ई-20: स्वच्छ ऊर्जा के नाम पर जनता पर हमला

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
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भारत सरकार 20 प्रतिशत एथेनाल मिश्रित पेट्रोल नीति लागू करने को अपनी बड़ी सफलता बता रही है। सरकार दावा कर रही है कि उसने तय समय सीमा 2030 से पहले ही स्वच्छ ऊर्जा का यह लक्ष्य हासिल कर लिया है। दावा किया जा रहा है कि इससे करोड़ों टन कार्बन उत्र्सजन कम हुआ है और सरकार को तेल आयात में 1 लाख करोड़ रु. की बचत हुयी है। 
    
दरअसल पेट्रोल में एथेनाल मिश्रित कर कार्बन उत्सर्जन कम करना तमाम देशों की नीति रही है। भारत सरकार भी काफी वक्त से 10 प्रतिशत या उससे कम एथेनाल पेट्रोल में मिलाती रही है। पर पेट्रोल में एथेनाल की मात्रा इसलिए मनमाने तरीके से नहीं बढ़ायी जा सकती क्योंकि जो गाड़ियां इस पेट्रोल से चलनी हैं उनका इंजन एथेनाल की इस मात्रा के अनुरूप बना होना चाहिए। 
    
भारत में 2023 से पहले के बने सभी वाहन 10 प्रतिशत या इससे कम एथेनाल के पेट्रोल के अनुरूप बने थे। 2023 के बाद बने वाहनों के इंजन ही 20 प्रतिशत एथेनाल वाले पेट्रोल के अनुरूप हैं। ऐसे में देश के 80 प्रतिशत वाहन दरअसल 20 प्रतिशत एथेनाल वाले पेट्रोल के अनुरूप नहीं हैं। अगर इन वाहनों को 20 प्रतिशत एथेनाल वाले पेट्रोल पर चलाया जायेगा तो उनके फ्यूल सिस्टम के रबर, पुर्जे जैसे हौज, गैस्केट, सील समय से पहले खराब हो सकते हैं व इंजन में जंग लग सकता है।
    
सरकार ने 2023 के बाद बने सभी वाहनों के लिए ई-20 प्रमाणन अनिवार्य कर दिया। यह प्रमाणन ही दिखाता है कि ई-20 पेट्रोल के लिए इंजन के मानक अलग तरह के होने चाहिए। वाहन कम्पनियां भी इसी बात को कहती हैं कि पुराने इंजन बगैर सुधार के ई-20 पेट्रोल पर नहीं चलाये जाने चाहिए। मारुति सुजुकी तो अपने पुराने इंजनों में 7000 रु. की एक नयी किट लगा अपग्रेड करने का प्रस्ताव भी दे रही है। हीरो व टी वी एस भी इंजन में बदलाव की बात कर रहे हैं। बीमा कम्पनियां ई-20 पेट्रोल से होने वाली खराबी पर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही हैं। 
    
ऐसे में स्वच्छ ऊर्जा की ओर संक्रमण हेतु जरूरी था कि सरकार पेट्रोल पम्पों पर ई-0, ई-10 व ई-20 तीनों तरह के पेट्रोल उपलब्ध कराती और हर वाहन को उसके माॅडल के अनुरूप पेट्रोल मिलता। समय के साथ पुराने माडल की गाड़ियां चलन से बाहर होने पर ई-20 पेट्रोल में संक्रमण हो जाता। पर फासीवादी सरकार को इंजन और विज्ञान से भला क्या लेना देना। उसने सारे पेट्रोल पम्पों पर ई-20 पेट्रोल ही मुहैय्या करा सबको मजबूर कर दिया कि वे इसी पेट्रोल से गाड़ी चलायें। इसके प्रचार में सरकार दावा करने लगी कि ई-20 पेट्रोल सभी इंजनों के लिए सुरक्षित है। 
    
कुछ सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसरों ने जब सरकार की ये करतूतें उजागर कीं तो सरकार पुलिस के जरिये उनका मुंह बंद कराने में जुट गयी। मजबूरन जनता ई-20 पेट्रोल पर गाड़ी चला अपने इंजन को जोखिम में डालने को मजबूर बना दी गयी। 
    
इसके साथ ही ई-20 पेट्रोल से गाड़ियों का माइलेज (यानी 1 ली. तेल में तय की गयी दूरी) घटने लगा। एथेनाल से पेट्रोल की तुलना में 30 प्रतिशत कम ऊर्जा प्रति लीटर उत्पन्न होती है। ऐसे में माइलेज गिरना स्वाभाविक है। पर सरकार इस मसले पर भी झूठ बोलने लगी कि माइलेज में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अंततः एथेनाल पेट्रोल से सस्ता है तो स्वाभाविक है कि ई-20 पेट्रोल के दाम कम होने चाहिए। पर सरकार ई-20 पेट्रोल के दाम भी कम रखने को तैयार नहीं है। इस तरह सरकार तेल कम्पनियों को ज्यादा एथेनाल मिला मुनाफा बढ़ाने की छूट दे रही है। 
    
परिवहन मंत्री गडकरी के पुत्र निखिल गडकरी की कम्पनी ‘सी आई ए एन एग्रो इंडस्ट्रीज एंड इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड’ एथेनाल उत्पादन की प्रमुख कम्पनियों में एक है। इस कम्पनी का कारोबार व मुनाफा कुछ वर्षों में काफी बढ़ा है। स्वाभाविक ही है कि गडकरी ई-20 पेट्रोल के देश में सबसे बड़े पैरोकारों में से एक हैं। 
    
कुल मिलाकर संघी सरकार चंद एथेनाल कम्पनियों के लाभ की खातिर करोड़ों भारतीयों खासकर मध्य वर्ग की गाड़ियों के इंजन चैपट कर रही है। बड़ी तादाद में मोदी भक्त होने का खामियाजा ‘मध्य वर्ग’ भुगत रहा है।      

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