ठंडी भट्टियां, सूनी जेबें और पलायन को मजबूर लाखों मजदूर

Published
Fri, 05/01/2026 - 15:50
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अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर युद्ध थोपे जाने के बाद गैस-तेल संकट की वजह से औद्योगिक इलाकों में इन दिनों जो खामोशी पसरी है, वह सामान्य मंदी की नहीं, बल्कि गहरे संकट की निशानी है। भट्टियां ठंडी पड़ रही हैं, मशीनें रुक रही हैं, और उनके साथ ही लाखों मजदूरों की जिंदगी भी ठहर सी गई है। लेकिन यह सिर्फ आपूर्ति की कमी की कहानी नहीं, बल्कि पूंजीवादी व्यवस्था के अमानवीय चेहरों को भी उजागर करती है जिसमें संकट का बोझ सबसे पहले और सबसे ज्यादा मजदूरों पर पड़ता है। 
    
इस समय गैस संकट व फैक्टरी बंद होने के कारण मजदूरों का पलायन लगातार जारी है। भूख-प्यासे अपने गांव जाने को स्टेशन पर उमड़े मजदूरों की भारी भीड़ की वीडियो लगातार वायरल हो रही हैं। ट्रेनों में चढ़ने के वक्त भगदड़ व पुलिस द्वारा मजदूरों पर बरसते डंडों की खबरें आ रही हैं। स्टेशनों पर पानी पीने तक की भी व्यवस्था नहीं है। इन मजदूरों के पास घर जाने के लिए किराया तक नहीं है। फैक्टरी मालिक व ठेकेदारों ने तनख्वाह मांगने पर मजदूरों के साथ मारपीट भी की, ऐसी खबरें सुनने में आईं। ये ज्यादातर मजदूर यूपी-बिहार के रहने वाले हैं। 
    
गुजरात, महाराष्ट्र, दिल्ली-एनसीआर, राजस्थान, तमिलनाडु, तेलंगाना, पंजाब व उत्तराखंड आदि राज्यों से मजदूरों का पलायन रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
    
टेक्सटाइल, केमिकल व मार्बल कम्पनियों का बुरा हाल है जिसमें बायलर को चलाने के लिए व हीटिंग प्रोसेस के लिए भारी मात्रा में गैस की जरूरत पड़ती है। 
    
मोदी के गुजरात के सूरत व मोरबी जिले का सबसे बुरा हाल है। यहां से 3 लाख मजदूर गैस की बढ़ती कीमत व फैक्टरी बंद की वजह से घर को चले गए।
    
दिल्ली-एनसीआर (गुडगांव, मानेसर फरीदाबाद, नोएडा, गाजियाबाद) आदि जगहों से 12 लाख मजदूरों का पलायन हुआ जिसमें सबसे ज्यादा संख्या असंगठित मजदूरों की है।
    
महाराष्ट्र के पुणे तथा मुंबई आदि जैसे शहरों व औद्योगिक क्षेत्रों से 50 हजार मजदूरों का पलायन हुआ है।
    
तमिलनाडु व तेलंगाना में हजारों रेस्टोरेंट बंद हो गये जिसमें काम करने वाले हजारों मजदूर अपने घरों को चले गए। लाखों मजदूर आजीविका का संकट झेल रहे हैं। 
    
मध्य प्रदेश के भोपाल जिले में पीथमपुर, गोविंदपुर, बगरोदा, आचारापुर आदि औद्योगिक क्षेत्रों में सिर्फ पीथमपुरा से 30 हजार मजदूरों को काम से निकाल दिया गया है और 800 फैक्टरी में से 500 फैक्टरियों को गैस की कमी के कारण बंद करना पड़ा है। इनमें बड़े उद्योग तो अपने आप को संभाल लेंगे लेकिन छोटे लघु उद्योगों की बर्बादी तय है। 
    
पूंजीवादी साम्राज्यवादी व्यवस्था द्वारा पैदा किये गये संकट में मजदूरों की जिंदगी पूंजीपतियों व सरकारों के लिए कोई मायने नहीं रखती है। मोदी सरकार रोज चिल्ला-चिल्ला कर कह रही है कि गैस सिलेंडर की कोई कमी नहीं है। लेकिन 400-500 रुपये/किलो गैस बाजार में बिक रही है। मजदूर मजबूर होकर ले रहे हैं या भूखे सो रहे हैं। उनकी सुध कोई लेने वाला नहीं है। हर जगह हाहाकार मचा हुआ है और सरकार अपनी नाकामी छुपाने में लगी हुई है। 
    
मंत्री-नेता-अफसर खाना तो खा ही रहे हैं न। सरकार चाहे तो गैस की समस्या का समाधान कर सकती है या सामूहिक भोजनालय की व्यवस्था करा सकती है। लेकिन नहीं। 
    
बेशर्म-बेदर्द मोदी सरकार को गैस का संकट दिखाई नहीं देता है? हिटलरशाही रवैया से सब कुछ मैनेज किया जा रहा है। जैसे नोटबंदी हो या कोरोना महामारी हो सब कुछ मैनेज किया गया। सरकार की नाकामी की वजह से लाखों लोग मर गये और लाखों लोगों की नौकरियां गयीं। मीडिया, चैनल, अखबार आदि सब बेरहम हो चुके हैं। अगर कोई आवाज उठाने का प्रयास करता है तो उसकी आवाज को दबा दिया जाता है। 
    
पूंजीवादी व्यवस्था में मुनाफा सर्वोपरि होता है। आपदा हो चाहे महामारी हो चाहे कोई सा संकट हो, पूंजीपतियों के मुनाफे में कोई कमी नहीं आती है। इसमें गरीब मजदूर मरे, चाहे बर्बाद हो जाय, इनके लिए कोई जगह नहीं। -एक मजदूर

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