बेरोजगार छात्र-युवा सड़कों पर

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उ.प्र. के प्रयागराज में हजारों की तादाद में छात्र-युवा सड़कों पर उतरे हुए हैं। वे योगी सरकार से पीसीएस व आर ओ-ए आर ओ परीक्षा में नार्मलाइजेशन की प्रक्रिया खत्म कर एक ही पाली में परीक्षा कराने की मांग कर रहे हैं। कई दिन से युवाओं के आयोग के दफ्तर पर जमा होने के बावजूद योगी सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। अड़ियल सरकार युवाओं के आक्रोश को लाठीचार्ज-गिरफ्तारी से कुचलने में जुटी है। खबर लिखे जाने तक सरकार पी सी एस-प्री पर छात्रों के आगे झुक गयी है पर आर ओ-ए आर ओ परीक्षा के मसले पर अड़ी है। छात्रों-युवाओं ने संघर्ष जारी रखने का एलान किया है। 
    
उ.प्र. पीसीएस में करीब 6 लाख व आरओ-एआरओ परीक्षा में लगभग 11-12 लाख अभ्यर्थी आवेदन करते हैं। कुम्भ में करोड़ों लोगों की व्यवस्था करने वाली योगी सरकार इतने अभ्यर्थियों की एक पाली में परीक्षा कराने को तैयार नहीं है। सरकार अलग-अलग पालियों में परीक्षा करा नार्मलाइजेशन के जरिये परिणाम घोषित करने पर उतारू है। छात्रों को इस नार्मलाइजेशन प्रक्रिया में उनके साथ भेदभाव होने की आशंका है इसलिए वे विरोध में उतरे हुए हैं। बीते कुछ वर्षों की परीक्षाओं के हश्र को देखते हुए छात्रों की मांगें न्यायसंगत लगती हैं। 
    
बीते कुछ वर्षों में देश और उत्तर प्रदेश में ऐसा क्या हुआ कि छात्रों का भरोसा ही आयोग से उठने लगा। बीते कुछ वर्षों में कोई महीना ऐसा नहीं बीता जब परीक्षा पेपर लीक होने, परीक्षा रद्द होने, परीक्षा परिणामों में धांधली की खबरें न आयी हों। कोई भी परीक्षा धांधली व पेपर लीक के आरोपों से सुरक्षित नहीं रही। ऐसे में सरकारी नौकरी की चाह में तैयारी कर रहे छात्र-युवा हर परीक्षा के साथ अपने को ठगा महसूस करते रहे। परीक्षा कराने वाली एजेंसियों पर उनका भरोसा घटता गया और अंततः उनका गुस्सा सड़कों पर आक्रोश बनकर उतरने लगा। 
    
छात्रों की मांग भले ही मौजूदा संघर्ष में नार्मलाइजेशन खत्म करने की हो पर वास्तव में छात्रों-युवाओं की बेचैनी के तार आसमान छूती बेरोजगारी से जुड़ जाते हैं। सालों की पढ़ाई के बाद तैयारी करने के बावजूद एक छोटी सी सरकारी नौकरी न मिल पाने का गुस्सा युवाओं के दिलों में सुलग रहा है। इस पर धांधली-पेपर लीक सरीखी घटनायें उनके गुस्से की आग में घी डाल रही हैं। सरकारों द्वारा सरकारी नौकरियां घटाते जाना, सालों-साल भर्ती प्रक्रिया शुरू न करना, भर्ती का सालों लटकना और बढ़ती बेरोजगारों की फौज ने युवाओं का भविष्य अंधकारमय कर दिया है।
    
बेकारी का दंश झेलते युवाओं को योगी का साम्प्रदायिक नारा ‘बंटोगे तो कटोगे’ जले पर नमक छिड़कने जैसा लग रहा है। इसीलिए योगी सरकार को जवाब देते हुए वे प्रयागराज में सड़कों पर नारा लगा रहे हैं ‘न बंटेंगे न हटेंगे’।
    
बेरोजगार युवाओं के इस आक्रोश के पीछे पूंजीवादी व्यवस्था की सबको रोजगार न दे पाने की अक्षमता के साथ बीते 3-4 दशकों की उदारीकरण-वैश्वीकरण-निजीकरण की नीतियां जिम्मेदार हैं। इन जनविरोधी नीतियों को देश-प्रदेश के स्तर पर बीते 10 वर्षों में तेजी से लागू करती मोदी-योगी की सरकारें जिम्मेदार हैं। बड़े पूंजीपतियों की सेवा में लीन इन सरकारों ने प्राइवेट सेक्टर में नौकरियों को बेहद असुरक्षित व जीवन-यापन लायक भी नहीं छोड़ा है। ऐसे में सरकारी नौकरी हासिल करने की चाहत घटती नौकरियों के बीच बढ़ती गयी है। इन घटती नौकरियों में संघ-भाजपा द्वारा की जा रही धांधली-बंदरबांट से आम युवा खुद को ठगा महसूस कर रहा है। 
    
युवाओं का आक्रोश अभी भले ही स्वतः स्फूर्त हो पर यह आक्रोश संगठित व सही दिशा से लैस होने पर भारी संभावना वाला हो सकता है। यह लुटेरे शासकों को श्रीलंका-बांग्लादेश की तरह गद्दी से उतार सकता है। यह सही समझदारी से लैस हो पूंजीवादी व्यवस्था के अंत में मददगार बन सकता है। यह एक बेहतर समाज को लाने का जरिया बन सकता है। कम से कम यह मोदी-योगी की साम्प्रदायिक फासीवादी राजनीति को धूल तो चटा ही सकता है। 

 

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