हाय जाति! हाय! हाय! जाति

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संघ व भाजपा के लोगों के लिए भारत की जाति व्यवस्था एक अलग तरह की मुसीबत खड़ी करती है। वे एक तरफ तो चाहते हैं कि जाति पहचान के स्थान पर हिन्दू पहचान छा जाये और दूसरी तरफ समस्या यह है कि बिना जाति व्यवस्था के हिन्दू धर्म का मतलब ही क्या रह जायेगा। क्योंकि हिन्दू धर्म की मूल आत्मा ही जाति व्यवस्था है। जाति व्यवस्था हिन्दू धर्म का प्राण है। किसी व्यक्ति की जाति का आधार उसका जाति विशेष जन्म में है। और उसका पीछा उसकी जात मृत्यु के बाद भी नहीं छोड़ती। चाहे वह अंतरिक्ष में चले जाये या फिर मोदी जी की तरह भारत का प्रधानमंत्री तक बन जाये। मोदी जी हर चुनाव में बताते हैं कि वे पिछड़ी जाति (ओबीसी) से आते हैं।
    
राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की हालत ये है कि उसके प्रमुख, एक बार को छोड़कर हमेशा चितपावन ब्राह्मण रहे हैं। भाजपा-संघ का हाल यह है कि जात को पकड़े रहते हैं तो तब ही हिन्दू धर्म बचेगा। उसके कर्मकाण्ड, पूजा, संस्कार, विवाह प्रथा आदि, आदि बचेंगे। और यदि जाति ही लुप्त हो गयी तो फिर हिन्दू धर्म का बचेगा क्या? वेद, गीता, उपनिषद, पुराण, रामायण, महाभारत यानी हर ओर तो जाति, जाति ही है। पुरूष सूक्त जो कहता है वही गीता कहती है। जो गीता कहती है वही संघ-भाजपा, साधु-महात्मा दिव्य ज्ञान का आधार है। पुरूष सूक्त क्या है? 
    
पुरूष सूक्त ऋगवेद, दसवां मण्डल (10.90) कहता है ‘‘मुखमस्य मुखमासीद् बाहुराजन्यः कृतः। उरू तदस्य यद्वैश्यः। पादभ्यां शूद्रो अजायत।’’ (पुरुष के मुख से ब्राह्मण बना, उसकी भुजाएं क्षत्रिय बनी, उसकी जंघाए वैश्य बनीं और उसके पैर शूद्र बने।) 
    
हालिया चक्कर कुछ ऐसा हुआ कि बेचारे! अपनी जात की तारीफ करने वाले हाय! हाय! जाति करने लगे। एक तो जाति जनगणना वाला विपक्षी दांव ऐसा था जो उन्हें हाय! हाय! जाति कहना पड़ रहा था। परन्तु सबसे मजेदार हुआ यह कि एक दिन उत्तर प्रदेश की पुलिस कारों-गाड़ियों से जाति सूचक पोस्टर उतारने लगी। इलाहाबाद के हाईकोर्ट का एक आदेश इन्हें वहां तक ले गया। फिर इस आदेश में योगी महाराज को हिन्दुओं को एकजुट करने का नुस्खा दिखा। सो महंत जी ने एक ओर पुलिस को आदेश दिये कि जाति सूचक पोस्टर हटाओ और दूसरी ओर जाति आधारित सभाओं-प्रदर्शनों-जुलूसों पर रोक लगा दी। बेचारे भूल गये इस तरह से तो जाति मिटेगी नहीं। अगर मिटती तो भारतीय संविधान के कानून मिटा चुके होते। फिर इसका असली मकसद उन शोषित-उत्पीड़ित जातियों के मुंह पर ताला लगाना है जो पिछले कुछ समय में खूब मुखर हुए हैं। आरक्षण, जाति गणना से लेकर भाजपा जैसी हिन्दू फासीवादी पार्टी से सौदेबाजी करने के लिए कोई राजभर, कोई संजय निषाद, कोई पटेल अपनी जातियों को गोलबंद करने लगता है और इसमें सफल भी होता है। इन बेचारों को हाय! हाय! जाति इसलिए ही काफी पड़ रही है। 

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अपने व्यापक नुकसान को देखते हुए अमरीकी साम्राज्यवादियों ने अप्रैल महीने में युद्ध विराम किया और फिर पाकिस्तान की मध्यस्थता में एक ज्ञापन समझौता किया। इस ज्ञापन समझौते में अधिकांशतः ईरान की मांगें स्वीकार की गयीं। यह वस्तुतः अमरीका की पराजय थी। इस समझौते के थोड़े ही दिनों बाद अमरीका ने इसका उल्लंघन शुरू कर दिया। इजरायल ने एक भी दिन इस समझौते को नहीं माना।

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उदारवादी या वाम-उदारवादी अपनी प्रकृति से ही पूंजीवादी समाज के मूल अंतर्विरोधों को देखने में असमर्थ होते हैं। इसीलिए वे इसकी आम गति को देखने में असमर्थ होते हैं। उनका निजी सम्पत्ति, पैसे, प्रतियोगिता, इत्यादि में दृढ़़ विश्वास होता है। इनके बिना वे किसी समाज की कल्पना नहीं कर पाते। और ठीक इसी कारण वे यह नहीं देख पाते कि भ्रष्टाचार निजी सम्पत्ति, पैसा और प्रतियोगिता का अनिवार्य परिणाम है। कि इस समाज में भ्रष्टाचार को कानूनी वैधता प्रदान की जा सकती है, उसे खत्म नहीं किया जा सकता।

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तितली प्रभाव अथवा बटरफ्लाई इफेक्ट विश्रंखलता सिद्धान्त (Chaos Theory) में काफी प्रचलित धारणा है जिसका सरल सा मतलब यह है कि यदि कोई सिस्टम या व्यवस्था विश्रंखल अवस्था में हो तो कोई बहुत छोटा सा कारण भी बहुत बड़ा परिणाम पैदा कर सकता है। प्रचलित भाषा में, यदि बंगाल की खाड़ी में कोई तितली पंख फड़फड़ाये तो उससे हजारों किमी. दूर अरब सागर में तूफान आ सकता है। 

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वैसे संघी ठग-लुटेरों के पक्ष में यह कहना होगा कि उन्होंने कुछ अनोखा नहीं किया है। परंपरा प्रेमी ये ठग-लुटेरे अच्छी तरह जानते हैं कि भारत में हजारों सालों से मंदिर लूटे जाते रहे हैं। मंदिरों को देश के भीतर के हिन्दू राजाओं व ठगों-लुटेरों ने भी लूटा और बाहर से आने वाले विधर्मियों ने भी। मंदिरों की इस सारी लूटपाट के बावजूद आस्थावान हिन्दू जनता मंदिरों में चढ़ावा देती रही है। अब जब इतने मासूम आस्थावान समाज में मौजूद हों तो ठगों-लुटेरों को दोष क्यों दिया जाये?