जबरिया श्रम टैरिफ
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 60 से अधिक देशों पर नये तटकर लगाने की घोषणा की है। इस टैरिफ उपाय के तहत जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर यह नया तटकर घोषित किया ग
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने 60 से अधिक देशों पर नये तटकर लगाने की घोषणा की है। इस टैरिफ उपाय के तहत जबरन श्रम से बने उत्पादों के आयात पर यह नया तटकर घोषित किया ग
कश्मीर के लोगों को लम्बे वक्त से फौजी बूटों के साये में जीना पड़ रहा है। बात चाहे भारत के नियंत्रण वाले कश्मीर की हो या पाक नियंत्रित कश्मीर की, हालात दोनों जगह एक से हैं।
जिन लोगों ने ‘आई रोबोट’ या ‘एक्स मशीना’ फिल्म देखी होगी उन्हें कुछ भान होगा कि कृत्रिम बुद्धि कैसे-कैसे गुल खिला सकती है। जहां ‘आई रोबोट’ का रोबोट कोई नुकसान नहीं करता वह
नेपाल में बहुप्रतीक्षित चुनाव सम्पन्न हो गये। चुनाव में 4 वर्ष पूर्व बनी पार्टी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को भारी बहुमत से जीत हासिल हुई। 165 सीटों पर हुए प्रत्यक्ष चुनाव
फ्रांस में 2022 में मैक्रों के दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद से शुरू हुई राजनीतिक अस्थिरता समाप्त होने का नाम नहीं ले रही है। फ्रांस में पिछले सवा साल के भीतर दो
ईरान पर अमरीकी हमले के बाद यूरोप के प्रमुख देशों की प्रतिक्रिया ने यूरोपीय साम्राज्यवादियों की वर्तमान स्थिति को बहुत मुखर ढंग से उजागर कर दिया। इसने दिखाया कि वे अमरीकी
एलन मस्क दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति हैं। ये टेस्ला और स्पेस एक्स कंपनी के मालिक हैं। डोनाल्ड ट्रम्प दुनिया के सबसे ताकतवर देश अमेरिका के राष्ट्रपति हैं। इन्हें दुनिया का
6-7 जून से अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प ने अप्रवासी विरोध के बहाने अपनी ही जनता के खिलाफ एक तरह की जंग छेड़ दी है। इस जंग का केन्द्र कैलीफोर्निया प्रांत का लॉस एंजिल्स शहर
शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।
पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है।
मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।
अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः
एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।