आपका नजरिया- जेल में बंद साथियों के नाम संदेश

Published
Sat, 05/16/2026 - 15:50
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गुड़गांव जेल में गये साथियों को लाल सलाम करता हूं जो भी पुलिस द्वारा फर्जी तरीके से गिरफ्तार किये गये हैं। शासकों ने डरकर अपनी व्यवस्था को बचाने के लिए उन्हें गिरफ्तार किया है। वे चाहते हैं कि मजदूरों का दिन-रात शोषण किया जाए। शोषणकारी व्यवस्था कायम रहे इसलिए उन्होंने कानून व्यवस्था के नाम पर शोषण के खिलाफ बोलने वाली व्यक्तियों को फर्जी तरीके से धारा लगाकर जेल के अंदर बंद कर दिया है। 
    
यह काम सदियों से चला आ रहा है। राजा के शासन काल में भी सच बोलने पर सूली पर चढ़ा कर मार दिया जाता था या जेल में कैद कर दिया जाता था। व्यवस्था के खिलाफ बोलना अपराध माना जाता था। अंग्रेजों के जमाने में भी क्रांतिकारियों को कैदी बनाकर रखा जाता था। ज्यादा खतरा होने पर फांसी पर झुला दिया जाता था। शासक कोई भी हो जनता के लिए नहीं होता है। वह केवल अपना राज कायम करने के लिए दिन-रात शोषणकारी व्यवस्था को बनाये रखने के लिए लूट तंत्र का शासन चलाता है। शासन-प्रशासन, मीडिया, न्यायपालिका सब के सब पूंजीपतियों की बनाई गयी इस व्यवस्था की रक्षा करते हैं। शासक कभी मेहनतकश जनता के बारे में नहीं सोचता है। केवल मेहनतकश जनता को मूर्ख बनाने के लिए कुछ नीतियां बनाई जाती हैं। वह भी अधिकारी से लेकर शासन तक कमीशनखोरी में ही बंदरबांट की जाती है। शासक वर्ग धर्म, जाति, क्षेत्रवाद और पाखण्डवाद से घेर कर जनता को मूर्ख बनाता है। 
    
जनता के लिए न्यायपालिका एक चुनौती है क्योंकि न्यायपालिका आज पैसों के दम पर चलती है। न्याय पाने के लिए आज पैसे न हों तो आप को न्याय कभी नहीं मिलेगा। न्यायपालिका की व्यवस्था में बहुत ही लचीलापन है। सालों-साल लग जाता है न्याय पाने के लिए। 
    
आज वैज्ञानिक, सामाजिक कार्यकर्ताओं को सरकार के खिलाफ बोलने पर जेल में बंद कर रखा जाता है। अपराधी प्रवृत्ति के लोग धन-बल से सदन में नेता बन जाते हैं। वह चुनाव में आसानी से जीत जाते हैं। आज भारतीय राजनेता की यही चाल-चरित्र-चेहरा है। देश के पूंजीपति इस राजनेता का पालन-पोषण करते हैं जो अपने लिए मुनाफा कमाने के लिए कारोबार करता है। देश के सारे संसाधन पर उसका कब्जा हो रखा है। 
    
जेल में बंद साथी तुम लोग जब से जेल के अंदर गए हो तब से देश में सारे औद्योगिक क्षेत्रों में धरना-प्रदर्शन चल रहा है। आगे भी चलता रहेगा। देश का पूंजीपति खुद अपनी कब्र खोदता है। उसी में खुद फंस जाता है। पूंजीपति और सरकार खुद पुराने श्रम कानूनों को रद्द कर नये लेबर कोड लेकर आये। लेकिन आज वह उलटा पेंच में खुद फंस गया। मकड़ा खुद जाल बिछाता है शिकार करने के लिए फिर स्वयं उसी जाल में फंस कर मर जाता है। एक दिन मेहनतकश जनता के आगे आमने-सामने सीधा संघर्ष होगा। एक दिन मेहनतकश अपनी दुनिया जीतेगा।         -रामकुमार (गुड़गांव)

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