजल आपूर्ति लाइन, आंगनबाड़ी, उचित कीमत की दुकान (राशन की दुकान), अपारंपरिक ऊर्जा स्रोत, सड़कें, पानी की टंकी और अन्य लघु जलाशय, बिजली व दूरसंचार लाइन, कौशल उन्नयन-व्यवसायिक केंद्र बनाए जा सकते हैं। हालांकि इन कार्यों के लिए उपयोग में आने वाली भूमि प्रत्येक मामले में एक हेक्टेयर से कम होनी चाहिए तथा इसकी सिफारिश ग्राम सभा द्वारा की गई हो।
    
अधिनियम के अध्याय 3 में वन अधिकारों की मान्यता (recognition) उनका पुनर्स्थापना (restoration) और निहित होना (involve) तथा संबंधित विषय हैं। इसमें राष्ट्रीय उद्यान और अभ्यारण्यों में संकटग्रस्त वन जीवों के आवास की जगहों पर लोगों के पहले की तरह वन अधिकार पुनः स्थापित किया जा सकता है हालांकि उनके सभी शर्तों को पूरा करने की दशा में ही उन्हें विस्थापित किया जा सकता है। राज्य सरकार को वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत यह स्थापित करना होगा कि अधिकार धारकों की उपस्थिति वन्य पशुओं पर नुकसान के लिए पर्याप्त है और उक्त प्रजाति के अस्तित्व के लिए खतरा है। राज्य सरकार इस नतीजे पर पहुंच गई है कि सह अस्तित्व और अन्य उचित विकल्प नहीं है। सिर्फ इस स्थिति में ही अधिकार धारकों को अन्यत्र विस्थापित किया जाएगा।
    
प्रस्तावित पुनः व्यवस्थापन (rearrangement) या पैकेज के लिए सम्बद्ध ग्राम सभाओं की लिखित सहमति प्राप्त करनी होगी जिसमें लोगों व समुदाय की जीविका की व्यवस्था हो। नए पुनर्वास पर सुविधाएं और भूमि आवंटन वायदे किए गए पैकेज के अनुसार पूरा होने पर ही पुनःव्यवस्थापन होगा। वन्य जीव संरक्षण के लिए किए गए लोगों के पुनः व्यवस्थापन के बाद केंद्रीय या राज्य सरकार किसी अन्य उपयोग के लिए भूमि नहीं दे सकती है।
    
किसी भी व्यक्ति को मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी किए बिना उसके द्वारा उपयोग में लाई जा रही वन भूमि से बेदखल नहीं किया जा सकता है। यह उपयोग की जा रही भूमि किसी भी हालत में चार हेक्टेयर से अधिक नहीं होगी।
    
वन अधिकार धारकों के कर्तव्य बताते हुए अधिनियम कहता है कि उन्हें वन्य जीव, वन और जैव विविधता का संरक्षण करना होगा। जल स्रोत, जलागम क्षेत्र और अन्य परिस्थितिकीय संवेदनशील क्षेत्र को संरक्षित करना होगा। सांस्कृतिक और प्राकृतिक विरासत को प्रभावित करने वाली विनाश कार्य व्यवहारों से संरक्षित करना होगा। वन्य जीव, वन और जैव विविधता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले क्रियाकलाप को रोकने के लिए ग्राम सभा में लिए गए फैसलों का पालन करना होगा।
    
वन अधिकारों को लागू करने की प्रक्रिया और प्राधिकार के बारे में अधिनियम कहता है कि ग्राम सभा प्रत्येक दावे का क्षेत्र अंकित करते हुए, नक्शा तैयार कर अपना संकल्प पत्र दायर करेगी। जिस पर संबंधित व्यक्ति या समुदाय 60 दिनों के भीतर अपनी आपत्ति जता सकता है। ऐसी आपत्तियों के निपटारे तब तक नहीं होंगे जब तक व्यक्ति को अपनी बात रखने का उचित अवसर नहीं मिल जाता। राज्य सरकार ग्राम सभा के संकल्प की परीक्षा कर इसे उपखंड स्तर की समिति के पास भेजेगी। यहां भी व्यक्ति अपनी आपत्ति 60 दिन के भीतर उपखंड स्तर तक कर सकता है। इससे असंतुष्ट रहने पर व्यक्ति जिला स्तर की समिति तक अपनी आपत्ति ले जा सकता है। इसके बाद वन अधिकार पर अंतिम रूप से अनुमोदन के लिए राज्य सरकार जिला स्तर की समिति का गठन करेगी। जिला समिति के फैसले अंतिम और बाध्यकारी होंगे। राज्य सरकार राज्य स्तर की एक मानीटरी समिति का गठन करेगी जो प्रक्रिया को मानिटर करने, विवरणों को देखने और रिपोर्ट पर नजर रखेगी।
    
जहां कोई प्राधिकरण समिति के अधिकारी या सदस्य इस अधिनियम का उल्लंघन करने के दोषी पाए जाएंगे तो उनके विरुद्ध कार्रवाई और 1000 रु. तक जुर्माना किया जा सकेगा। यदि व्यक्ति यह साबित करता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया या उसने ऐसे अपराध को होने से रोकने के लिए तत्परता दिखाई, तो वह दंडित नहीं होगा। कोई भी न्यायालय इस अपराध का संज्ञान नहीं ले सकता जब तक वन के निवासी ग्राम सभा के संकल्प के विवाद के मामले में या ग्राम सभा द्वारा राज्य स्तर की मानीटरी समिति के पास 60 दिन के भीतर सूचना न दे दी हो और राज्य स्तर की मानीटरी समिति ने ऐसे प्राधिकारी के विरुद्ध कार्यवाही ना कर ली हो।
    
अधिनियम का अध्याय 6 कहता है कि इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक या इस आशा से की गई कार्रवाई के लिए केंद्र, राज्य सरकार या उसके अधिकारी-कर्मचारी के विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं होगी। जनजाति मामलों का मंत्रालय या केंद्र सरकार द्वारा इसके लिए प्राधिकृत कोई अधिकारी इस अधिनियम के उपबंधों को लागू करने वाला नोडल एजेंसी होगा।
    
अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों से यह साफ है कि जहां यह कानून जनजातियों और परंपरागत वनवासियों के अधिकारों की रक्षा, उनकी मान्यता और उनके पुनः स्थापना की स्थिति में पुनर्वास की उचित व्यवस्था के लिए प्रावधान करता है वहीं दूसरी तरफ वह प्राधिकरण या समिति के सरकारी अधिकारियों व सदस्यों को भी अपराध करने की स्थिति में काफी ढील देता है। केंद्र व राज्य सरकारों को अपनी मनमानी करने के तमाम अवसर देता है। न्यायालय ऐसे अपराधों का स्वतः संज्ञान नहीं ले सकते हैं। इससे स्पष्ट है कि यह सब कुछ सरकार व शासन व्यवस्था में बैठे हुए लोगों की जनता के प्रति जवाबदेही और उनकी मंशा पर निर्भर करेगा। कभी बहुत अनुकूल परिस्थिति में हो सकता है कि जनता को अधिकार मिल जाएं। लेकिन आज जहां हर तरफ पूंजी का अंधा राज कायम है वहां इसकी गुंजाइश न के बराबर ही है। वहीं दूसरी तरफ जनता के उत्पीड़न, उनकी जबरन बेदखली और उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन किए बिना लोगों को पीड़ित किया जा सकता है। ऐसे में जनता के लिए केवल संघर्ष का ही रास्ता बनता है जिससे उसके अधिकारों के पालन की संभावना सुनिश्चित हो सकती है। अन्यथा कानून आज भी मौजूद है उसका पालन करने वाले राज्य सरकार, केंद्र सरकार, तमाम सरकारी अधिकारी-कर्मचारी मौजूद हैं लेकिन आंसू बहाती जनता अपने आशियाने और जीविका के साधनों को उजड़ते हुए देखने पर मजबूर है।

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