एच ई सी (हैवी इंजीनियरिंग कॉर्पोरेशन) का भविष्य संकट में

हज़ारों कर्मियों को नहीं मिला 18 महीने से वेतन

चंद्रयान 3 की सफलता को लेकर मोदी और उनकी सरकार ने खूब वाह वाही लूटी लेकिन अब इस मिशन की चर्चा एक और सन्दर्भ में हो रही है। दरअसल चंद्रयान 3 के लिए जिस लॉन्चिंग पेड का इस्तेमाल हुआ उसमें एच ई सी के कर्मियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है और उन्हीं कर्मियों (2700 कार्मिक और 450 अधिकारी) को 18 महीने से वेतन नहीं मिला है जिससे उनके सामने भूखों मरने की नौबत आ गयी है। 

चंद्रयान 3 से जुड़े रहने के कारण मोदी सरकार को अपनी आलोचना का डर सताने लगा तो सरकार ने स्पष्टीकरण देना शुरु कर दिया कि चंद्रयान 3 के लिए किसी भी तरह के उपकरणों के लिए एच ई सी को कोई ठेका नहीं दिया गया था। लेकिन मोदी सरकार द्वारा बताई गयी यह आधी ही सच्चाई है। दरअसल एच ई सी ने 2008 से 2013 तक उपग्रह छोड़ने के लिए लॉन्चिंग पेड बनाये थे जिनका इस्तेमाल चंद्रयान 2 तथा 3 को भी छोड़ने के लिए किया गया है। और इस तरह इस मिशन की सफलता में एच ई सी के इन कर्मियों का महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन सिर्फ वाह-वाही लूटने वाली मोदी सरकार के लिए इन कर्मियों का कोई महत्व नहीं है।

पिछले 18 महीनों से वेतन न मिलने के कारण इन कर्मियों को इडली, जलेबी, चाय बेचकर गुजारा करना पड़ रहा है। अपना पी एफ निकालकर कर्मी अपनी भविष्य की बचत को खर्च कर चुके हैं। रिश्तेदारों और दोस्तों परिचितों से वे इतना उधार ले चुके हैं कि अब उन्होंने क़र्ज़ देने से मना कर दिया है। दुकानदार उधार राशन नहीं देते। बच्चों की स्कूल की फीस जमा नहीं हो पा रही है। बैंकों की किश्तें जमा न होने से वे डिफाल्टर घोषित हो रहे हैं। सामाजिक और आर्थिक रूप से वे टूट चुके हैं। कई अधिकारी और कर्मचारी भविष्य की अनिश्चितता के कारण नौकरी छोड़ कर जा चुके हैं।

यह हाल उस संस्थान का है जिसे 2010 में नवरत्न कंपनी में शामिल किया गया था। जो आज भी खनन, ऊर्जा, रेलवे, परमाणु बिजलीघर, इसरो, रक्षा, इस्पात उद्योग आदि महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए उपकरण बनाती है। जिसकी स्थापना 1958 में इसी उद्देश्य के साथ की गयी थी कि यह विभिन्न उद्योगों के लिए आधार का काम करेगी। विशाखापत्तनम, राउरकेला, बोकारो आदि स्टील प्लांट की स्थापना में इसका महत्वपूर्ण योगदान है। 

जबसे नई आर्थिक नीतियाँ लागू हुई हैं तबसे भारत के सार्वजनिक उद्योगों को उपेक्षा का शिकार होना पड़ रहा है। विभिन्न सरकारों द्वारा इन सार्वजनिक उद्योगों को घाटे की स्थिति में लाकर इनको बेचने का काम किया जाता रहा है। मोदी सरकार ने तो इस प्रक्रिया को और तेज़ किया है। अगर एच ई सी जैसे कारखाने बर्बाद हो जाते हैं तो फिर निजी क्षेत्र की कम्पनियों को अपार मुनाफे की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। इसलिए एच ई सी जैसे कारखानों को चलाने के लिए जो वर्किंग कैपिटल चाहिए वो उनको उपलब्ध नहीं कराई जा रही है जबकि यही सरकार पूंजीपतियों को जनता की गाढ़ी कमाई लुटा रही है। एच ई सी के पास कोल कम्पनियों के ही करीब 1300 करोड़ से ज्यादा के ऑर्डर हैं लेकिन वह वर्किंग कैपिटल के अभाव में इन ऑर्डर को पूरा नहीं कर पा रही है। और वह कई ऑर्डर एल एन्ड टी जैसी निजी कम्पनियों से पूरे करवा रही है। हाल में घाटे में रहने वाली एच ई सी ने पूर्व में खूब मुनाफे कमाए हैं। 

अपने बकाये वेतन और कंपनी को सुचारू रूप से चलाने के लिए एच ई सी के अधिकारियों से लेकर कम्पनी के कर्मचारी केंद्र और राज्य सरकार से गुहार लगा चुके हैं, धरना प्रदर्शन कर चुके हैं लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है। हालत यह है कि 2018 से यहाँ कोई स्थायी चेयरमैन नहीं है। भेल के सी एम डी नलिन सिंघल को इसका अतिरिक्त भार दिया गया है। इनका एच ई सी के प्रति रुख यह है कि ये पिछले चार साल में चार बार रांची आये हैं। 

मज़दूर यूनियन के प्रतिनिधि कई बार कंपनी को सुचारू रूप से चलाने के लिए सरकार को प्रस्ताव दे चुके हैं। उनका कहना है कि एच ई सी के पास काफी जमीन है जिसको सरकार की संस्थाओं को देकर वर्किंग कैपिटल हासिल की जा सकती है। सरकार अगर चाहे तो कर्ज़ के रूप में कंपनी को वर्किंग कैपिटल देकर उसे फिर से देश की प्रगति का आधार बना सकती है लेकिन मोदी सरकार ऐसा करने के लिए राज़ी नहीं है। उसका तो कहना है कि एच ई सी एक स्वतंत्र निकाय है और अपने कर्मचारियों के वेतन से लेकर अन्य कामों के लिए उसे आत्मनिर्भर होना चाहिए। लेकिन यही मोदी सरकार अडानी के प्रोजेक्टों में एल आई सी का हज़ारों करोड़ रुपया झोंक देने में कोई कसर नहीं छोड़ती। साफ जाहिर है कि सरकार की नीयत एच ई सी को चलाने नहीं बंद करने की है।

एच ई सी की स्थापना सोवियत संघ और चेकोस्लोवाकिया के सहयोग से 1958 की गयी थी और तबसे लेकर आकर आज तक 60 साल से ज्यादा समय बीत चुका है और आज भी एच ई सी में वही पुरानी मशीनें हैं। मेक इन इंडिया का शोर मचाने वाली मोदी सरकार ने इस कारखाने में भी मेक इन इंडिया का लोगो लगाकर कुछ मशीनें बनवाई हैं लेकिन ये सिर्फ प्रचार तक ही सीमित है। असल में तो मोदी और इनकी सरकार की नीयत एच ई सी को अन्य सार्वजनिक संस्थानों की तरह ही पूंजीपतियों को कोड़ी के भाव बेचने की ही ज्यादा लग रही है। पहले कम्पनी को घाटे की स्थिति में पहुंचा दो, उसे जर्जर कर दो ताकि कम्पनी को औने-पौने दामों में बेचा जा सके। और कर्मचारियों को उस स्थिति में पहुंचा दो कि वे उनकी नीतियों का विरोध ही न कर सकें।

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