राजेश एक्सपोर्ट: पूंजीवादी परोपजीविता और सड़ांध का उदाहरण

Published
Sun, 01/04/2026 - 15:50

कभी हर्षद मेहता और फिर कभी केतन पारिख के वित्तीय (शेयर बाजार) घोटालों से तहलका मच गया था। तब ऐसे मामले यदा-कदा ही होते थे। इसी तरह कथित 2 जी स्पेक्ट्रम जैसे घोटालों और भ्रष्टाचार के अन्य मामलों ने भी काफी सुर्खियां बटोरी थीं। बाद वाले ने तो काफी आक्रोश पैदा किया। उसके बल पर हिंदू हृदय सम्राट की अगुवाई में हिंदू फासीवादी सत्ता में आ गए।

पहले इस तरह के मामलों को जिन्हें आर्थिक अपराध की श्रेणी में रखा जाता था और घोटालों को असामान्य या अपवाद यानी कभी कभार होने वाली घटनाएं माना जाता था। मगर मोदी के केंद्र में पहुंचने के बाद अब ये सामान्य यानी अक्सर होने वाली घटनाएं हो गई हैं। यह इस हद तक हुआ कि अब यह भी भारत का न्यू नार्मल बन गया है।

इस दौर में राफेल से लेकर एयरपोर्ट अड्डे सौंपने से लेकर खदानों, जंगलों को इन्हें (पूंजीपतियों को) समर्पित कर देने तक और बैंकों, एल आई सी का मुंह इन बड़े मगरमच्छों के लिए खोल देने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई गई। सार्वजनिक संसाधनों चाहे वे प्राकृतिक संसाधन हों या फिर सार्वजनिक उपक्रम या फिर बजट आंवटन, सबकी खुली लूट के जरिए शीर्ष पूंजीवादी घरानों को खूब मोटा-तगड़ा बनाकर वैश्विक प्रतियोगिता में ज्यादा ताकतवर बनाने का खेल बड़े स्तर पर शुरू हो गया। या इसके उलट बात कहना ही सही होगा कि गुजरात की इस पूंजीवादी लाॅबी ने इसी मकसद से मोदी-शाह को यहां तक पहुंचाया था।

अडाणी, अंबानी, भारती मित्तल, टाटा-बिड़ला से लेकर इस कतार में कई दिग्गज शामिल हैं। इनके लिए जो काम पहले पर्दे के पीछे और कई आवरणों के साथ किंतु-परन्तु के साथ होता था अब वह खुलकर और डंके की चोट पर होने लगा और यह बढ़ता ही जा रहा है। यह भी अब मोदी काल का न्यू नार्मल है।

इस कतार में अब एक और नया नाम सामने आया है। यह है राजेश एक्सपोर्ट। इसके प्रमोटर हैं राजेश और प्रशांत मेहता। राजेश एक्सपोर्ट भी मूलतः गुजरात से ही है। इनकी सफलता की कहानी ने धीरू भाई अंबानी की तरह अनगिनत गुजराती उद्यमियों को प्रेरित किया कि कैसे एक छोटा पारिवारिक ज्वैलरी का धंधा वैश्विक स्तर पर सोने का साम्राज्य कायम कर सकता है।

1990 के दशक से छोटे से धंधे (आभूषण बेचने) की शुरुवात करने वाला राजेश एक्सपोर्ट 2004 में हीरा कारोबार (200 करोड़) में भी पहुंच गया। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी के साथ फोटो दिखाकर विपक्ष राजेश एक्सपोर्ट को प्रोमोट करने का आरोप लगा रहा है। खैर जो भी हो! 2015 तक यह इस हैसियत तक पहुंच गया कि स्विट्जरलैंड की वालकैम्बी एसए का होल्डिंग कंपनी के जरिए अधिग्रहण कर दुनिया भर में सुर्खियों में आ गया।

सेबी ने आर ई एल (त्म्स्) और उसके मालिक राजेश मेहता की जांच से संबंधित जून 2026 में अंतरिम आदेश में निष्कर्ष निकाला है कि इसने पांच वर्षों में लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व को गलत और बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुत किया। सेबी ने, अगले आदेश तक राजेश एक्सपोर्ट्स की प्रतिभूतियों को खरीदने, बेचने या अन्यथा लेन-देन करने से प्रतिबंधित कर दिया है। आखिर राजस्व को खूब बढ़ा चढ़ाकर दिखाने का मकसद शेयरों की कीमत को बढ़ाकर मुनाफा बटोरना था।

सेबी की जांच के मुताबिक, राजेश एक्सपोर्ट्स का 97 प्रतिशत से 99 प्रतिशत राजस्व विदेशी सहायक कंपनियों, विशेषकर स्विट्जरलैंड स्थित वालकैम्बी एसए के जरिए दिखाया गया। लेकिन जब आॅडिटरों ने वालकैम्बी के वित्तीय विवरणों को देखा, तो इसमें 542.68 करोड़ (2023 में) की आय थी। कंपनी का स्पष्टीकरण है कि सेबी ने दस्तावेज को गलत समझ लिया। सेबी ने इस कंपनी के अफ्रीकी सोने की खनन परिसंपत्तियों में लगभग 1,035 करोड़ रुपये के रिपोर्ट किए गए निवेश पर भी सवाल उठाते हुए कहा है इस संबंध में कंपनी दस्तावेज दिखाने में नाकामयाब रहा है। कंपनी पर आरोप है कि सोने की पूरी मूल्य श्रृंखला का दावा करके भी कंपनी ने शेयरों के जरिए कमाई की। दूसरा एक आरोप यह भी है कि कंपनी ने फंड को अन्य जगह जैसे निजी खातों में डायवर्ट कर दिया है।

सबसे बड़ी और गौर करने वाली बात या आरोप है कि मोदी सरकार के अधीन सेबी ने वित्तीय अनियमितताओं के बावजूद अपनी ओर से कंपनी के खातों आदि दस्तावेजों की जांच शुरू नहीं की। जांच शुरू की गई किसी शेयरहोल्डर की शिकायत पर, जिसने मार्च 2024 में राजेश एक्सपोर्ट पर लाखों रुपए की हेरा-फेरी करने का आरोप लगाया था। मगर इस शिकायत पर भी कार्रवाई सात माह बाद शुरू हुई।

इस कंपनी की साख को बढ़ाने में मोदी सरकार की खास भूमिका रही। आरोप है कि 2014 के बाद मोदी सरकार ने कई तरह से इस कंपनी को प्रोत्साहित किया। कोई कह सकता है कि इसमें क्या हर्ज है। मगर वास्तव में यह जनता (करोड़ों छोटे निवेशकों) को मूर्ख बनाकर शेयरों की कीमत फर्जी दावों के साथ खूब बढ़ाकर कंपनी की कमाई करवाने में सरकार का योगदान है।

उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना के तहत कंपनी को एडवांस केमिस्ट्री सेल (।ब्ब्) के लिए लाभार्थी बनाया गया। इसके तहत कम्पनी को पहले निवेश करके 5 ळॅी बैटरी विनिर्माण संयंत्र स्थापित करना था। यहां कुल 18,000 करोड़ रु. का निवेश होना था। मगर कम्पनी ने कुछ सौ करोड़ लगाकर काम में देरी की। बाद में इसका जुर्माना भी लगा। इसके आधार पर कंपनी को कर्नाटक और तेलंगाना में 24 हजार करोड़ से ज्यादा का निवेश का मौका मिला।

एल आई सी का यहां मार्च 2016 तक लगभग डेढ़ प्रतिशत तक निवेश (शेयरों की खरीद से) था जो मार्च 2023 तक बढ़कर लगभग 11 प्रतिशत हो गया। तब से एल आई सी ने न ही शेयर खरीदा है न ही बेचा है। यह शेयरों को कीमत में 90 प्रतिशत की गिरावट के बाद लगभग 300 करोड़ रुपये का है। जबकि 2023 में जब कंपनी के एल आई सी द्वारा हो रही शेयरों की खरीद और विशेष तौर पर मोदी सरकार की तथा राज्य सरकारों के प्रोत्साहन योजना से शेयरों के दाम आसमान छूने लगे थे। इस दौर में एल आई सी के शेयरों के रूप में निवेश 2,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का था।

कंपनी का दावा है कि एल आई सी ने यह खरीददारी शेयर बाजार से की है न कि कंपनी से सीधे। जो भी हो सभी घरेलू निवेशक पिछले दो साल में इसके शेयरों की खरीद से पीछे हट रहे थे तब भी एल आई सी इस कंपनी के साथ दृढ़ता से परोक्ष तौर पर खड़ी रही।

शेयरों की कीमत में भारी गिरावट के बावजूद ‘पंप और डंप’ के खेल के जरिए बड़े निवेशकों, कंपनी के प्रमोटर राजेश मेहता ने खूब कमाई की है जबकि लाखों छोटे निवेशकों का पैसा डूब गया है। खुदरा निवेशकों का 12 हजार करोड़ से ज्यादा रुपया स्वाहा हो गया। आरोप है कि फंड डायवर्जन के जरिए इसका एक हिस्सा 339 करोड़ रुपए राजेश मेहता जबकि 21 करोड़ रुपए उसके बेटे के निजी खाते में हस्तांतरित हुए हैं। इसके अलावा विदेशी निवेशकों और अप्रवासी निवेशकों, जो बड़े निवेशक थे, 2023 से ही स्थिति को जानते हुए कम कीमत पर खरीदे गए शेयरों को ऊंचे दामों पर बेचकर मुनाफा कमाया जबकि इन्हें खरीदने वाले छोटे यानी खुदरा निवेशक थे जो लालच में फंसकर इन्हें खरीद रहे थे। इनकी संख्या भी बढ़ती जा रही थी। जून तक आते-आते जब तक खतरे का खुदरा निवेशकों को पता लगता तब तक शेयरों की कीमत पाताल छू रही थी। इन छोटे निवेशकों की संख्या लगभग 2 लाख बताई जा रही है।

इस तरह हिंदू फासीवादी पार्टी की सरकार के दौर में मध्यम वर्गीय और निम्न मध्यम वर्गीय छोटे निवेशकों को लालच दिखाकर लूटने का यह एक कारनामा है। राजेश एक्सपोर्ट के रूप में यह उदाहरण सट्टेबाजों, पूंजीपतियों द्वारा ‘हींग लगे न फिटकरी रंग चोखा ही चोखा’ के अनुरूप जनता की मेहनत की कमाई को अपनी तिजोरियों में कर लेने का कारनामा है। यह मामला पूंजीवाद की संकटग्रस्तता, सड़ांध और भयानक परोपजीविता को भी दिखाता है।

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