मोदी सरकार, वक्फ और वक्फ अधिनियम

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गत वर्ष अगस्त माह में लोकसभा में वक्फ संशोधन बिल 2024, संसद में पेश किया गया था। इस साल यह कानून बन चुका है। इस कानून का नाम एकीकृत वक्फ प्रबंधन, सशक्तीकरण, दक्षता और विकास अधिनियम, 2025 है। अंग्रेजी शब्दों के हिसाब से संक्षिप्त में, इसका नाम है उम्मीद (UWMEED)। इस कानून को 1923 व 1995 के वक्फ कानून में संशोधन करने के लिए बनाया गया है। मोदी सरकार का दावा है कि इस कथित ‘उम्मीद’ कानून से ‘‘वक्फ संपत्तियों के प्रशासन और प्रबंधन की दक्षता’’ बढ़ेगी। मोदी सरकार का दावा है कि वक्फ की आय का उपयोग स्कूल, अस्पताल, और गरीब मुसलमानों के कल्याण के लिए किया जाएगा, न कि केवल मस्जिदों के रख रखाव में। चूंकि मोदी सरकार के हिसाब से, वक्फ संपत्तियों का बड़ा हिस्सा अवैध कब्जे, भ्रष्टाचार और आपराधिक उपयोग में लिया जा रहा था इसलिए इस पर अंकुश लगाने और गरीब मुसलमानों के परोपकार का दावा मोदी-शाह की सरकार ने किया है। मोदी-शाह की जोड़ी का दावा है कि केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य बोर्डों में गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल करने से सामाजिक समरसता बढ़ेगी और प्रबंधन में विविधता आएगी तथा वक्फ बोर्डों में महिलाओं और पिछड़े मुस्लिम समुदायों (जैसे बोहरा, आगाखानी) को प्रतिनिधित्व देकर सामाजिक न्याय सुनिश्चित होगा। 
    
वैसे संघ और इसके संगठनों व भाजपाइयों ने सालों-साल से झूठे दावे, आधे-अधूरे तथ्यों को तोड़-मरोड़कर जमीन के मालिकाने के मामले में भी नफरत फैलाई है। ‘लव जिहाद’ की ही तरह ‘लैंड जिहाद’ शब्द भी संघी लेबोरेटरी में पैदा किया गया है। संघियों ने ऐसी तस्वीर बनाई है मानो भारत की जितनी जमीन है उसका बड़ा हिस्सा (पाकिस्तान के बराबर यानी लगभग 2200 लाख एकड़) वक्फ बोर्ड के कब्जे में हो यानी मुसलमानों के ही कब्जे में हो। हकीकत यह है कि भारत का कुल क्षेत्रफल लगभग 8100 लाख एकड़ है जबकि वक्फ बोर्ड के पास जो जमीन है वह लगभग 9.4 लाख एकड़ है यानी मात्र 0.11 प्रतिशत, अब मोदी सरकार इसके 38 लाख एकड़ होने के दावे कर रही है जो कि 0.47 प्रतिशत है। इसके उलट केवल चार राज्यों में ही हिंदू मंदिरों के पास तकरीबन 10 लाख एकड़ जमीन मौजूद है जबकि पूरे देश भर में अनुमानित तौर पर इसे 20 लाख एकड़ से काफी ऊपर बताया जाता है। आश्रमों, श्मशान घाटों और धर्मशालाओं की जमीन को जोड़ा जाय तो यह आंकड़ा काफी ज्यादा हो जाएगा। सभी धर्मों के धार्मिक स्थलों के पास भारत में भरपूर जमीन है। केंद्रीय और अधिकतर राज्यों के द्वारा इस सम्बन्ध में आंकड़ों की निगरानी या पड़ताल बेहद कमजोर होने के चलते निश्चित आंकड़ा नहीं है। जमीनों के मालिकाने की बात की जाए तो यदि राज्य सरकारों और इसके विभागों को छोड़ दिया जाय तो केवल, भारत सरकार (केंद्र सरकार) के पास ही 58 लाख एकड़ जमीन है जबकि इसके दो विभाग भारतीय सेना के पास 17 लाख और रेलवे के पास 11 लाख एकड़ जमीन है। 
    
संघ और भाजपाइयों का यह दुष्प्रचार भी है कि अतीत में सरकार ने (आजादी के बाद) हिंदू मंदिरों को नियंत्रित किया; कि सरकार ने मंदिरों को नियंत्रित करने के लिए बोर्ड या ट्रस्ट बनाए और उसकी कमाई को हड़प लिया। जबकि अन्य धर्मों विशेषकर मुसलमानों के मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं किया गया। मुसलमानों को छूट दी गई। इसलिए अब हिंदू राष्ट्रवादी सरकार एक देश में दो कानून नहीं की तर्ज पर मुसलमानों को भी इस दायरे में लाकर समानता स्थापित कर रही है।
    
हकीकत यह है कि दक्षिण भारत के कुछ राज्यों और जम्मू कश्मीर में वैष्णो देवी को छोड़कर अन्य जगहों पर हिंदू धार्मिक स्थान को नियंत्रित करने वाले बोर्ड या ट्रस्ट आम तौर पर नहीं हैं या बेहद कमजोर हैं, अधिकांश मंदिर नियंत्रण से बाहर हैं। उत्तराखंड में खुद मोदी सरकार ने देवस्थानम बोर्ड बनाने की कोशिश की थी, विरोध के चलते इस फैसले को वापस लेना पड़ा। संघियों द्वारा प्रचारित तथ्य वैसे भी एकदम सफेद झूठ हैं। बौद्ध, सिख, ईसाई, मुसलमान आदि सभी के संबंध में केंद्र या कुछ राज्य सरकारों ने बोर्ड या ट्रस्ट का गठन कम या ज्यादा रूप में किया है या कानून बनाया है। 1949 के बोधगया मंदिर अधिनियम के तहत, बौद्वगया मंदिर का प्रबंधन एक गैर-बौद्ध ट्रस्ट (हिंदू) द्वारा किया जाता है, बौद्ध समुदाय में इसके खिलाफ आक्रोश है। इसी तरह सिक्खों के मामले में सिख गुरुद्वारा अधिनियम, 1925 और अन्य धर्मों के मामले में भी कानून बने हुए हैं।
    
इसी तरह मुस्लिम से संबंधी वक्फ संपत्तियों जिसमें आम तौर पर मस्जिद, मदरसे और कब्रिस्तान आदि शामिल हैं कुछ मामलों में मंदिर, कृषि भूमि आदि भी हैं; यह सभी, वक्फ बोर्ड द्वारा नियंत्रित हैं वक्फ बोर्ड सरकार के नियंत्रण में है।
    
आम तौर पर वक्फ किसी व्यक्ति द्वारा किसी ऐसे उद्देश्य के लिए संपत्ति का स्थायी दान है जिसे पवित्र और अल्लाह को समर्पित माना जाता है। जिसकी खरीद-फरोख्त नहीं की जा सकती। दान देना यानी वक्फ करने का मकसद है- धर्मार्थ या कल्याण का काम यानी मस्जिद और कब्रिस्तान बनवाना और इसका रखरखाव, शैक्षणिक संस्थानों और स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थापना, गरीबों और विकलांगों को वित्तीय सहायता प्रदान करना। वक्फ तीन तरीकों से किया जा सकता है- (प) मौखिक या लिखित माध्यम से चल-अचल संपत्ति की दान की घोषणा, (पप) धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए भूमि का दीर्घकालिक उपयोग, या (पपप) उत्तराधिकार की पंक्ति के अंत (पीढ़ी में कोई वारिस ना होने की स्थिति) में दान की घोषणा। 
    
सितंबर 2024 तक, भारत में 8.7 लाख पंजीकृत अचल वक्फ संपत्तियां हैं। सभी पंजीकृत अचल वक्फ संपत्तियों में से 7 प्रतिशत पर अतिक्रमण है, 2 प्रतिशत पर मुकदमा चल रहा है और 50 प्रतिशत की स्थिति अज्ञात है। इनमें से आधे से अधिक संपत्तियां इस तरह वितरित हैं- कब्रिस्तान (17 प्रतिशत), कृषि भूमि (16 प्रतिशत), मस्जिद (14 प्रतिशत), और दुकानें (13 प्रतिशत)।       
    
इस तरह काफी मात्रा में जमीनों को नियंत्रित करने वाले वक्फ बोर्ड के गठन और इस पर नियंत्रण कोई आज की बात नहीं बल्कि औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश सरकार ने 1913 और फिर 1923 में भी कानून बनाकर कर डाला था। 1923 के कानून से वक्फ संपत्ति का अनिवार्य पंजीकरण किया गया। 1954 में वक्फ की बेहतर पहचान और प्रबंधन के लिए केंद्रीय वक्फ परिषद और राज्य वक्फ बोर्ड की स्थापना की गई। 1995 के अधिनियम में  वक्फ संबंधी विवादों पर निर्णय के लिए न्यायाधिकरण गठन और बोर्ड में इस्लामी धर्मशास्त्र के निर्वाचित सदस्य और नामित विद्वान का प्रावधान किया गया।  2013 में, अधिनियम में अतिक्रमणकारी की परिभाषा दी गई। इसके जरिए न्यायाधिकरण का आकार बढ़ाना और वक्फ के प्रबंधन पर वक्फ बोर्डों की अधिक निगरानी करने, वक्फ की जमीनों को 30 साल तक पट्टे पर दे सकने और अधिनियम में प्रत्येक राज्य वक्फ बोर्ड में दो महिला सदस्यों की भी अनिवार्यता के साथ ही वक्फ संपत्तियों की बिक्री या उपहार देने पर प्रतिबंध लगाया गया।
    
मोदी सरकार का यह वक्फ अधिनियम, 2025, केंद्रीय वक्फ परिषद और वक्फ बोर्ड की संरचना में बदलाव करता है, जिसमें गैर-मुस्लिम सदस्यों को शामिल किये जाने की राह खोलता है। सर्वेक्षण आयुक्त के स्थान पर कलेक्टर को नियुक्त किया गया है, जिसे विवादित संपत्तियों पर निर्णय करने, इसके मालिकाना तय करने और वक्फ संपत्तियों का सर्वेक्षण करने का अधिकार मिल गया है। नए कानून के हिसाब से वक्फ के रूप में पहचानी गई सरकारी संपत्ति अब वक्फ नहीं रह जाएगी। 
    
अधिनियम में वक्फ परिषद में नियुक्त सांसदों, पूर्व न्यायाधीशों और प्रख्यात व्यक्तियों के मुस्लिम होने की आवश्यकता को हटा दिया गया है। राज्य वक्फ बोर्डों और केंद्रीय वक्फ परिषद में गैर-मुस्लिमों को सदस्य बनाने की अनुमति इसे न केवल अनिवार्य बनाती है बल्कि गैर मुस्लिमों का बहुमत कायम करने और अल्पसंख्यकों को अल्पमत में डालने की संभावना भी पैदा करती है। जबकि इसके ठीक उलट, हिंदू और सिख धार्मिक बोर्ड या ट्रस्ट को नियंत्रित करने वाली समान संस्थाओं में उसी धर्मों के ही सदस्य होते हैं। अयोध्या के राम मंदिर ट्रस्ट के सभी 15 सदस्यों जिसमें जिलाधिकारी के अलावा और सरकार द्वारा मनोनीत होने वाले सदस्यों का भी हिंदू होना अनिवार्य है। यह सब कुछ मोदी सरकार के फासीवादी आचरण को साफ दिखाता है। अब वक्फ परिषदों और बोर्डों में सभी सदस्य केवल मनोनीत होंगे चुनाव नहीं होगा। इस तरह वक्फ परिषदों और बोर्डों में संघी-भाजपाई लोगों को बिठाकर इसे नियंत्रित करने का ताना-बाना रचा गया है।
    
वक्फ न्यायाधिकरणों में तीन सदस्यों में से एक मुस्लिम कानून के विशेषज्ञ होने के प्रावधान को खत्म कर दिया गया है। इसमें फैसले लेने वाले भी अब सरकारी अधिकारी हो होंगे।
    
विधेयक, वक्फ बाई यूजर को खत्म करके सालों साल से बिना दस्तावेज के परम्परा में वक्फ की ही तरह इस्तेमाल होने वाली सम्पत्ति को वक्फ संपत्ति मानने के प्रावधान को खत्म करता है। इस तरह भारी पैमाने पर वक्फ की संपत्ति को अधिग्रहित करने (कब्जाने) के लिए खुला रास्ता खोल देता है। इसके साथ ही अब अपनी चल-अचल संपति को अब वही वक्फ कर सकता है जो कम से कम पांच साल से इस्लाम का पालन कर रहे हैं।
    
वक्फ मुस्लिम पर्सनल लॉ का हिस्सा है। वक्फ को नियंत्रित करने वाली संस्थाओं में गैर-मुस्लिम सदस्यों को बहुमत देने से संविधान के अनुच्छेद 26 का उल्लंघन हो सकता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक समुदायों को अपने मामलों का प्रशासन और प्रबंधन करने का मौलिक अधिकार प्रदान करता है। कुछ अन्य धार्मिक और धर्मार्थ संस्थानों को नियंत्रित करने वाले कानूनों के अनुसार अधिकांश बोर्ड सदस्यों और प्रशासकों का अपने धार्मिक संप्रदाय से संबंधित होना आवश्यक है।
    
अधिनियम के तहत, राज्य सरकारों को राज्य वक्फ बोर्ड में एक मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) नियुक्त करना जरूरी है। पहले, सीईओ राज्य सरकार के उप सचिव के बराबर एक मुस्लिम अधिकारी होता था। यदि उस रैंक का कोई मुस्लिम अधिकारी उपलब्ध नहीं होता तो उसके बराबर रैंक का मुस्लिम अधिकारी नियुक्त करने का प्रावधान था। मगर अब नए विधेयक में सीईओ के मुस्लिम होने की आवश्यकता को हटा दिया गया है। जबकि इसके उलट अन्य धार्मिक बोर्डों या ट्रस्टों के मामले में कानूनों के तहत, सीईओ के बराबर प्रशासकों को  उसी धर्म से संबंधित होना जरूरी है जिस धर्म का धार्मिक बोर्ड हो।
    
इस तरह स्पष्ट है कि मोदी सरकार का यह वक्फ कानून भी एक ओर ध्रुवीकरण का औजार है तो दूसरी तरफ संपत्ति हथियाने और एकाधिकारी पूंजी की सेवा में इसे लुटाने का हथकंडा भी है। जिस तेजी से मोदी सरकार ने एकाधिकारी पूंजी के मालिकों की सेवा में भांति-भांति के बड़े प्रोजेक्ट लिए हैं जिसके लिए भारी पैमाने पर जमीनें भी चाहिए थीं तो उसी अनुरूप बड़े पैमाने पर अलग-अलग नामों की आड़ में मसलन कहीं लैंड जिहाद, कहीं अवैध अतिक्रमण तो कहीं सौंदर्यीकरण या फिर राष्ट्र हित के नाम पर जमीन कब्जाने (अधिग्रहण) और इसकी बंदर बांट के लिए बड़े पैमाने पर बुलडोजर के जरिए ध्वस्तीकरण और बेदखली का अभियान चलाया है। अब यही नग्न लूट-खसोट वक्फ संपत्ति के मामले में भी होनी है। चूंकि इसकी संपत्तियों का एक ठीक-ठाक हिस्सा शहरों में या इसके आस-पास ही है ऐसे में स्वतः संघी सरकार के लिए इसके महत्व को समझा जा सकता है।
    
स्पष्टतः विधेयक न केवल बिल्कुल असंवैधानिक है बल्कि यह मुसलमानों को और ज्यादा अलगाव में धकेलने वाला, उन्हें उकसावा दिलाने वाला भी है। यदि इनकी योजना के अनुरूप मुस्लिम समुदाय सड़कों पर आता है तब संघी बहुसंख्यक हिंदुओं को अपने पक्ष में गोलबंद करने का अभियान ये और बड़े पैमाने चलाएंगे। जिस तरह से नागरिकता कानून के मामले में या फिर समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर हिंदू फासीवादी कर रहे हैं। 
    
जहां तक मंदिर, मस्जिद, चर्च या अन्य धर्मों के धार्मिक स्थलों के पास इतनी बड़ी मात्रा में जमीनों का संचित होने और इसके विस्तारित होने की बात है, एक दौर में यह सैकड़ों साल तक राजाओं की सत्ता और धर्म के गठजोड़ से प्रजा की लूट-खसोट और संसाधनों को हथियाकर कायम की गयी थी अब यह प्रक्रिया दूसरे ढंग से चल रही है। इसीलिए इसके खिलाफ जिन समाजों में क्रांतियां हुईं उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राज्य कायम करने के साथ ही इस तरह की विशाल संचित जमीनों को गरीब और छोटे किसानों के बीच वितरित करने के साथ ही राज्य की जमीन घोषित कर दिया।
    
भारत में ऐसा नहीं हो सका। आजादी के बाद जो पूंजीवादी राज्य कायम हुआ उसने इस मामले पर भी समझौता किया। धर्मनिरपेक्षता तो कहने को थी वास्तव में नरम हिंदुत्व की नीति पर सरकारें चलीं। धर्म और राज्य का अद्भुत संयोग चलता रहा। अलग-अलग धर्मों की पिछले 2-3 हजार साल से संचित और विस्तार पाती चल-अचल संपत्तियां इनके हाथों में बनी रहीं। अब हिंदू फासीवादी इस काम को एक हद तक नकारात्मक ढंग से अंजाम दे रहे हैं। 
    
इसलिए जहां एक ओर वक्फ कानून के जरिए अल्पसंख्यकों पर बोले जा रहे हमले का विरोध करना जरूरी है वहीं हिंदू फासीवादियों के खिलाफ संघर्ष को आगे बढ़ाते हुए धर्मनिरपेक्ष समाजवादी राज्य की ओर बढ़ने से ही इसका समाधान संभव है।

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