‘‘लोकतंत्र के रक्षक’’ हिंदू फासीवादी

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26 जून आते ही संघी सरकार और मोदी-शाह की जोड़ी को इन्दिरा गांधी की बार-बार याद आ जाती है। हर जोड़-तोड़ और लफ्फाजी में माहिर संघी अपने विरोध को अपने पक्ष में मोड़ लेने की कलाबाजी करते नजर आते हैं। हिंदुस्तान की आजादी के वक्त इस आजादी को स्वीकार करने को ये तैयार नहीं थे। इस संविधान को तो उन्होंने माना तक नहीं। उनके लिए हिंदू राष्ट्र का लक्ष्य था इसलिए इनके हिसाब से मनु स्मृति से ही देश का शासन चलना था। वक्त बदला, संघ बदला और संघियों की ड्रेस तो बदली ही रणनीति भी काफी बदल गई। 
    
इस संविधान, जो कि पूंजीवादी जनवादी संविधान था, इसे इन्होंने औपचारिक तौर पर स्वीकार लिया (वास्तव में तो आज भी नहीं स्वीकारा है)। इसे स्वीकार कर और फिर सत्ता में पहुंचकर ये इसके जनवादी स्वरूप को खत्म करने में जुट गये। यही इनका लक्ष्य था कि संविधान को तोड़ मरोड़ कर अपना हिंदू राष्ट्र कायम कर लें। मगर बेचारे उसका क्या करते, जिसके लिए यह संविधान है; जिसकी मुट्ठी में यह लोकतंत्र है, यानी एकाधिकारी पूंजी के मालिक। आखिर संघ तो शुरूवात से ही पूंजी की नग्न लूट-खसोट का पक्षधर हुआ। जब भी मौका मिला इस पूंजी की इसने खूब सेवा की और मेवा का इंतजार करते रहे। आखिरकार भाग्य खुल ही गया। 2014 में मौका मिल ही गया।
    
महान हिंदू हृदय सम्राट मोदी के सत्ता में आने के बाद तो हिंदू फासीवादियों ने तमाम पैंतरे बदले हैं। संविधान के जनवादी हिस्से पर हमला निरंतर जारी है। यह सीधे तो हो नहीं सकता। उस तरह, जिस तरह गहन संकट की घड़ी में इंदिरा गांधी की सरकार ने किया था। कांग्रेस ने तब पूंजीपतियों को संकट से उबार लिया था। मगर संघी तो दूसरे ढंग के लोग हैं। ये सीधे नहीं घुमा फिराकर जनता के एक हिस्से को अपने साथ खड़ा करके इसके जनवादी स्वरूप को खत्म करना चाहते हैं। 
    
इसके लिए इससे बेहतर क्या हो सकता है कि खुद को ही संविधान का रक्षक साबित करो। ऐसा साबित करने के लिए जरूरी है इंदिरा गांधी के संवैधानिक आपात काल को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाएं, लोकतंत्र की हत्या के रूप में मनाएं। ऐसा करते हुए संविधान के जनवादी संवैधानिक अधिकारों वाले हिस्से को खोखला करते जाएं। लोकतंत्र के भक्षक, खुद को लोकतंत्र के रक्षक के रूप में पेश करें। यह रणनीति कारगर है। 
    
इसलिए साथ-साथ ही उस दौर के संविधान संशोधन से लाए गए शब्द धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी भी इनके निशाने पर हैं। कभी संसद में  निजी बिल लाकर तो कभी न्यायालय के जरिए इसे हटाने की कोशिश बदस्तूर जारी है। अब फिर से संघी दत्तात्रेय हसबोले ने यही राग अलापा है। 
    
सवाल यह है कि जब धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी शब्द के इस्तेमाल के बावजूद एकाधिकारी पूंजी खूब लूट-खसोट कर रही हो, फल-फूल रही हो और तो और उसका काम खूब मजे से चल रहा हो तो फिर इन शब्दों को हटाने की जरूरत ही क्या है? और तो और इन शब्दों के आवरण से इस लूट-खसोट पर पर्दा रहता हो तो इसमें बुरा क्या है? फिर इनके रहने में ही फायदा है।
    
आखिर इस धर्मनिरपेक्ष शब्द ने हिंदू फासीवादियों का क्या बिगाड़ लिया। इस शब्द के बावजूद देश में दंगे होते रहे। महान मोदी गुजरात माडल खड़ा करते गए। 2002 के नरसंहार तो इसी के नीचे किए गए। देश में बाहर से धर्मनिरपेक्षता अंदर से दंगे। धर्मनिरपेक्षता ने दंगों पर पर्दा डाल दिया। जैसे दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश भारत वैसे ही सबसे बड़ा धर्मनिरपेक्षता का पालन करने वाला देश भारत उसमें भी गुजरात में मोदी और हिंदू फासीवादी।
    
इस रहस्य को सुप्रीम कोर्ट ने भी समझ लिया इसीलिए उसने इन शब्दों के खिलाफ याचिका पड़ने पर खासकर समाजवाद की अपने मुताबिक परिभाषा गढ़ करके बता डाली। 
    
संविधान बनते वक्त ऐसा मुश्किल था। समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता शब्द का इस्तेमाल करते ही कांग्रेसी अंदर-बाहर घिर जाते। तब जमाना ही इनका था। मतलब साफ था। इसलिए गोलमाल बात करके शब्द डालने से परहेज किया। जब जमाना बदल गया और इससे ज्यादा बेहतर शब्द आपातकाल के दौर में बचाव में कांग्रेसियों को कोई नहीं लगा, तब इसे संविधान में डाल दिया। आखिर सोवियत साम्राज्यवादियों से तब निकटता भी थी। 
    
खैर अब हिंदू फासीवादी क्या करें! चाहकर भी इन शब्दों का कुछ बिगाड़ नहीं पा रहे हैं। वैसे तो हिंदू फासीवादियों के लिए भी ये बेहतर आवरण है। जैसे अब तक लोकतंत्र की रक्षा के नाम पर लोकतंत्र के भीतर मोदी सरकार ने हिटलर की आत्मा को प्रवेश करवाया है वैसे ही धर्मनिरपेक्षता के साथ भी किया है। धर्म के नाम पर नफरत, हिंसा, उन्माद संघियों की भारतीय जनता को अद्भुत देन है। हिंदू राष्ट्र का ध्वज इस धर्मनिरपेक्षता के बावजूद लहरा रहा है। फिर तो हिंदू फासीवादियों को दिक्कत नहीं होनी चाहिए। 
    
हो सकता है एक दिन हिंदू फासीवादी फिर पलट कर कहें हम लोकतंत्र ही नहीं धर्मनिरपेक्षता और समाजवादी शब्द के सबसे बड़े रक्षक हैं।

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