‘आइडिया आव इंडिया’ : कांग्रेसी सोच और व्यवहार

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आजादी से पहले तीन तरह के ‘भारत के विचार’ आपस में संघर्षरत थे। समाजवादी भारत, हिन्दू राष्ट्र और पूंजीवादी जनतंत्र। पहला वामपंथी था, दूसरा दक्षिणपंथी और तीसरा बीच का। गौरतलब बात है कि जहां इन तीनों का प्रतिनिधित्व क्रमशः कम्युनिस्ट पार्टी, आर एस एस-हिन्दू महासभा और कांग्रेस पार्टी कर रहे थे वहीं स्वयं कांग्रेस पार्टी के भीतर ये तीनों विचार मौजूद थे। 
    
1935 में भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने फैसला किया कि वह अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखते हुए कांग्रेस पार्टी में शामिल होकर भी काम करेगी। इसके लिए कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को कांग्रेस पार्टी की सदस्यता लेनी थी। इस नीति का परिणाम यह हुआ कि कांग्रेस पार्टी में नीचे से लेकर ऊपर तक हर जगह कम्युनिस्ट भर्ती हो गये। जब इसी समय के आस-पास कांग्रेस पार्टी के भीतर के कुछ नेताओं ने कांग्रेस समाजवादी पार्टी की स्थापना की तो कम्युनिस्ट उसमें भी शामिल हो गये। इस तरह उनकी तिहरी सदस्यता हो गयी; हालांकि 1939 में उन्हें कांग्रेस समाजवादी पार्टी से निकाल दिया गया। 
    
यदि कांग्रेस पार्टी में वाम पक्ष की ओर कम्युनिस्ट व कांग्रेस समाजवादी थे तो दूसरी ओर दक्षिण पक्ष की तरफ हिन्दू महासभा वाले लोग थे। लाला लाजपत राय और मदन मोहन मालवीय जैसे कांग्रेसी नेता हिन्दू महासभा में भी शामिल थे। इसके अलावा नीचे से ऊपर तक एक भारी जमात थी जो अपनी सोच में संघ-हिन्दू महासभा के नजदीक थी। राजेन्द्र प्रसाद, आचार्य कृपलानी, के.एम. मुंशी, गोविन्द बल्लभ पंत और सबसे ऊपर सरदार बल्लभ भाई पटेल। 
    
यदि 1930 व 40 के दशक में देश-दुनिया का आम माहौल वाम पक्ष की ओर झुका हुआ था तो कांग्रेस पार्टी की अंदरूनी संरचना दक्षिण की ओर। यदि कांग्रेस पार्टी के भीतर सदस्यों-कार्यकर्ताओं का झुकाव वामपक्ष की ओर था तो नेताओं का झुकाव दक्षिण की ओर। इसी का नतीजा यह हुआ कि देश की आजादी होते-होते कांग्रेसी वाम पक्ष कांग्रेसी पार्टी से निकाल दिया गया जबकि दक्षिण पक्ष कांग्रेस में बना रहा। कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों को 1946 में कांग्रेस पार्टी से निकाल दिया गया जबकि कांग्रेस समाजवादी पार्टी वालों ने 1948 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी नयी पार्टी बना ली। इसके बरक्स ज्यादातर हिन्दूवादी नेता कांग्रेस पार्टी में बने रहे। हालांकि महात्मा गांधी के समधी राजगोपालाचारी ने अलग होकर स्वतंत्र पार्टी बनाई पर वह हिन्दूवादी से ज्यादा ‘छुट्टा पूंजीवाद’ वाली पार्टी ज्यादा थी। 
    
आजादी के आस-पास कांग्रेस पार्टी से वामपंथियों की विदाई और हिन्दूवादी दक्षिणपंथियों के उसमें बने रहने के निश्चित निहितार्थ थे। ‘आइडिया आव इंडिया’ के लिए भी इसका निश्चित मतलब था। समाजवादी भारत और हिन्दू राष्ट्र के बीच के जिस पूंजीवादी जनतंत्र की चाहना कांग्रेसी नेताओं ने की और जिसे भारत के संविधान में सूत्रबद्ध किया गया उसे हिन्दू राष्ट्र की ओर झुक जाना था। यही नहीं ‘राष्ट्र निर्माण’ के कार्यों का भी इसी के हिसाब से अंजाम होना था। 
    
पूंजीवादी जनतंत्र के राष्ट्र निर्माण में जो प्रमुख चीज थी वह थी सामंती तत्वों का सफाया और जनवाद की स्थापना। इसके लिए किसानों की सामंती बंधनों से मुक्ति, जाति-वर्ण व्यवस्था का खात्मा, स्त्रियों की गुलामी का खात्मा तथा राष्ट्रीयताओं की बराबरी और आजादी जरूरी था। किसानों की मुक्ति के लिए जरूरी थी राजे-रजवाड़ों, जमींदारों और मठों-मंदिरों की जमीनों का भूमिहीन किसानों में बंटवारा। यह वर्ण-जाति व्यवस्था पर भी मूलगामी चोट के लिए जरूरी था। 
    
पर कांग्रेस पार्टी के भीतर दक्षिणपंथी तत्वों की भारी मौजूदगी ने सुनिश्चित किया कि यह सब न हो। इसमें उनकी निजी सम्पत्ति बचाने का हित तो था ही साथ ही उनकी पुरातन दकियानूसी सोच भी इसमें भूमिका निभा रही थी। हिन्दूवादी सोच की वजह से वे वर्ण-जाति के हामी थे। इसी तरह स्त्रियों की आजादी और बराबरी के मामले में भी उनकी सोच अच्छी नहीं थी। जहां तक मुसलमानों का सवाल है, उनकी हिन्दूवादी सोच उन्हें उनके खिलाफ पूर्वाग्रह ग्रस्त करती थी। वे हिन्दू श्रेष्ठता और हिन्दू वरीयता मान कर चलते थे। रही राष्ट्रीयताओं की बात तो सभी ‘अनेकता में एकता’ का जाप करते थे पर सभी ‘अनेकता’ की अभिव्यक्ति को ‘एकता’ के लिए खतरा मानते थे। सबको डर था कि यह देश को विभाजन की ओर ले जायेगी। 
    
इन्हीं सब का परिणाम था कि सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी उन सारे वायदों से मुकर गयी जो उसने आजादी की लड़ाई के दौरान मजदूर-मेहनतकश जनता से किये थे। देश में वास्तविक जनवाद स्थापित करने के सारे ही कामों को या तो छोड़ दिया गया या बेहद आधा-अधूरा किया गया। 
    
बहुत सारे लोगों को लगता है कि कांग्रेसी दक्षिणपंथियों ने नेहरू किस्म के लोगों के हाथ बांध दिये थे। यदि नेहरू किस्म के लोगों की संख्या ज्यादा होती तो शायद जनवाद के कामों को ज्यादा बेहतर अंजाम दिया गया होता। यह बात अंशतः ही सच है। यह सच है कि नेहरू के हाथ बंधे हुए थे। लेकिन साथ ही यह भी बात सच है कि नेहरू में स्वयं न तो उतना साहस था और न ही उतना ‘वामपंथ’। आजादी की लड़ाई के दौरान उन्होंने शायद ही कभी कम्युनिस्टों या कांग्रेसी समाजवादियों का साथ दिया हो। जब 1930 के दशक में नेहरू ने काफी गरमा-गरम बातें कीं तो कुछ पूंजीपति चिंतित हो गये। पर गांधी ने उन्हें आश्वस्त किया कि नेहरू गरजता है पर बरसता नहीं। यह यूं ही नहीं था कि पोंगापंथी और पुरातन ख्याल के गांधी ने नेहरू को ही प्रधानमंत्री बनवाया, पटेल को नहीं। नेहरू वामपंथी बातें करते हुए दक्षिणपंथी काम कर सकते थे जो मजदूर-मेहनतकश जनता और पूंजीपति वर्ग दोनों को साधने के लिए जरूरी था। खासकर तब जब जनता का मूड-मिजाज वाम की ओर झुका हुआ हो। पटेल जैसा हिन्दूवादी दक्षिणपंथी यह काम नहीं कर सकता था। 
    
इस सबका परिणाम यह निकला कि नेहरू काल में जो ‘राष्ट्र निर्माण’ हुआ वह बेहद आधा-अधूरा था। जनवाद के सारे ही मामलों में ऊपरी रंग-रोगन के नीचे बहुत कुछ पुराना वाला चलता रहा। भारत का विभाजन नहीं हुआ और न ही वह गृह युद्ध का शिकार हुआ। यहां चुनाव भी नियमित होते रहे। यह भारत के शासकों की उपलब्धि थी। लेकिन देश की भूखी-नंगी जनता की जिन्दगी में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ था, यह भी सच था। और इसके परिणाम भी जल्द ही सामने आने लगे। नेहरू की मृत्यु के बाद का एक-डेढ़ दशक भारी उथल-पुथल का काल था जिसमें उनकी सुपुत्री इंदिरा गांधी ने कभी वामपंथी लबादा ओढ़ा तो कभी तानाशाही का। अंत में उन्होंने छुट्टे पूंजीवाद और हिन्दूवाद की शरण ली जिसे उनके बेटे राजीव गांधी ने आगे बढ़ाया। 
    
आज नेहरू-गांधी खानदान के वारिस राहुल गांधी और उनके मुरीद ‘आइडिया आव इंडिया’ की कसमें खा रहे हैं और संघ परिवार को कोस रहे हैं कि वह भारत के इस विचार को खत्म कर अपना हिन्दू राष्ट्र कायम करना चाहता है। पर ऐसा करते हुए वे आसानी से यह बात भुला देते हैं कि संघ परिवार का हिन्दू राष्ट्र की ओर रास्ता उन्होंने ही साफ किया। 
    
सबसे पहले उन्होंने यह किया जनवाद स्थापित करने के कामों को आधा-अधूरा छोड़कर। सारी पुरातन बातें, सोच-विचार और सामाजिक रीति-नीति हमेशा ही फासीवादियों के लिए खाद-पानी मुहैय्या कराते हैं। इसके साथ ही जनवादी सोच का अभाव उनके सामने कोई चुनौती खड़ी नहीं कर पाता। जनवादी सोच का अभाव बहुत आसानी से फासीवादी तानाशाही के लिए रास्ता खाली कर देता है। बल्कि लोग स्वयं ही तानाशाही की आकांक्षा करने लगते हैं। 
    
दूसरे कांग्रेस पार्टी ने यह किया अपने उन कदमों के जरिये जिन्हें आज नरम हिन्दुत्व के नाम से जाना जाता है। राम मंदिर और धारा-370 के सारे इतिहास से इसे देखा जा सकता है। कांग्रेस पार्टी ने एक साथ ही बहुसंख्यक हिन्दू समुदाय और अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय दोनों को खुश करने की कोशिश की और इस प्रक्रिया में ‘सर्व धर्म समभाव’ वाली लचर धर्मनिरपेक्षता को भी तार-तार कर दिया। स्वभावतः ही इसमें बहुसंख्यक हिन्दुओं का तुष्टीकरण ज्यादा हो रहा था फिर भी उन्हें लगता रहा कि तुष्टीकरण तो केवल मुसलमानों का हो रहा है। हिन्दू फासीवादियों ने इस असंतोष का खूब फायदा उठाया। 
    
इस दिशा में उनका तीसरा महत्वपूर्ण कदम था उस ‘कल्याणकारी राज्य’ पर हमला बोलना जो कांग्रेस के भारत के विचार का आधार था। आज सारी दुनिया में ही ‘कल्याणकारी राज्य’ पर इस तरह के हमलों ने धुर दक्षिणपंथियों और फासीवादियों को पैदा होने या आगे बढ़ने का मौका दिया है। भारत में तो हिन्दू फासीवादी अपने हिन्दू राष्ट्र के विचार के साथ आजादी के पहले से मौजूद थे। वे हमेशा से छुट्टे पूंजीवाद के समर्थक थे। जब कांग्रेसियों ने खुद ही भारत के अपने विचार के आधार पर हमला बोल दिया तो हिन्दू फासीवादियों के विचार को आगे बढ़ना ही था। 
    
आज यह आश्चर्य की बात नहीं है कि कांग्रेस पार्टी के इतने सारे नेता भाजपा में शामिल हो रहे हैं और वहां ऊंचे पदों पर आसीन हो जा रहे हैं। यह केवल राजनीतिक अवसरवाद का मामला नहीं है। यह वैचारिक लगाव का भी मामला है। ये कांग्रेस में रहते हुए भी असल में संघी थे। यह आजादी के पहले से चली आ रही परिघटना का ही आधुनिक संस्करण है। यदि पटेल संघ परिवार की ‘राष्ट्र निर्माण’ में भूमिका देखते थे तो ये सारे भाजपा में शामिल होकर हिन्दू राष्ट्र के निर्माण में लग रहे हैं। ये कांग्रेस के गद्दार नहीं बल्कि हिन्दू राष्ट्र के वफादार हैं। असम के वर्तमान मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा इन सबके शिखर पुरुष हैं। 
    
आज कांग्रेस पार्टी औपचारिक- आधिकारिक तौर पर अपने ‘आइडिया आव इंडिया’ को हिन्दू फासीवादियों के हिन्दू राष्ट्र के मुकाबले खड़ा कर रही है। वह ‘भारत-जोड़ो’ यात्रा निकाल रही है और संविधान की कसमें खा रही है। लेकिन ठीक ऐसे समय में ही वह यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है कि हिन्दू फासीवादियों द्वारा पिछले दशकों में और खासकर पिछले एक दशक में ‘आइडिया आव इंडिया’ को जो चोट पहुंचाई गयी है वह उसकी भरपाई करेगी। 
    
आज कांग्रेस पार्टी यह कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही है कि वह केन्द्र की सत्ता में आने पर धारा-370 को बहाल कर देगी। वह नहीं कह पा रही है कि मुसलमानों के धार्मिक स्थलों पर हो रहे हमलों पर सख्ती से रोक लगायेगी। वह नहीं कह रही है कि पूरे देश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे भांति-भांति के मौखिक और शारीरिक हमलों से सख्ती से निपटेगी। वह नहीं कह पा रही है कि वह ‘कल्याणकारी राज्य’ की ओर वापसी करेगी। इसके बदले वह जाति की राजनीति और जातिगत आरक्षण की शरण ले रही है। संविधान की सारी कसमें भी इसी आसान और सुरक्षित राजनीति की शरण के लिए है। 
    
अभी भी जब हिन्दू फासीवादी कांग्रेस पर आरोप लगाते हैं कि वह मुसलमानों का तुष्टीकरण कर रही है तो वे पलट कर नहीं कह पाते कि भाजपा बहुसंख्यक हिन्दुओं का तुष्टीकरण कर रही है। जब हिन्दू फासीवादी आरोप लगाते हैं कि कांग्रेस सम्पत्ति का बंटवारा चाहती है तो इसे स्वीकार करने के बदले वे सफाई देने लगते हैं कि उनका ऐसा कोई इरादा नहीं है। एक कांग्रेसी नेता बयान देता है कि कांग्रेस पार्टी शहरी मध्यम वर्ग को बताने में नाकामयाब रही है कि कांग्रेस पार्टी मानती है कि पैसे के पीछे भागना कोई बुरी बात नहीं है। राहुल गांधी अखबारों में लेख छपवाकर सफाई दे रहे हैं कि वे व्यवसाईयों के विरोधी नहीं हैं। वे तो बस चंद एकाधिकारी घरानों के विरोधी हैं।
    
आधुनिक तकनीक की भाषा में बात करें तो राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी ने ‘आइडिया आव इंडिया’ का एक ‘वर्जन’ तैयार किया है जो पुराने का ‘लाइट वर्जन’ है। उन्हें लगता है कि हिन्दू फासीवादियों के वर्चस्व के इस जमाने के लिए यह संस्करण ही ज्यादा मौजूं है। उन्हें डर है कि पुराने भारी संस्करण को लोग पचा नहीं पायेंगे। 
    
अब सवाल यह है कि क्या हिन्दू फासीवादियों के वर्तमान वर्चस्व के सामने कांग्रेस के ‘आइडिया आव इंडिया’ का यह ‘लाइट वर्जन’ टिक पायेगा? क्या बड़ा एकाधिकारी पूंजीपति वर्ग इसे तवज्जो देगा? क्या चंद एकाधिकारी घरानों के अलावा बाकी घराने इस चारे को निगलेंगे? क्या पांच किलो मुफ्त राशन पर चल रहे भूखे-नंगे लोग इसमें कुछ सार्थकता देखेंगे? क्या रोज हिन्दू फासीवादियों की मार झेल रहे अल्पसंख्यक इसमें कोई उम्मीद देखेंगे? क्या दलित-पिछड़े इसमें सवर्ण वर्चस्व से निजात की कोई राह देखेंगे? क्या करोड़ों बेरोजगारों को कोई रोजगार की आशा की किरण दिखेगी? क्या कश्मीर और मणिपुर के लोग जरा भी आश्वस्त होंगे कि कांग्रेसी राज कोई बेहतरी लायेगा? ऐसे अनेकों और सवाल हैं जो इस ‘आइडिया आव इंडिया’ के ‘लाइट वर्जन’ के सामने कतार बांध कर खड़े हैं। 
    
अगर इतिहास हमें कोई दृष्टि देता है तो उस दृष्टि का अनिवार्य निष्कर्ष इन सवालों के उत्तर ‘न’ होने की तरफ ले जायेगा। कांग्रेसी खुद या दूसरों को चाहे जितना धोखा दें उत्तर ‘न’ ही होगा। 

 

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