मुसलमानों का यथार्थ और राष्ट्रवाद का मिथक -देवेन्द्र

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गांव को लेकर हमारे जीवन और जेहन में जितनी भी यादें हैं, उसमें घर वालों के अलावा सबसे ज्यादा आत्मीय याद समतुल्लाह चाचा की ही है। उनके बगैर मेरे घर की कोई दिनचर्या उन दिनों असम्भव थी। मेरी मां को वे मलकाइन कहा करते थे। मेरी भाभियां उनसे वैसे ही डरती थीं, जैसे पिता या बूढ़े दादा से। मेरे घर में उनकी अलग थाली थी, जिसमें खाना खाने के बाद वे उसे धोकर अपनी तय मुनासिब जगह पर रख आते थे।
    
मुझे याद है, एक बार खाना देते समय मां की कलछुल से उनकी थाली छू गई थी, तब उन्होंने मां को बहुत डांटा था।
    
वे हमारे घर में दादा जी के अलावा किसी को कभी भी डांट सकते थे।
    
समतुल्लाह चाचा के ऊंचे कंधों पर बैठकर ही हम दशहरा का मेला देखने जाया करते। हमें मेले में कुछ खिलाते हुए अकेले में भी समतुल्लाह चाचा इस बात का ध्यान रखते कि हमारे खाने की कोई चीज उनसे छू न जाय।
    
मेरी बड़ी बहनों में किसी की शादी ऐसी न हुई होगी जिसमें देन-लेन सम्बन्धी किसी समस्या में वे पिताजी या दादा के साथ बराबर बैठकर शिरकत न करते रहे हों। बचपन के गांव वाले घर को लेकर हमारी ऐसी कोई स्मृति नहीं है जिसमें समतुल्लाह चाचा न हों।
    
जब मैं नौकरी करने लखीमपुर चला गया तो उस शहर में हर तरह के लोगों के बीच खूब व्यस्त और बिखरी हुई थी हमारी दिनचर्या। शहर के प्रतिष्ठित वाई.डी. कालेज में ढेर सारे हमारे कुलीग्स थे। वहां 24 साल हमने बिताए, उन 24 सालों की जो एक सबसे सघन याद है, उसमें एक हसीन चाचा थे। हसीन चाचा के बगैर लखीमपुर में हमारी एक भी शाम गुजरी हो, हमें कत्तई याद नहीं।
    
अपना दूसरा महत्त्वाकांक्षी कहानी संग्रह ‘समय-बे समय’ मैंने हसीन चाचा को ही समर्पित किया है। रेलवे स्टेशन वाली अपनी चाय की दुकान पर खूब सारी भीड़ के बीच उन्होंने ही उसका लोकार्पण किया था।
    
इसके अलावा वहां मेरे स्कूटर का अकेला मिस्त्री सलीम था। मेरी सेकेंड हैंड कार सगीर मियां के भरोसे सड़कों पर खूब निश्चिंत भाव से दौड़ी है। मेरे फिट-फाट पेंट-शर्ट रईस मियां ने बनाये थे। मेरे घर की एक-एक ईंट कल्लू मिस्त्री और पेंटर फरजान की वजह से चमकतीं रही।
    
लॉकडाउन के मारे जब पूरा देश अपने घरों में बंद हो गया था, ऐसे में एक दिन पत्नी ने लखनऊ से फोन किया कि घर में लाइट खराब हो गई है। वहां मेरे तमाम परिचित हैं। स्टूडेंट भी हैं। लेकिन मुझे असुविधा हो रही थी, किसे कहें? कोई लॉकडाउन के चलते असमर्थता भी जाहिर कर सकता है। बहुत विश्वास से मैंने सिराजुद्दीन को फोन किया। लगभग 20 मिनट बाद दुबारा पत्नी का फोन आया कि सिराजुद्दीन किसी बिजली वाले को लेकर आया था। अब लाइट ठीक हो गई। जब हसमत ने मेरे घर की रिपेयरिंग का ठेका लिया था, तब उसी के साथ लकड़ी का सारा काम सिराजुद्दीन ने ही किया था। जब काम खत्म होने लगा तो सिराजुद्दीन ने एक दिन बिना मजदूरी लिये बची हुई लकड़ियों से गौरैयों के लिए एक सुंदर सा घोसला बनाकर बरामदे की दीवाल में लगा दिया था। अभी पिछले दिन जब होली की छुट्टियों में मैं लखनऊ गया तो देखा कि अब उसमें गौरेया के बच्चे चूं-चूं करते रहते हैं
    
मेरी समूची जीवनचर्या समतुल्लाह चाचा, हसीन मियां से होते हुए आज भी हसमत और सिराजुद्दीन सरीखे ढेरों लोगों से गुंथी हुई है, जिसमें बाल काटने वाले, कपड़े इस्तरी करने वाले, सब्जी के दुकानदार आदि-आदि भरे पड़े हैं। मेरी रोजमर्रा की आदत हैं ये लोग। मैं दावे से कह सकता हूं कि आत्मीयता के धरातल पर ये तमाम लोग मेरे लेखे उन पढ़े-लिखे कुलीग्स से हजार गुना भीतर तक गहरे पैठे हुए हैं जिनके सारे आदर्श सूखकर आज ज्यादा से ज्यादा व्यावहारिक होते जाने का जुमला रट रहे हैं। मध्यवर्ग वाली हमारी जमात में वैचारिक जड़ता और जहालत की जैसी चतुर हरियाली आज लहलहा रही वैसी तो कबाड़ी बीनने-बेचने वाले कल्पना भी नहीं कर सकते। वे कल्पना भी नहीं कर सकते कि हमारे आचार्यगण आपस में बैठकर कैसी-कैसी बातें करते हैं। विद्या की बजबजाती झील के किनारे ध्यानस्थ बीमार और भूखे बगुले आज मूलतः अपराध और घृणा का धंधा फैलाये हुए हैं। किताबों की दुनिया ने इन्हें चतुर और चालाक बना दिया है। दरअसल जिसे मध्यवर्ग का बुद्धिजीवी कहा जाता है विश्वविद्यालय की दीवारों में बंद और वाचाल वह एक चतुर वर्ग का उपभोक्ता समूह है। बल्कि ईमानदारी से सोचने पर तो यही लगता कि 40-40 मिनट की दो कक्षाएं पढ़ाने के एवज में मुझे जो दो-सवा दो लाख रुपये महीने भर में मिल जाया करते हैं, उसमें कहीं न कहीं सिराजुद्दीन और उसी सरीखे रिक्शा खींचते, बोझा ढोते लाखों बाबूलाल, मंगरू, नरेश का ही चतुराई से चुराया हुआ पसीना होता है।
    
नरेश और कमरुद्दीन सरीखे ये वही लाखों लोग हैं, जो लॉकडाउन के सारे एहतियातों को धता बताते हुए आनंद विहार के रास्ते हजारों किलोमीटर दूर अपने बिहार के लिए चल पड़े थे। हमारे पवित्र भारत भूमि की राजधानी दिल्ली उनका परदेस है। उनका अपना देश तो विकास से वंचित किसी अधाह अंधेरे में डूबा बिहार, गाजीपुर और देवरिया का कोई गांव, कोई कस्बा है।
    
मुझे हमेशा लगता कि भारत जैसे किसी देश के न सिर्फ आर्थिक, बल्कि सांस्कृतिक विकास में भी प्रतिष्ठित इतिहासकारों, गणितज्ञों, अर्थशास्त्रियों, साहित्यकारों, या कुरान की आयतें बांचते-बेचते मुल्ला, मौलवी, बाइबिल के पटवारी छाप पादरी या सत्यनारायण के कथाखोरों से इनकी भूमिका किसी भी तरह कमतर नहीं, बल्कि श्रेष्ठ भी है, और बहुत ज्यादा भी।
    
अगर हम परले दर्जे के कृतघ्न नहीं हो चुके हैं, तो वाकई हमें कोई हक नहीं कि हम इनकी नागरिकता और इनकी देशभक्ति पर सवाल या संदेह कर सकें। सिर्फ इस वजह से इनके होने को इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी आदिम कबीले में रहते हुए इनके किन्हीं अनाम पुरखों को खुदा के नाम पर हमसे अलग किसी दूसरी तरह से बहलाया और फुसलाया गया था।
    
धधकते हुए लू में सूरज की जलती किरणों से इनके भीतर के पिघलते-बहते पसीने का जो रिश्ता भारत से है, वह पटवारी के किसी बेजान कागज का कभी मुहताज नहीं हो सकता। मालिकाने हक के लिए एक निश्चित भूखण्ड चाहिए, श्रम की संस्कृति सर्वव्यापी होती है। किसी धर्म, किसी राष्ट्र, और उसके भूगोल की भौतिक बनावट इतनी महत्त्वपूर्ण नहीं कि कोई धर्म व्यापारी, कोई सम्राट, उसके सेनाध्यक्ष, मंत्रीगण या बौद्धिक लेखपालों का समूह मीडिया के रुपहले पर्दे पर आकर इन परिंदे जात श्रमिकों की नागरिकता को सर्टिफाई और जस्टिफाई करे। यह तो खूब है कि धरती के बंजर और लावारिस टुकड़े को जिन्होंने खून और पसीने बहाकर नगर बनाये नगर सम्राट उन्हीं से नागरिकता का सर्टिफिकेट मांग रहा है। कागजों की उलझाऊ दुनिया से नावाकिफ वे लोग बार-बार अपने उसी आदिम खानाबदोश लिबास में एक नगर से दूसरे नगर की ओर धकेल दिए जाते हैं।
    
यह बात अलग है कि खुद बेघर रहते हुए ये सारे लोग बहु मंजिला बिल्डिंगें बनाते हैं। मुठ्ठी भर मजूरी पाकर दूर-दूर तक फैले खेतों में अन्न उगाने के बावजूद, खुद भूखे पेट सो जाते हैं। और उधर सरकारें इन्ही के पसीने को पैसे में बदलकर हम सरीखे मुफ्तखोरों को भारी-भारी तनख्वाह देती हैं। हथियार खरीदती है। ऐसे घातक-घातक हथियार कि जब चाहें हम इनके अस्तित्व को पलक झपकते मिटा डालें। यही दर्प हमें विचारक और बुद्धिजीवी बनाता है। टी.वी. के रुपहले पर्दे पर जगमगाते हुए आकर हम हर शाम सिर्फ झूठ-फरेब की एक ऐसी महा अंत्याक्षरी खेलते हैं, जिसके प्रभाव में पूरा देश अपने आस-पास के आत्मीय यथार्थ को धुंध और कुहासे में भटकते, मिटते छोड़कर मिथकों के मायावी लोक में इतिहास और जीवन का सत्य तलाशने लगता है।
    
आज एक बड़ी और महत्त्वपूर्ण नौकरी के नाम पर हम जो कुछ कर रहे हैं, वह तो कोई भी कर लेगा। खासकर एक ऐसे समय चक्र के भीतर रहते हुए जहां गूगल में उपलब्ध सूचना भंडार ने हमारे अर्जित ज्ञान का कचूमर निकाल डाला है। लेकिन हम या हमारे सुकोमल फूल सरीखे बच्चे इन जर्जर खानाबदोसों द्वारा आधा-अधूरा छोड़ा हुआ एक मामूली काम भी कभी कर पाएंगे क्या? इन्हीं सबसे गुंथी हुई है हमारी जिंदगी, हमारा वैभव। और कृतघ्नता यह कि हम रात-दिन इन्हीं के ऊपर थूके जा रहे हैं। भरे पेट की डकार का आलम यह है कि युद्ध में मात्र एक दिन का वेतन कटाकर हम राष्ट्रभक्त हो जाते हैं। अगर हम राष्ट्रभक्त हैं तो उस दीमक का रंग क्या है? जिसने राष्ट्र की जड़ों को चाटकर उसे खोखला कर डाला है।
    
सत्ताएं चाहे जिस विचारधारा की बात करती हों, असल में वे कुलीनता की चाकरी ही करती हैं। जनता से वोट लेकर पैसे वालों की जरूरत का ज्यादा ध्यान देती हैं। इसी हम्माम में ऊभ-चूभ होते क्या कम्युनिस्ट, क्या भाजपाई, कांग्रेसी, सपाई, बसपाई और क्या मैं स्वयं खुद। हम पूरी जिंदगी सिर्फ खाते हैं। कुछ भी पैदा नहीं करते। हम कोख से बांझ और जबान से उदग्र हैं। वास्तव में हम परजीवी और लाइलाज हैं। हम इतने पढ़-लिख गए हैं कि हमें अपने गांव का मानचित्र भूल चुका है। उसी मानचित्र में कहीं खो गए हैं हमारे समतुल्लाह चाचा, हमारे हसीन चाचा, सिराजुद्दीन और हसमत के सरीखे लाखों हिन्दू-मूसलमान मजदूर, जिनके  पसीने में सैकड़ों गंगा और यमुना की पवित्रता  निरंतर प्रवाहित होती रही है। ये लोग अपनी बदहाली को ईश्वरीय विधान या नियति का अभिशाप मानते हुए भूखे पेट सो जाते रहे हैं। यह किसी कोरोना, प्लेग, या अकाल जैसी महामारी के चंद दिनों की बात नहीं, बल्कि सदियों से चलता चला आ रहा एक अटूट सिलसिला है, जिसका कोई अंत फिलहाल नहीं दिखता।
    
नेपाल या बांग्लादेश के किसी सुदूर गांव से आकर ये हमें रिक्शे पर ढोते हैं। इनकी पत्नियां हमारे चूल्हों को चमकाती हैं। किसी देश के नागरिक रजिस्टर में इनकी कोई पहचान बची नहीं रह जाती। वहां भी नहीं, जहां ये खानाबदोश की शक्ल में जन्म लेते हैं। साइबेरियाई पक्षियों की तरह उड़ान भरते हुए ये चलते चले जाते हैं धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक। कई-कई देशों की राजनीतिक सीमाओं को पार करते हुए। मामूली मजदूरी के लिए कठोर परिश्रम ही इनकी गौरवशाली नागरिकता का सर्टिफिकेट है। ‘‘वसुधैव कुटुम्बकम’’ की अवधारणा ही इनका स्वभाव है, इनकी आदत का हिस्सा है। जहां इनकी कर्मभूमि ही इनका देश होता है। इनके ही श्रम से धरती के क्षितिज पर सूरज उगता है। किसी भी राष्ट्र का झंडा इनके बलिष्ठ कंधों की ऊंचाई को नहीं छू पाता। यही यथार्थ है। देश के इसी यथार्थ में नरेश, रमायन या चिथरू के साथ घुलमिल कर समतुल्लाह चाचा, हसीन मियां और सिराजुद्दीन की सांसें बसी हुई हैं। उसे अलग करना किसी भूगोल को उसके इतिहास से अलग करना होगा। ऐसी ही उनकी अनंत यात्राओं में ही मानव जाति की संस्कृतियों के छंद रचे गये हैं।
    
हवा-हवाई, पढ़े-लिखे चतुर लोगों को इस तरह से अपने आस-पास बिखरे और उपलब्ध यथार्थ को देखे जाने से डर लगता है। क्योंकि उस यथार्थ में उनकी बौद्धिक खोखलेपन में डूबी निकम्मी आदतों के लिए कोई सम्मान भाव नहीं है। आज की मीडिया। सूचना तंत्र के भारी भरकम साम्राज्य में उन बौद्धिक आत्माओं की रुदाली कंठ तक डूबी घृणा में रात-दिन फुसफुसाती रहती है। अपने मन-मस्तिष्क तक भरे उथलेपन से भयभीत वे घृणा के कारोबारी बनकर सबसे पहले अपनी प्रतिभा का एक मिथ रचते हैं। उनके इसी मिथ से राष्ट्रवाद की अवधारणा विकसित हुई है। उनके इसी मिथ में समतुल्लाह चाचा, हसीन मियां और सिराजुद्दीन सरीखे करोड़ों मुसलमानों का यथार्थ इतिहास और वर्तमान के अंधेरे में खो चुका है।
    
धीरे-धीरे वे इस बेहूदे हद तक मिथकों में जीने लगे हैं कि मुसलमान शब्द सुनते ही वे सिराजुद्दीन की नहीं, औरंगजेब और जिन्ना की बात करते हैं। उन्हें दाऊद इब्राहिम और जामा मस्जिद का दाढ़ी छाप इमाम और आतंकी सलाउद्दीन दिखने लगता है।
    
वे चाहते हैं कि उनकी अपनी कोई भी व्याख्या आसाराम बापू, राम रहीम, नाथूराम गोडसे या लिट्टे के प्रभाकरन सरीखी नृशंसताओं से न की जाये, क्योंकि ये तमाम लोग हिंदुओं के यथार्थ नहीं, अपवाद भर हैं। और वास्तव में यह सही भी है। लेकिन पर्याप्त नहीं है।
    
उनकी यह आधी-अधूरी खंडित व्याख्या इमाम के लिए, दाऊद या आतंकी सलाउद्दीन के लिए भी बेहद मुनासिब और सुकूनदायक होती है, क्योंकि इस तरह वे गिने-चुने तलछट किस्म के लोग करोड़ों सिराजुद्दीन जैसों के यथार्थ को मटियामेट करते हुए जीते जी मिथक बन जाया करते हैं। फतवे देने की ताकत पा जाते हैं। हमारी ही बौद्धिक व्याख्याओं से उन्हें प्रतिष्ठित और सुरक्षित पनाह मिलती है। इसी दायरे में, अपनी ही दुम का पीछा करते कुत्ते की तरह एक हम हैं, बेचारा बुद्धिजीवी। उल्टी सीधी सूचनाओं की गिरहकटी में महादक्ष। महा चतुर! सबसे ज्यादा खाऊ, निर्लज्ज हम।
    
अंतःकरण का आयतन तो सिकुड़ ही चुका है, उन्माद की अवस्था में हमारा दिमाग भी निस्पंद होता जा रहा है। चौबीस घंटे, तीन सौ पैंसठ दिन हम जिस युद्ध की अनिवार्यता का प्रचार कर रहे हैं, उसकी मामूली कल्पना भी तो कर लेते, जहां एक पल के शतांश में आपके देखते-देखते, धधकती गैस का कोई एक मामूली गोला भर आपके बेटे की हड्डियों को मोम की तरह पिघला देता है। आपकी नदियां अधजले मांस के लोथड़ों से बजबजाने लगेंगी। आपके समृद्ध शहर एक विराट श्मशान के खौफ में तब्दील हो जाते हैं। युग बीत चुका है। भूल जाइए कि अब आपको शहीद कहे जाने का गौरव हासिल होने जा रहा। दरिद्र भिखारी की तरह अपने जिस्म के फफोलों से बहती मवाद और बदबू के साथ अकेले  बचे रहेंगे आप। वहां आपके शौर्य गीत सुनकर विस्मित होने वाली महान आत्माएं और ताली पीटता जनसमूह नहीं, सिर्फ ढेर सारे काक्रोच और तिलचट्टे भर रहेंगे। ऐसा होता है आज का युद्ध, जिसकी कामना किसी विक्षिप्त मानसिक रोगी के लिए ही सम्भव है।
    
लेकिन इन सबसे बेखबर, मामूली असुविधाओं तक से भी डरे-सहमे हम रात-दिन युद्ध का गीत गाते रहते। यही हमारे राष्ट्रवाद का सामाजिक छंद विधान है, जिसकी अंत्याक्षरी आज चतुर्दिक गायी और सुनाई जा रही है।    

आज हमारे जनतंत्र की यही खूबी है कि यहां पसीना और उसका उत्पाद बेमतलब की चीज होता जा रहा है। ईश्वर का सर्वप्रथम सार्वजनिक और सामूहिक निषेध ही धर्म हैं। ईश्वर की आत्मा का निवाला कर चुकने के बाद आज धर्म राजनीतिक सत्ता का सबसे मुफीद साधन बन चुका है। यहां हर व्यक्ति की पहचान उसकी जाति, उसके धर्म से बनती जा रही है। धर्म और जाति की यह गणित हमारे लिए ज्यादा अनुकूल और सुविधापरक भी है। ऐसे में राष्ट्रवाद के मिथ में समतुल्लाह चाचा, हसीन चाचा और सिराजुद्दीन का यथार्थ शायद ही कभी अपनी संगति बैठा सके।

लेकिन समय भी किसी के भरोसे कभी रुकता नहीं है। या तो आप ईमानदारी से उसके पदचाप को सुनेंगे या फिर एक दिन कचरे की तरह आपको डस्टबिन में फेंक दिया जाएगा। समय और इतिहास का न्याय बहुत निर्मम होता है। यह तय है कि जिसके पांव अपनी धरती खो देते हैं, आकाश में भी उसके लिए कोई जगह नहीं रह जाती।
    
बातें अमूर्त न रह जायें इसलिए और ज्यादा स्पष्ट यह कि सिराजुद्दीन का यथार्थ ही हमारे इतिहास और वर्तमान का अनिवार्य यथार्थ है। इस यथार्थ को धुंधलाने की मामूली कोशिश में भी हम खुद कहानी बन जाएंगे। एक ऐसी कहानी जिसे कोई सुनने वाला नहीं रहेगा।
        कथादेश जून 2025 से साभार
 

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