भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी पर आक्रोशित युवा

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दिल्ली/ एसएससी (कर्मचारी चयन आयोग) द्वारा आयोजित परीक्षाओं में गड़बड़ियों के खिलाफ देशभर में छात्रों-शिक्षकों का असंतोष है। यह असंतोष सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों में व्यक्त हो रहा है। हालिया विरोध 24 जुलाई से 1 अगस्त के बीच एसएससी की 13 चरण की परीक्षा में गड़बड़ी का परिणाम है। परीक्षा केंद्र में पहुंचने पर अभ्यर्थियों को पता चलना कि परीक्षा रद्द हो गई, गलत बायोमेट्रिक सिस्टम, साफ्टवेयर क्रैश होना, माउस न चलना, गलत परीक्षा केंद्र पर अभ्यर्थियों को भेजा जाना, छात्राओं को कुछ परीक्षा केंद्रों पर देर तक रोका जाना, आदि कई वजहें हैं जिसकी वजह से छात्रों में आक्रोश है। एड्युक्विटी (मकनुनपजल) नाम की जिस निजी कंपनी को परीक्षा आयोजन का ठेका देने का फैसला अंततः किया गया उसे लेकर भी छात्रों की आपत्ति है। यह कंपनी पूर्व में एसएससी परीक्षा में पेपर लीक व कई राज्यों में परीक्षा आयोजन में पेपर गड़बड़ी की दोषी है। 
    
इसके बाद परीक्षा में हो रही गड़बड़ी के लिए माफी मांगना, उसे सुधारने के कोई प्रयास एसएससी ने नहीं किये। उल्टा गड़बड़ियों को उजागर कर रहे, सुधारने की मांग कर रहे छात्रों-शिक्षकों को पुलिस दमन, लाठीचार्ज, मुकदमे के जरिए चुप कराने की कोशिश की। मोदी सरकार के बारे में उनके प्रशंसक दावा करते हैं कि ‘एक बार जो ठान लिया तो करते हैं पीछे नहीं हटते’। एसएससी में भी ऐसे ही कई ‘‘छोटे मोदी’’ आसीन हैं। यह लोकतंत्र नहीं तानाशाही है, फासीवाद है।
    
खुद एसएससी द्वारा 2 अगस्त को 8000 अभ्यर्थियों की दुबारा परीक्षा कराना व 55,000 अभ्यर्थियों के लिए 29 अगस्त को दोबारा परीक्षा रखना दिखाता है कि गड़बड़ियां बड़े स्तर की थीं। 
    
छात्रों के असंतोष को दबाने उतरी पुलिस ने छात्रों-शिक्षकों पर लाठीचार्ज किया, धमकाया, जबरन गिरफ्तार किया, मुकदमे लगाए। सबसे बुरा यह है कि यह सब प्रदर्शन के लिए तय जगह जंतर-मंतर, दिल्ली में हुआ। पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति न होने और भारतीय न्याय संहिता की धारा-169 (पूर्व में आईपीसी की धारा-144) लगे होने की बात की। अपनी समस्याओं को उठा रहे लोगों के आगे पुलिस को खड़ा करना ही पूंजीवादी लोकतंत्र की हकीकत है। मोदी सरकार को लोकतंत्र की कोई परवाह नहीं है। वह तेजी से फासीवाद की ओर कदम बढ़ा रही है। उनके लिए कानून का मतलब सिर्फ पुलिस ही है। हर समस्या का समाधान पुलिस या दमन से लोगों को चुप करना है। सही-गलत या न्याय की बात उनके सामने बेमानी है। यही एसएससी परीक्षा में गड़बड़ी की शिकायत कर रहे छात्रों-शिक्षकों के साथ हो रहा है।
    
सोशल मीडिया में छात्रों द्वारा परेशानी की खबरें 25 जुलाई को ही आने लगीं। छात्रों-शिक्षकों ने एसएससी को समस्याओं से अवगत कराया। एसएससी ने गलतियों को सुधारने के बजाय सभी गलतियों को जायज ठहरा दिया। जैसे- दूसरे दिन की परीक्षा में 70 प्रतिशत प्रश्न पहले दिन के आये तो कहा गया कि छात्रों को सरप्राइज (आश्चर्यचकित) करने के लिए। हर गलत प्रश्न बताने के लिए छात्रों को 100 रुपये क्यों चुकाने होंगे तो कहा गया कि यह पैसा सरकार के खाते में जाता है, जिससे सड़कें बनती हैं। इसके बाद हजारों की संख्या में छात्र-शिक्षक जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने पहुंचे जिसे पुलिस ने रोका और भारी दमन किया। मुकदमे लगा दिए।
    
सरकार ने एसएससी की नियुक्ति परीक्षाओं में लापरवाही और गड़बड़ी को कानून व्यवस्था का मामला बना दिया। 2017 में एसएससी पेपर लीक मामलों से लेकर अब तक हर साल कोई न कोई नयी समस्या छात्रों के सामने आती रही है। इससे साफ है कि सरकार रोजगार पाने की प्रक्रिया को लचर से लचर बनाती जा रही है, जिससे एक अदद नौकरी पाना भी असंभव सा बना दिया गया है। 
    
छात्र संघर्ष करते हुए सफल ऐतिहासिक किसान आंदोलन को याद कर रहे हैं। मोदी सरकार की नीतियों का छात्र-नौजवान-शिक्षक माकूल जवाब दे रहे हैं। इस संघर्ष में जीतने पर छात्र नौकरी पा सकेंगे, नहीं जीतने पर मोदी सरकार का फासीवादी चेहरा ही उजागर होगा।   -दिल्ली संवाददाता

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