जैन मंदिर में काम करने वाले मजदूर से बातचीत

Published
Sat, 08/01/2026 - 15:50
/jain-mandir-mein-kaam-karane-vaale-majdooron-se-baatcheet

प्र.- कमल भाई आप कहां काम करते हैं?

उ.- मैं एक जैन मंदिर में काम करता हूं।

प्र.- यहां आप कब से काम करते हैं?

उ.- मैं यहां पिछले चार वर्ष से काम करता हूं। 

प्र.- आप कितने घण्टे काम करते हैं।

उ.- मैं 12 घण्टे काम करता हूं। 

प्र.- आप के यहां कितने मजदूर काम करते हैं?

उ.- हमारे यहां 20 मजदूर काम करते हैं। 

प्र.- तो कमल भाई आप क्या करते हैं?

उ.- मैं मंदिर की सफाई का काम व मंदिर में आने वाले भक्तों की मदद करता हूं और मंदिर की रखवाली करता हूं। 

प्र.- कमल आप को कितना वेतन मिलता है। 

उ.- जब मैं लगा था तब मुझे 6000 रु. मिलते थे और मुझे अब 7000 रु. मिलते हैं। 

प्र.- साथी कमल पिछले 2-3 महीनों से अलग-अलग राज्यों में मजदूर आंदोलन अपने उभार पर थे। ईरान और अमेरिका के युद्ध के चलते देश में गैस और अन्य चीजों के दाम बढ़ने की वजह से महंगाई कई गुना बढ़ गयी। इसके चलते मजदूरों के आंदोलन फूट पड़े। इससे डरकर सरकारें न्यूनतम मजदूरी बढ़ाने को मजबूर हुईं तो क्या आपके मालिक ने आपकी मजदूरी नहीं बढ़ाई? 

उ.- हां मालिक ने हमारे यहां मैनेजर, सुपरवाइजर व पुजारी व कुछ मजदूरांे की मजदूरी बढ़ाई है लेकिन हमारे जैसे कुछ मजदूरों की नहीं बढ़ाई है। लेकिन भाई मैंने अपना वेतन बढ़ाने को पंडित जी से बोला। अभी मालिक ने मैनेजर, सुपरवाइजर का 2 से 3 हजार रुपये तक वेतन बढ़ाया है। देखों मेरा कितना बढ़ायेंगे। 

प्र.- कमल आप 4 वर्ष से काम कर रहे हैं तो आप का हर साल कितना वेतन बढ़ाता है आपका मालिक?

उ.- साथी अभी तक हर वर्ष 500 रु. बढ़ाता था लेकिन भाई साहब अब की मैं कम से कम 10,000 रुपये बढ़ाने के मूड में हूं क्योंकि 7000 रु. की तनख्वाह में खर्च नहीं चल रहा है।

प्र.- कमल भाई आपकी शादी हो गयी है?

उ.- नहीं।

प्र.- साथी तो आप शादी कैसे करोगे। 7 हजार के वेतन में?

उ.- मुझे यही चिंता है मेरी मां भी एक हास्पीटल में काम करती हैं तो किसी प्रकार से घर का खर्च चल रहा है और घर भी किराये का है। 

साथी मालिक से संघर्ष करिये। और आप के जैसे जो मजदूर हैं उनको संगठनबद्ध करते हुए मालिक से वेतन बढ़ाने की बात करें तब आपका मालिक आप का वेतन बढ़ायेगा। 
            -दिलीप, बरेली

आलेख

/peace-bond-vishesh-karyakari-majistrate-v-shakti-prathakkaran-siddhant

शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धान्त यह मत प्रस्तावित करता है कि लोगों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए जरूरी है कि कार्यपालिका-विधायिका व न्यायपालिका परस्पर स्वतंत्र हों। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन करना चाहे तो न्यायपालिका उसे रोक दे। फ्रांसीसी दार्शनिक मांतेस्क्यू को इस शक्ति पृथक्करण के सिद्धान्त का मूल प्रस्तावक माना जाता है।

/regime-change-or-vyavastha-parivartan

पूंजीवादी जनतंत्रों में चुनाव ‘सेफ्टी बाल्व’ का काम करता है। बदहाल और दुःखी परेशान लोग नयी सरकार को चुन उम्मीद करते हैं कि उनकी जिन्दगी में शायद बेहतरी हो जाये। अमरीका जैसे देश में तो इसी वजह से दोनों प्रमुख पार्टियां बारी-बारी से सत्ता में आती रहती हैं। चुनाव के जरिये सरकारें बदलती रहती हैं और पूंजीवादी व्यवस्था बदस्तूर चलती रहती है। मजदूर-मेहनतकश जनता बेहतरी की मृग मरीचिका में जीती रहती है। 

/janavad-ka-sawal-aur-majdoor-varg

मजदूर के पास पूंजी नहीं होती इसीलिए पूंजीवाद में उसकी कोई हैसियत नहीं होती। इतना ही नहीं, वह जिन्दा रहने के लिए पूंजीपति पर निर्भर होता है। वह पूंजीपति के लिए काम करता है और जिन्दा रहता है। इसके लिए वह पूंजीपति से जिन संबंधों में बंधता है वे उसे पूंजीपति का गुलाम बना देती हैं। इसीलिए मजदूर को उजरती गुलाम यानी मजदूरी करने वाला गुलाम कहा जाता है। स्वाभाविक है कि समाज में गुलाम व गुलाम मालिक की राजनीतिक-सामाजिक हैसियत एक नहीं हो सकती।

/punjivadi-jantantra-and-chunavi-corruption

अठारहवीं सदी के इंग्लैण्ड में होने वाले चुनावी भ्रष्टाचार पर गूगल से ‘सर्च’ करने पर उसका ए आई स्वतः ही यह जवाब हाजिर कर देता हैः 

/election-aayog-hindu-fascist-and-loktantra

एस.आई.आर. प्रक्रिया के दौरान बड़े पैमाने पर मतदाताओं की कटौती की गई। अब तक 13 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। जबकि 5-6 करोड़ लोगों को संदेह की आड़ में नोटिस भेजे गए। 13 करोड़ में से 70 प्रतिशत वो लोग थे जिन्हें स्थानांतरित या अनुपस्थित बता दिया गया। इस तरह बड़े स्तर पर मनमानी छंटनी की जा रही है। इसमें सबसे बड़ी संख्या अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी, महिलाओं और मलिन बस्तियों में रहने वालों की है।