जस्टिस चन्द्रचूड़ का शौर्य मोमेंट

उच्चतम न्यायालय के भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश डी वाई चन्द्रचूड़ अपने द्वारा लिखित एक किताब के प्रचार के क्रम में ढेर सारे साक्षात्कार दे रहे हैं। न्यूजलाउंड्री को दिये साक्षात्कार के क्रम में उनके मुंह से एक ऐसी बात निकल गयी कि उनकी हिन्दूवादी मानसिकता उजागर हो गयी। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसा कि शौर्य फिल्म में कोर्ट मार्शल की जिरह के दौरान ब्रिगेडियर प्रताप के मुसलमानों के प्रति अपनी नफरत को आवेश में आकर व्यक्त कर देता है और कश्मीर में निर्दोष मुसलमानों पर सेना के द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों को जायज ठहराने लगता है।

डी वाई चन्द्रचूड़ द्वारा दिये गये वक्तव्य से पहले उन पाठकों के लिए जिन्होंने शौर्य फिल्म नहीं देखी है, उनके लिए शौर्य फिल्म के इस प्रसंग का एक संक्षिप्त परिचय। शौर्य फिल्म की कहानी एक कोर्ट मार्शल के इर्द गिर्द चलती है। फिल्म की कहानी में कैप्टेन जावेद खान अपने वरिष्ठ सैन्य अधिकारी मेजर राठौड़ को कश्मीर के एक गांव में तलाशी अभियान के दौरान गोली मार देता है। कैप्टेन जावेद खान पर कोर्ट मार्शल की कार्यवाही होती है। इस कार्यवाही के दौरान बचाव पक्ष के वकील को पता चलता है कि मेजर राठौड़ कश्मीर में मुसलमानों के प्रति अपनी नफरत की वजह से निर्दोष लोगों पर ज्यादती करता था। इन सब में उसका वरिष्ठ अधिकारी ब्रिगेडियर प्रताप उसको प्रोत्साहित करता था। बचाव पक्ष का वकील ब्रिगेडियर प्रताप को अदालत में जिरह के लिए बुलवाता है। जिरह के दौरान शुरू में ब्रिगेडियर प्रताप अपने और अपनी सेना द्वारा देश की सुरक्षा के लिए उठायी जा रही कठिनाईयों और दी जा रही कुर्बानियों का हवाला देकर बचाव पक्ष को शर्मिंदा करने की कोशिश करता है। लेकिन, एक क्षण जब ब्रिगेडियर प्रताप के एक निजी घाव को जिसमें वह एक मुसलमान के द्वारा आहत किया गया था, को बचाव पक्ष का वकील नमक छिड़कने के अंदाज में कुरेदता है, तो ब्रिगेडियर प्रताप सभी मुसलमानों के प्रति अपने मन में पाली हुई नफरत को दिल से बाहर आने से रोक नहीं पाता है।

ऐसा ही कुछ न्यूजलाउंड्री के साक्षात्कार में चन्द्रचूड़ महोदय के साथ हुआ। चन्द्रचूड़ महोदय अयोध्या मामले में फैसला देने वाली बेंच का हिस्सा होने पर काफी गर्व करते हैं और इसे कई बार वे व्यक्त भी कर चुके हैं। वे कह चुके हैं कि इस फैसले ने एक ऐसा मसला जो सदियों से देश को बांट रहा था, उसका निपटारा कर दिया है। वे इशारों में यह भी व्यक्त कर चुके हैं कि हजार पेज से ज्यादा के इस फैसले के लेखक वही हैं। यह भी उनके लिए गर्व करने का एक अतिरिक्त कारण है। इसके बावजूद अहसानफरामोश लोग जब उनसे इस फैसले पर चुभने वाले प्रश्न पूछें तो वह कैसे न विचलित हों और क्यों न देश पर मुसलमानों के द्वारा सदियों से किये गये अत्याचार याद दिलाएं।

इस साक्षात्कार में पत्रकार ने चन्द्रचूड़ महोदय से पूछा कि उच्चतम न्यायालय ने हिन्दू पक्ष को इसलिए जमीन दे दी क्योंकि उन्होंने मस्जिद को अपवित्र किया और मुस्लिम पक्ष ने ऐसा नहीं किया। इस पर चन्द्रचूड़ महोदय ने कहा कि आप यह क्यों भूल जाते हैं कि बाबरी मस्जिद का निर्माण अपवित्र करने की बुनियादी कार्यवाही थी। वे इतिहास को एकांगी तरीके से न देखने का उपदेश देने लगते हैं जो कि आज संघ-भाजपा का रोज का काम हो गया है। यहां चन्द्रचूड़ उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले में लिखे गये शब्दों के भी विरोध में खड़े हो जाते हैं कि यह साबित नहीं हुआ है कि बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर किया गया था।

शौर्य फिल्म में अंत में ब्रिगेडियर प्रताप को गिरफ्तार कर लिया जाता है और उन पर कोर्ट मार्शल का आदेश होता है। न्यायाधीश चन्द्रचूड़ ने ब्रिगेडियर प्रताप की ही तरह अपने भीतर की संघी मानसिकता को उजागर कर दिया है। इस अगली कड़ी की नायक देश की मजदूर मेहनतकश जनता है। उसके जागने पर ही संघी मानसिकता पाले लोगों के अपराध पर न्याय हो सकेगा।

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