अंतर्राष्ट्रीय राजनीति

ब्राजील: लूला की जीत और बोल्सोनारो देश छोड़कर भागा

/brazil-lula-ki-jeet-and-bolsonaro-desh-chodakar-bhaagaa

ब्राजील के राष्ट्रपति पद के लिए दूसरे दौर के चुनाव में लूला दा सिल्बा मामूली अंतर से चुनाव जीतने में सफल रहे। दूसरे दौर के चुनाव में लूला को 51.76 प्रतिशत व इनके प्रतिद्व

सत्ता हाथ से जाते देख नेतन्याहू बौखलाया

/sattaa-haath-se-jaate-dekh-netanyahu-baukhalaya

इजरायल के आम चुनाव में इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की पार्टी व उसके गठबंधन को मुंह की खानी पड़ी है। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए नेतन्याहू ने हर दांव चला था। और हा

सार्बिया में छात्र आंदोलन ने फासीवादी वुसिक को सत्ता से किया बेदखल

/sarbiyaa-mein-chaatra-aandolan-ne-fascist-vusik-ko-satta-se-kiya-bedakhal

हंगरी में विक्टर ओर्बान के सत्ता से बेदखल होने के बाद अब सार्बिया के अलेक्जेंडर वुसिक को भी सत्ता से हाथ धोना पड़ा है। विक्टर ओर्बान की तरह वुसिक भी घोर फासीवादी रुझान रखत

हूतियों से अपनी भद पिटवाते साऊदी शासक

/hutiyon-se-apani-bhad-pitavate-saudi-shasak

साऊदी अरब व यमन के हूती विद्रोहियों के बीच लड़ाई तेज होती जा रही है। जहां साऊदी अरब व यमन की कठपुतली सरकार की सेनाएं हूती विद्रोहियों के इलाके में बमबारी कर रही हैं वहां ह

फ्रांस में छात्र-कर्मचारी सड़कों पर, सरकार अधर में

/france-mein-chatra-karmachari-sadakon-par-sarakaar-adhar-mein

फ्रांस की राजधानी पेरिस के आस-पास के क्षेत्र इले-डी-फ्रांस से सितम्बर में शुरू हुए ‘लाइसी’ (15-18 वर्ष आयु के छात्र) छात्रों के प्रदर्शन अब पूरे देश में फैल चुके हंै। इन

नोबेल शांति पुरस्कार व आई सी सी पर नये हमले

/nobel-shanti-puraskar-v-i-c-c-par-naye-hamale

2026 का नोबेल शांति पुरस्कार अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आई सी सी) की पूर्व न्यायधीश नवी पिल्ले को मिला है। नवी पिल्ले भारतीय मूल की दक्षिण अफ्रीकी महिला हैं। नवी पि

ब्राजील चुनाव: धुर दक्षिणपंथी की वापसी का खतरा

/brazil-chunav-dhur-dkshinapanthi-ki-vapasi-ka-khataraa

ब्राजील के राष्ट्रपति चुनाव हेतु पहले चरण का मतदान 4 अक्टूबर को सम्पन्न हुआ। इस चुनाव में राष्ट्रपति पद के किसी भी उम्मीदवार को 50 प्रतिशत मत न मिलने के चलते आगामी 25 अक्

मैथ्यू वेनडाइक की घर वापसी

/mathew-vendaik-ki-ghar-vaapasi

पिछले दिनों घटी एक घटना कारपोरेट मीडिया में चर्चा का विषय नहीं बनी। क्या सत्ता क्या विपक्ष सभी को सांप सूंघ गया। यह घटना थी 18 सितम्बर को अमेरिकी जासूस मैथ्यू वेनडाइक सहि

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।