अंधा बांटे रेवड़ी फिर फिर अपने को दे

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हाल ही में उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी के अर्बन को-आपरेटिव बैंक का मामला उजागर हुआ है जहां लिपिक/कैशियर और चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों की 27 भर्तियां निकली थीं। इन सभी भर्तियों पर भाजपा के मंत्री, सांसद, विधायक और अफसरों के रिश्तेदारों के बेटे-बेटियों को नियुक्तियां मिल गईं। इसमें भाजपा के पूर्व केंद्रीय गृह राज्यमंत्री अजय मिश्र टेनी और पूर्व सहकारिता मंत्री मुकुट बिहारी वर्मा सहित भाजपा से जुड़े 10 ताकतवर लोगों के नाम निकलकर सामने आए हैं, जिनके बेटे-बेटियों को लखीमपुर अर्बन को-आपरेटिव बैंक में नियुक्तियां दी गईं। 
    
दरअसल किसी प्रकार की छानबीन के दौरान इस बात का खुलासा हुआ कि 2019 में 31 दिसंबर तक अभ्यर्थियों को नौकरी के लिए अपने सारे कागजात रजिस्ट्री या पोस्ट के माध्यम से भेजने थे जिसकी सूचना किसी अखबार में दे दी गई थी। लिपिक/कैशियर के लिए न्यूनतम योग्यता स्नातक, जबकि चतुर्थ श्रेणी के लिए आठवीं पास थी। लेकिन कहा जा रहा है कि जिस अखबार में ये विज्ञप्ति निकाली गई थी वह कोई जरूरी अखबार नहीं था और उसमें भर्तियों की संख्या भी नहीं बतायी गई थी। दूसरी बात इस अखबार को लोगों तक पहुंचने ही नहीं दिया गया। जिनको नौकरी मिली उन्हीं के कागजात पहुंचे और चयन हो गया। इन भर्तियों में आरक्षण को भी किनारे कर दिया गया।
    
27 नियुक्तियों में से 7 ओबीसी और 6 एससी-एसटी को मिलनी थीं लेकिन 6 ओबीसी और केवल 2 एससी-एसटी को मिलीं। बाकी सारी सामान्य के लिए थीं जिनमें से 15 पदों पर केवल ठाकुरों को ही भर्ती किया गया। 
    
अभी तक इस गड़बड़ी पर पर्दा इसलिए पड़ा रहा क्योंकि यहां सिर्फ टेनी की बेटी को ही नहीं बल्कि मंत्री, सांसद, विधायक और अफसरों के रिश्तेदारों को भी कैशियर और बाबू बना दिया। इतना ही नहीं, इस गड़बड़ी की जांच करने आए अफसर के भतीजे को भी नौकरी दे दी गई। अर्बन को-आपरेटिव बैंक की तत्कालीन चेयरमैन पुष्पा सिंह जो कि भाजपा की एक समय मंडल प्रभारी और महिला मोर्चे की जिला प्रभारी रह चुकी हैं, उन्हीं के इशारे पर यह सब हुआ क्योंकि बिना उनकी सहमति के यह संभव नहीं था। 2018 में पुष्पा सिंह ने चेयरमैन का पद संभाला और 2019 में ये भर्तियां कराई गईं।
    
यह बात किसी एक बैंक या किसी एक संस्थान की नहीं है। हर सरकारी संस्थान में जहां भी नौकरियों की भर्तियां होती हैं, वहां सत्ता में बैठी पार्टी के लोगों और उनके रिश्तेदारों के बेटे-बेटी को ही नौकरी मिल जाती है। कहीं पैसे के दम पर तो कहीं पहचान के दम पर।
    
भाजपा, कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के लोगों पर आरोप लगाती थी कि वे अपने ही लोगों का ध्यान रखती हैं। लेकिन अब भाजपा भी वही कर रही है। इनके लिए आम मेहनतकश जनता से सरोकार का कोई मतलब नहीं है। 
    
एक तरफ तो भाजपा सरकार सारी सरकारी संस्थाओं को निजी हाथों में बेच रही है ताकि अडाणी-अंबानी जैसे लोग उससे मुनाफा कमा सकें। सरकारी संस्थानों को बंद कर अपना खर्च बचा रही है ताकि उस पैसे से नेता, मंत्री अय्याशी कर सकें। तो दूसरी तरफ जो संस्थान बचे हैं उनमें निकलने वाली नौकरियों पर अपने ही पार्टी के लोगों या उनके बच्चों/रिश्तेदारों को नौकरी देने की जुगत में लगे हैं। यानी हर तरफ से ये केवल अपना और अपने लोगों का ही फायदा कर रही है। यहां यह कहावत सही साबित होती है अंधा बाटे रेवड़ी फिर फिर अपने को दे।
    
यानी आम मेहनतकश जनता से टैक्स लेकर इस पूरी व्यवस्था को चलाया जा रहा है लेकिन मेहनतकश लोगों और उनके बच्चों को न तो नौकरी मिल रही है न शिक्षा और न ही स्वास्थ्य की सुविधाएं मिल रही हैं। कहीं पद खाली होने पर भी भर्ती नहीं निकल रही है तो कहीं जैसे ही परीक्षा का समय आता है तब ही पेपर लीक हो जाता है। कुल मिलाकर आज सरकार के पास मजदूर-मेहनतकश लोगों को देने के लिए कुछ नहीं है। 
    
देश में बढ़ती इस गैरबराबरी के खिलाफ छात्रों, नौजवानों, महिलाओं, मजदूरों, मेहनतकशों को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा तभी समाज से गैर बराबरी को खत्म किया जा सकता है।
 

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