ब्राजील: लूला की जीत और बोल्सोनारो देश छोड़कर भागा

Published
Sun, 11/01/2026 - 07:50
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ब्राजील के राष्ट्रपति पद के लिए दूसरे दौर के चुनाव में लूला दा सिल्बा मामूली अंतर से चुनाव जीतने में सफल रहे। दूसरे दौर के चुनाव में लूला को 51.76 प्रतिशत व इनके प्रतिद्वन्द्वी फ्लोवियो बोल्सोनारो को 48.24 प्रतिशत मत मिले। पहले दौर के चुनाव में किसी प्रत्याशी को 50 प्रतिशत मत न मिलने के चलते शीर्ष दो प्रत्याशियों के बीच दूसरे दौर का चुनाव हुआ था। इस जीत के साथ लूला अगले 4 वर्षों के लिए पुनः ब्राजील के राष्ट्रपति चुन लिये गये हैं। 
    
चुनाव हारने के बाद बोल्सोनारो अपने परिवार सहित अमेरिका चुपचाप भाग गया। उसको डर था कि उसके भ्रष्टाचार के कारनामे उसके बाप की तरह उसे भी जेल की सीखचों के पीछे पहुंचा देंगे। बोल्सोनारो को वोट डालने वाले उसके अमेरिका भागने के बाद अपने को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। 
    
इस चुनाव में मुख्य मुकाबला वर्षों से वामपंथ का लबादा ओढ़े लूला व घोषित दक्षिणपंथी फ्लोवियो बोल्सोनारो के बीच था। फ्लोवियो बोल्सोनारो पूर्व दक्षिणपंथी राष्ट्रपति जाएर बोल्सोनारो के पुत्र हैं। जाएर बोल्सोनारो इस वक्त कैद में हैं। चुनाव में इस जीत से ब्राजील में भी दक्षिणपंथी ताकतों के सत्तासीन होने का खतरा फिलहाल टल गया है। गौरतलब है कि लातिन अमेरिका के कई देशों में नामधारी वामपंथियों की सत्ता को दक्षिणपंथियों ने अमेरिकी साम्राज्यवादियों की मदद से प्रतिस्थापित कर दिया है और ब्राजील में भी यह खतरा मुंह बाये खड़ा था। 
    
वर्कर्स पार्टी के लूला और लातिन अमेरिका में वामपंथ का चोला ओढ़े इनके जैसी ताकतों ने दो-तीन दशक पूर्व अमेरिकी साम्राज्यवाद विरोधी जन भावनाओं का इस्तेमाल करते हुए एक के बाद एक कई देशों में सत्ता तक पहुंचने में सफलता पायी थी। नाम मात्र के जन राहत के कार्यों को करते हुए उन्होंने इसे 21वीं सदी के समाजवाद का नाम दिया था। पर वक्त ने दिखाया कि यह कहीं से भी समाजवाद नहीं था। एक के बाद एक नेता भ्रष्टाचार में डूबते गये और आर्थिक संकटों के चलते नाम मात्र के सुधार भी पलटे जाने लगे। ऐसे में अमेरिकी साम्राज्यवादियों की मदद से दक्षिणपंथी ताकतें चुनावी जीत के साथ सत्ता में लौटने लगीं। समाजवाद का चोला ओढ़े छद्म वामपंथियों का चेहरा जगजाहिर हो गया। 
    
ब्राजील के इस चुनाव पर अमेरिकी साम्राज्यवादियों के साथ-साथ चीनी साम्राज्यवादी भी निगाहें गड़ाये बैठे थे। जहां बोल्सोनारो अर्थव्यवस्था दुरुस्त करने के नाम पर कटौती कार्यक्रम, कर बढ़ाने व अमेरिकी साम्राज्यवाद से रिश्ते सुधारने की बात कर पूंजीपतियों को लुभा रहे थे वहीं लूला अमेरिका के चंगुल में न फंसने की बातें कर जनता को लुभा रहे थे। पहले दौर में अपने हश्र को देख लूला ने कई जन राहतों का वायदा किया। इसमें कर्ज माफी, सप्ताहांत में मुफ्त सार्वजनिक सेवायें, गरीब छात्रों की वित्तीय सहायता आदि वायदे शामिल हैं। इन वायदों के दम पर लूला ने चुनाव जीत तो लिया है पर वायदे पूरे करने की न तो लूला की मंशा है और न ही ब्राजील के पूंजीपतियों को नाराज कर इन वायदों को लागू कराने की उनकी हिम्मत है। फिलहाल अमेरिकी साम्राज्यवादी लूला की जीत से नाखुश हैं तो अमेरिकी वर्चस्व को चुनौती दे रहे चीनी-रूसी साम्राज्यवादी इससे खुश हैं। उनकी ब्रिक्स की परियोजनाओं को आगे बढ़ाने की उम्मीद बढ़ गयी है। 
    
लूला राष्ट्रपति चुनाव तो जीत गये हैं पर संसद के दोनों सदनों में बहुमत न होने के चलते उनकी राह आसान नहीं होने वाली। उन्हें संसद में विभिन्न ताकतों से तालमेल बैठाना पड़ेगा। 
    
जहां तक ब्राजील की जनता का प्रश्न है तो लूला की जीत से उनके जीवन मंे कोई खास खुशहाली नहीं आने वाली। उनके लिए राहत की बात इतनी ही हो सकती है कि दक्षिणपंथी ताकतों के हिंसक हमलों पर कुछ लगाम लग सकती है। हालांकि लूला के सत्तासीन होने पर दुनिया भर में तटकर का हमला बोल रहे ट्रम्प की नाराजगी ब्राजील को भी झेलनी पड़ सकती है। इसका सीधा असर ब्राजील की जनता पर पड़ेगा। लूला के पास इन हमलों से जनता को बचाने की न तो कोई योजना है और न ही मंशा है। वे तो पूंजीपतियों के ऐसे धड़े के प्रतिनिधि भर हैं जो अमेरिकी साम्राज्यवाद के आगे समर्पण के बजाय अपने सभी विकल्प खुले रखना चाहता है। जनता को लूटने-खसोटने में ये कहीं से भी कम नहीं हैं। 
    
ऐसे में समाजवाद का नकाब ओढ़े लूला का पर्दाफाश होने के बाद जनता का भला इसी में है कि वो नकली समाजवाद की जगह असली समाजवाद के लिए संघर्ष तेज करे। इसी से जनता के जीवन में बेहतरी आ सकती है। 

लूला बनाम बोल्सोनारो

लूला फ्लेवियो बोल्सोनारो से कई मामलों में भिन्न हैं कि जहां बोल्सोनारो पूर्णतया अमरीकी साम्राज्यवादियों और इजरायली यहूदी नस्लवादी सत्ता के साथ जुड़कर काम करते वहीं लूला दा सिल्वा चीनी और रूसी साम्राज्यवादियों के साथ मिलकर काम करेंगे। लेकिन दोनों दक्षिणपंथी हैं। बोल्सोनारो और वर्कर्स पार्टी के लूला दा सिल्वा का बुनियादी वर्ग चरित्र एक है। दोनों देश के भीतर पूंजीपति वर्ग की सेवा करते हैं। 
    
दोनों का बुनियादी वर्ग चरित्र एक होते हुए भी दोनों में अंतर यह है कि एक खुलेआम दक्षिणपंथ की वकालत करता है। मजदूर-मेहनतकश विरोधी है। फिलिस्तीन की आजादी का विरोधी है। यहूदी नस्लवाद का समर्थक है। वहीं दूसरा, यानी लूला दा सिल्वा फिलिस्तीन की आजादी का समर्थक है। यहूदी नस्लवादी हुकूमत द्वारा फिलिस्तीनियों के नरसंहार का विरोधी है और अपने देश के मजदूर-मेहनतकशों को कुछ छूट देने की हिमायत करता है। 
    
लेकिन यही बात, लोक लुभावन चरित्र, इसे संकट की ओर ले जाता है क्योंकि बातें मीठी-मीठी लेकिन असली काम पूंजीपति वर्ग की सेवा करने का। यह दोहरापन लूला दा सिल्वा जैसे लोगों का चरित्र है। इस दोहरेपन के विरुद्ध संघर्ष व्यापक मजदूर-मेहनतकश आबादी का मुक्ति संघर्ष ही कर सकता है। 

 

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