देश में हो रहे तथाकथित ‘‘विकास’’ की सबसे बड़ी कीमत देश के मजदूरों-मेहनतकशों को चुकानी पड़ती है। दिल्ली में फरवरी 2025 में बीजेपी की सरकार बनी उसके बाद दिल्ली में डबल इंजन की सरकार है यानी कि केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार है और अब दिल्ली को विकास की नई ऊंचाइयों में पहुंचाने की तैयारी हो रही है। इस विकास की कीमत मजदूर मेहनतकश चुका रहे हैं।
इस बार हमला उनके आशियानों पर है। उ.प्र. के ‘‘बुलडोजर राज’’ का बुलडोजर जो पहले मुसलमानों के घरों पर बरस रहा था अब यह दिल्ली की मजदूर बस्तियों पर बरस रहा है। अवैध निर्माण से लेकर मेट्रो विस्तार के नाम पर यह ध्वस्तीकरण चल रहा है।
इस बार कार्रवाई ऐसे समय में की जा रही है जब अदालत में ग्रीष्मकालीन अवकाश चल रहा है। इसलिए लोग अपने बचाव में न्यायपालिका भी नहीं जा सके। जिन घरों को ध्वस्तीकरण पर दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा स्टे पूर्व में दिया गया था उन्हें भी तोड़ दिया गया है। कालकाजी स्थित बस्ती में तो रात के 3ः00 बजे ही बुलडोजर आ गए ताकि सुबह होते ही लोग कोर्ट ना चले जाएं और रात से ही बुलडोजर बस्ती उजाड़ने में लग गए।
यह कार्रवाई ऐसे समय में की जा रही है जब दिल्ली का तापमान 40 से 45 डिग्री सेल्सियस है और तपती दुपहरी में लोगों के घर उजाड़ दिए जा रहे हैं। सरकार को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि इस तपती दोपहर में लोग कहां जाएंगे। जिन मजदूर बस्तियों को तोड़ा गया है वहां रहने की स्थितियां पहले भी बहुत अच्छी नहीं थीं। कालकाजी बस्ती में इतनी तंग गलियां थीं कि दो आदमी इकट्ठे एक साथ गली से नहीं निकल सकते थे। वहां न तो सूरज की किरण आती थी और न ही हवा आने की कोई जगह थी। शाम के समय तो गलियों और घरों में घुटन जैसी स्थितियां पैदा हो जाती थीं पर फिर भी लोग किसी तरीके से रह रहे थे। रोजगार की तलाश में अपने गांव के घरों को छोड़ ये लोग दिल्ली जैसे शहर में बसे और यहां बसे इन्हें 30-40 साल और कई जगह तो 50-60 साल हो गए। किसी तरीके से जिंदगी बसर कर रहे थे।
वजीरपुर औद्योगिक क्षेत्र की जिन मजदूर बस्तियों को उजाड़ा गया है वहां भी रहने के लिए किसी तरीके से लोगों ने एक-दो मंजिले मकान बना रखे थे। वहां भी गलियों में इतनी जगह नहीं थी कि लोग जीना (छत पर या दूसरी मंजिल पर जाने की सीढ़ी) बना सकें। तो लोग बांस की सीढ़ी द्वारा ही दूसरी मंजिल में जाते थे। ऐसा पहले कहीं नहीं देखा गया था। लोगों को इतना भी समय नहीं दिया गया कि वे अपना जरूरी सामान निकाल सकें। घरों के पास जब एक पत्रकार ने एक बच्चे से पूछा कि आपका नाम क्या है तो बच्ची ने बहुत ही कायदे का उत्तर दिया कि हमारा तो नाम ही खत्म हो गया क्योंकि हमारे कागजात, प्रमाण पत्र सब मलबे में तब्दील कर दिए गए। अब जब कोई दस्तावेज नहीं है तो हमारा नाम ही खत्म हो गया।
दिल्ली में लगभग सभी औद्योगिक क्षेत्र के पास में मजदूरों की बस्ती हैं या झुग्गियां हैं। एक समय में इन्हें खुद उस समय की सरकारों व पूंजीपतियों ने बसाया था। ऐसा करने का एक महत्वपूर्ण कारण यह भी था कि अगर मजदूर उद्योग क्षेत्र में या उसके आस-पास रहेगा तो मजदूर हर समय 24 घंटे मालिकों के काम के लिए उपलब्ध रहेगा। दूसरा यदि कार्यक्षेत्र के पास में ही रहता है तो उसका कार्यक्षेत्र में आने-जाने का किराया भी बचता है। ऐसे में मजदूरों को कम मजदूरी देकर भी काम कराया जा सकता है।
जिन कुछ मजदूरों को जगहें आवंटित की भी गई हैं वह बहुत ही कम है। अनेक परिवार जिसमें मां-बाप, बच्चे रहते हैं उन्हें एक कमरा उपलब्ध कराया गया है और वह कमरा भी काफी छोटा है। उसमें सिर्फ एक ही फैमिली रह सकती है। मध्यम वर्ग के लोगों का आंगन भी उससे बड़ा होता है। दूसरा यह जगह उनके कार्य क्षेत्र से 30-40 या 50 किलोमीटर दूर तक है जैसे कि मद्रासी जंगपुरा के पास जो मद्रासी कैंप को तोड़ा गया है वहां रह रहे लोग आस-पास के इलाकों में ही काम करते थे। आदमी उस इलाके की दुकानों-दफ्तर आदि में काम करते थे या मध्यवर्गीय लोगों के घरों में ड्राइवर का काम करते थे। उनकी पत्नियां-महिलाएं मध्यवर्गीय लोगों के घरों में झाड़ू-पोंछा या खाना बनाने का काम किया करती थीं। अब उन्हें इतनी दूर पटक दिया है कि उनसे उनका पहले का रोजगार और घर की छत छिन गयी है।
दिल्ली को बसाने वाले मजदूरों को पहले भी कई बार उजाड़ा जा चुका है। सबसे पहले एशियाई गेम्स आयोजनों के निर्माण के लिए दिल्ली के आस-पास के मजदूरों को यहां लाया गया था। जब निर्माण कार्य खत्म हो गया तो फिर उन्हें उजाड़ दिया गया। 2010 में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों के लिए भी स्टेडियम-आवास-सड़क आदि बनाने के लिए मजदूरों को यहां लाया गया और जब राष्ट्रमंडल खेल समाप्त हुए तो फिर उन मजदूरों को यहां से उजाड़ दिया गया। इस बार ऐसा नहीं है कि सिर्फ उन मजदूर बस्तियों को उजाड़ा गया है जिनके ऊपर अवैध भूमि या सरकारी भूमि में कब्जा करने का इल्जाम लगाया गया है। इस बार बुलडोजर अनधिकृत कालोनियों पर भी चलाया गया। दिल्ली जैसे शहर में जब लोग यहां पर कामकाज की तलाश में आए तो डीडीए के पास कोई ऐसी योजना नहीं थी कि उन्हें किस तरीके से यहां बसाया जाएगा। मेहनत करने वालों ने जैसा कि होता है सस्ती जमीनें खरीदीं और उस पर अपना आशियाना बनाया। इन जगहों में मूलभूत बिजली-पानी-सीवर आदि जैसी बुनियादी सुविधायें भी नहीं थीं पर आज जब दिल्ली का विस्तार हो चुका है और ये जगहें बहुत महंगी हो गई हैं तो आज फिर इन्हें किसी न किसी बहाने उजाड़ा जा रहा है। दिल्ली की एक बड़ी आबादी तो इन्हीं बस्तियों में रहती है इसी को देखते हुए और अपनी वोट बैंक की राजनीति के कारण भी मोदी सरकार ने 2019 में लगभग 2000 कालोनियों में से 1300 कालोनियों को पीएम उदय के नाम से अधिकृत किया था। आज इन कालोनियों में से भी 9 कालोनियों को इस योजना से बाहर कर दिया और आज इन कालोनी के ऊपर बुलडोजर चलने का खतरा मंडरा रहा है।
पोचन पुर, द्वारका की कालोनी ऐसी ही कालोनी है जहां पर निम्न मध्यवर्गीय लोगों ने अपना घर बनाया। 2007 में कालोनी के लोग अपना केस दिल्ली हाईकोर्ट से जीत गए कि यह कालोनी गैरकानूनी नहीं है। उसके बाद और लोगों ने अपने घर बनाए। 2022 में सरकार इनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गई और 2025 में केस जीत गई। पर लोगों को इतना भी समय नहीं दिया गया कि वे इसके खिलाफ ऊपरी अदालत में याचिका दायर कर सकें।
दिल्ली का विकास करने के लिए एक समय में बड़े पैमाने में मजदूरों को दिल्ली में बसाया गया दूसरा गांव में खेती-किसानी की बदहाल होती स्थिति के शिकार लोग भी रोजगार की तलाश में दिल्ली की तरफ आए और उन्होंने बस्तियां बसाईं। आज ये मजदूर बस्तियां दिल्ली की ऐसी जगहों पर हैं जहां जमीनों के रेट बहुत ज्यादा बढ़ चुके हैं। आज बड़े-बड़े बिल्डरों व पूंजीपतियों की नजर इन जमीनों पर है ताकि इन जमीनों में बड़ी-बड़ी बिल्डिंगों वाले शापिंग मॉल बना और अन्य गतिविधियां कर अकूत मुनाफा कमाया जा सके। इसीलिए इन मजदूर बस्तियों को उजाड़ा जा रहा है। इन बस्तियों में एक बड़ी संख्या मोदी समर्थकों-भाजपा समर्थकों की भी है। आज जब उन्हें उजाड़ा जा रहा है तो वह इनके नापाक इरादों को समझ रहे हैं पर अभी विरोध की कोई चिंगारी नहीं बन पा रही है।
आज व्यापक जनता को समझना होगा कि यह एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग का मुनाफा बढ़ाने के लिए उन्हें उजाड़ा जा रहा है।